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जल्दबाजी में सरकार

दरअसल, नौ साल बाद एक बार फिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह सरकार में हैं। नौ साल पहले दोनों गुजरात में मुख्यमंत्री और गृह मंत्री थे। तभी देश में गुजरात मॉडल के गवर्नेंस की चर्चा तेज हो गई है। बहरहाल, वह तो काम से पता चलेगा कि कौन सा मॉडल लागू किया गया है। पर ऐसा लग रहा है कि आंतरिक सुरक्षा से जुड़े चुनावी मुद्दों को ध्यान में रख कर शाह को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है।
साथ ही ऐसा दावा किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने पिछले पांच साल के शासनकाल के दौरान एक दिन का भी अवकाश नहीं लिया और वे देश-दुनिया की फिक्र कर अपने कार्य में जुटे रहे, अब लगता है मोदी की दूसरी पारी के प्रथम पंक्ति के दस मंत्रियों ने भी मोदी की इसी लीक पर चलने का संकल्प ले लिया है, इसीलिए शपथग्रहण के बाद अपना कार्यभार सम्भालते ही मोदी के ‘नवरत्नोंÓ ने अपने विभागों की प्राथमिकताएं तय कर उनका ‘रोड़ मैपÓ बनाना शुरू कर दिया है।
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह जो फिलहाल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी है, उन्होंने देश के विवादित राज्य जम्मू-कश्मीर को प्राथमिकता की सूची में सबसे ऊपर रखकर उस राज्य को अन्य राज्यों की बराबरी की श्रेणी में लाकर राज्य में शांति के साथ अपनी पार्टी का साम्राज्य स्थापित करने की ठान ली है, फिर चाहे इसके लिए विधानसभा क्षेत्रों का फिर से परिसीमन कर पाक अधिकृत कश्मीर की चौबीस सीटें भी जम्मू-कश्मीर में शामिल क्यों न करनी पड़े? वैसे फिलहाल अमित भाई इस परिसीमन विवाद को सुर्खियों में लाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने परिसीमन संबंधी खबरों का खण्डन कर दिया, किंतु हर कोई यह अच्छी तरह जानता है कि आगे-पीछे यह होना है और गैर कश्मीरी किसी हिन्दू का इस विवादित राज्य का मुख्यमंत्री बनना ही है, फिर इसके लिए अमित शाह जी को धारा-370 और 35ए को खत्म ही क्यों न करना पड़े और पूरे कश्मीर में कफ्र्यू के साये में ही यह सब क्यों न करना पड़े? किंतु यह होगा अवश्य। चूंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी तथा अमित शाह व पहली पंक्ति के मंत्रियों के सामने प्राथमिक कार्यों की सूची बहुत लम्बी है और कम समय में अगले विधानसभाओं के पहले उन्हें कुछ करके दिखाना है।
आज हर मंत्री हड़बड़ी या जल्दबाजी में नजर आ रहा है, फिर मोदी जी भी हर मंत्री के पीछे ‘हण्टरÓ लेकर खड़े है, सबसे पहले हर मंत्री को एक सौ दिन का ‘टॉरगेटÓ दे दिया गया है औैर साथ ही पूरे पांच साल का हर विभाग का ‘रोड मैपÓ बनाने के भी सख्त निर्देश दे दिए गए है, इसी कारण हर विभाग के शीर्ष अधिकारी व मंत्रीगण ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे है। मोदी सरकार वर्तमान में देश के दो राज्यों जम्मू-कश्मीर व पंश्चिम बंगाल को ‘सिरदर्दÓ मान रही है, और इसी कारण मोदी जी व अमित शाह जी ने इन दोनों राज्यों को अपने बीच बांट लिया है, अमित शाह जहां भाजपा के स्तर पर ममता को परेशान किए हुए है। तो मोदी जी वहां के प्रशासन व शारदा घोटाले की जांच का उत्तर दायित्व वहन किए हुए है, वही शाह साहब ने अपने आपको पूरी तरह जम्मू-कश्मीर के लिए समर्पित कर दिया है। जहां तक अन्य मंत्रियों का सवाल है, उन्हें भी अपने-अपने लक्ष्य सौंप दिए गए है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को जहां सीमाएं सुरक्षित रखने का अहम् दायित्व सौंपा गया है, वहीं विदेश मंत्री डॉ. सुब्रमण्यम जयशंकर को पाक-चीन से भारत के संबंधों को नई दिशा प्रदान करने तथा राष्ट्र संघ की स्थाई समिति में भारत की सदस्यता का अहम् मसला सौंपा गया है।
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को मौजूदा बिगड़ी हुई अर्थव्यवस्था को ”बूस्टर डोजÓÓ देने का अहम् काम सौंपा गया है। साथ टेक्स सरलीकरण की भी अहम् जिम्मेदारी सौंपी गई है। कृषिमंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को देश के किसानों की आय दोगुनी करने का अहम् दायित्व सौंपा गया है व छोटे किसानों की पेंशन योजना की भी जिम्मेदारी सौंपी गई है, वहीं सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी को सड़कों का पूरे देश में नया ‘नेटवर्कÓ तैयार कर उसे कार्यरूप में परिणित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये तो चंद महत्वपूर्ण मंत्रियों का जिक्र है, वैसे हर मंत्री को मोदी जी ने समयबद्ध कार्यक्रम सौंपा है, यही नहीं स्वयं मोदी जी ने भी पांच साल का ‘विजनÓ तैयार किया है। उनके ‘विजनÓ की प्राथमिकता में अर्थ व्यवस्था, युवा रोजगार, खेत-किसान, सामाजिक सुरक्षा, आधारभूत ढ़ांचा, चौबीस घण्टे बिजली-पानी, शिक्षा, चुनाव प्रक्रिया सुधार जैसे अहम् मसलों पर ‘बड़ा कामÓ करने का फैसला लिया है। इस तरह कुल मिलाकर मोदी जी ने अपने पिछले पांच साल के कार्यकाल से कई अहम् सबक लेकर न सिर्फ पार्टी घोषणा-पत्र को मूर्तरूप देने का संकल्प लिया बल्कि उनकी धारणा है कि 2024 में अगले लोकसभा चुनाव के समय पूरा देश यह महसूस करें कि इस सरकार ने ‘कायापलटÓ किया है, ऐसा उन्होंने दृढ़ निश्चय भी किया है, वे अपने अगले कार्यकाल को देश के लिए प्रगति के राह का एक मजबूत ‘मील का पत्थरÓ स्थापित करना चाहते हैं।
आंतरिक सुरक्षा के चुनावी मुद्दों का मतलब, ऐसे मुद्दों से है, जिनका जिक्र चुनाव प्रचार में सबसे ज्यादा हुआ है। ध्यान रहे चुनाव प्रचार में आंतरिक सुरक्षा से जुड़े जितने भी मुद्दे हैं, उनका जिक्र अमित शाह ने ही किया। शाह ने नागरिकता कानून के मुद्दे और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का सबसे ज्यादा जिक्र किया। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा कि असम की तर्ज पर पश्चिम बंगाल में भी नागरिक रजिस्टर बनेगा। ध्यान रहे अब भाजपा का अगला लक्ष्य बंगाल फतह करना है, जहां पार्टी ने 42 में से 18 लोकसभा सीटें जीती हैं। सो, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और उसके बाद के लोकसभा चुनाव का एजेंडा अमित शाह से सधेगा। उन्होंने प्रचार के दौरान कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध को छोड़ कर बाकी सारे घुसपैठिए देश से निकाले जाएंगे। उन्होंने अपना एजेंडा साफ कर दिया है। बतौर गृह मंत्री वे इस एजेंडे को लागू करेंगे। सोचें, जब असम सहित पूर्वोत्तर के सात राज्यों और पश्चिम बंगाल में घुसपैठिए, जिनमें लगभग सभी मुस्लिम हैं, निकाले जाने लगेंगे तो क्या माहौल बनेगा? अभी तो सरकार कह रही है कि एनआरसी में जिनके नाम छूटें हैं, उन्हें सरकार देश से नहीं निकालेगी। पर अगर निकालने का फैसला हुआ तो जो माहौल बनेगा उसका कैसा राजनीतिक असर होगा, उसके बारे में अभी सिर्फ कल्पना की जा सकती है।
नागरिकता रजिस्टर, नागरिकता कानून और घुसपैठियों को निकालने की बातों के अलावा अमित शाह ने प्रचार के दौरान दो टूक अंदाज में कहा कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाया जाएगा। इसका बहुत व्यापक असर होगा। एक तरफ कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियां और अलगाववादी संगठन हैं, जिन्होंने अनुच्छेद 370 और 35ए को बचाने की कसम खाई है तो दूसरी ओर भाजपा और केंद्र सरकार उसे हटाने की पहल करेंगे। संभव है कि अनुच्छेद 35ए पर सुप्रीम कोर्ट से ही फैसला हो जाए। ध्यान रहे भाजपा के प्रचार में पूरे उत्तर भारत में कहा गया है कि आपका एक वोट जम्मू कश्मीर में अपना जमीन खरीदने और घर बनाने का अधिकार दिला सकता है। अमित शाह इस भावना के असर को समझ रहे हैं। सो, वे कश्मीर में जनसंघ और भाजपा के दशकों पुराने एजेंडे को लागू करने का प्रयास करेंगे।
इसके बाद समान नागरिक संहिता का मुद्दा है, जिस पर भाजपा बड़ी पहल कर सकती है। उस समय भी गृह मंत्री के नाते अमित शाह का बड़ा रोल होगा। सरकार तीन तलाक कानून को लागू करेगी और संभव है कि जनसंख्या नियंत्रण को लेकर भी कानून बने। ध्यान रहे सरकार बनने से ठीक पहले बाबा रामदेव ने कहा कि सिर्फ दो ही बच्चे पैदा करने का कानून अनिवार्य किया जाए। चौथा मुद्दा अयोध्या में राम मंदिर का है। भाजपा ने इसका भी वादा किया है। ऐसा लग रहा है कि चाहे अदालत से हो या संसद से कानून बना कर हो, भाजपा सरकार राम मंदिर का निर्माण कराएगी। तब देश के जो हालात होंगे, उसे संभालने के लिए भी शाह का गुजरात का अनुभव काम आएगा।
-ऋतेन्द्र माथुर