up

अवसरवादी दांव

आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा व्यक्त किया जा रहा था। उत्तर प्रदेश में बसपा मुखिया मायावती ने सपा से गठबंधन तोड़ लिया है। वह उस स्थिति में जब लोकसभा चुनाव में सपा ने पांच तो बसपा ने 10 सीटें जीती हैं। मायावती का आरोप है कि सपा का यादव वोट उनके प्रत्याशियों को नहीं मिला है। उन्होंने डिंपल यादव और अक्षय यादव की हार का उदाहरण पेश कर सपा से यादव वोट बैंक छिटकने की बात कही है। हालांकि मायावती ने अखिलेश यादव को संगठन मजबूत करने की नसीहत देते हुए भविष्य में गठबंधन से इनकार नहीं किया है। मतलब जब सपा मजबूत होगी तब ही वह गठबंधन करेंगी। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनको मजबूत मित्र चाहिए न कि कमजोर।
हालांकि अखिलेश यादव ने भी अपने दम पर उप चुनाव लडऩे की बात कही है। वैसे अब उनके पास कोई चारा भी नहीं था। इसे अखिलेश यादव का बैकफुट पर आना ही कहा जाएगा कि कल जब मायावती ने अकेले उप चुनाव लडऩे का ऐलान किया तो वह चुप रहे। बताया जा रहा है कि सपा के मुख्य महासचिव प्रोफेसर रामगोपाल यादव और बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने इस गठबंधन की रूपरेखा तैयार की थी। इन लोगों का मानना था कि मायावती की वजह से दलित और सपा की वजह से यादव वोट बैंक उन्हें मिल जाएगा उनकी मजबूती को देखकर भाजपा का विरोध करने वाले मुस्लिमों की उनको वोट देना मजबूरी हो जाएगी। यही कारण था कि गठबंधन होने के बाद सपा और बसपा नेता वातानुकूलित कमरों में बैठ कर जातीय आंकड़ों में खुश होते रहे। चुनाव में दोनों ही दल आरामतलबी में दिखे। जब नतीजे सामने आये तो इन लोगों की आंखें खुली। हालांकि कांग्रेस को साथ न लेना भी हार का कारण बताया जा रहा है पर सपा कभी इतनी झुक कर उत्तर प्रदेश में नहीं लड़ी है।
दरअसल अखिलेश यादव का समीकरण यह था कि वह लोकसभा चुनाव में बसपा का सहयोग करें, जिस पर बसपा उन्हें 2022 के विधानसभा चुनाव में सहयोग करेगी। उनका मानना था कि यदि विपक्ष की सरकार बनती है तो मायावती केंद्र में चली जाएंगी, जिससे उनका रास्ता उत्तर प्रदेश में साफ हो जाएगा। यही वजह रही कि वह बार-बार उत्तर प्रदेश में ही रहने की बात करते रहे। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि मायावती उस स्वभाव की नेता हैं अगर वह देश की प्रधानमंत्री भी बन जाएं और उनकी पार्टी का प्रदर्शन उत्तर प्रदेश में सपा से अच्छा हो तब भी वह अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने में सहयोग नहीं करेंगी। उनका तर्क होगा कि उनकी पार्टी की सीटें सपा से अधिक आई हैं तो उनकी पार्टी का ही मुख्यमंत्री बनेगा। अखिलेश यादव को यह भी समझना होगा कि मायावती कभी लखनऊ गेस्ट हाउस कांड भूलने वाली नहीं हैं।
वैस योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में मजबूती से सरकार चला रहे हैं। सपा और बसपा का उनके खिलाफ सड़कों पर न उतरना ही उनकी सरकार की मजबूती मानी जा रही है। आज की हालत में तो वह न केवल सपा बल्कि बसपा के लिए भी बहुत बड़ी चुनौती हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करने के बाद अब 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन करने पर अपने दम पर पार्टी को खड़ा करने वाले नेताजी बहुत नाराज थे। उन्होंने इस गठबंधन का विरोध किया था। पर अखिलेश यादव ने उनकी बात को कोई खास तवज्जो नहीं दी। नतीजा सामने है। हालांकि नेताजी अखिलेश यादव पर बहुत मुखर हैं। उन्होंने पार्टी के प्रवक्ताओं को उनके पद से हटाया भी है। संगठन में जमीनी और निष्ठावान नेताओं को लाने की बात कही है।
-मधु आलोक निगम