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बढ़ रही दरार

महज छह महीने पहले राजस्थान में भाजपा को सत्ताच्युत कर काबिज होने वाली कांग्रेस को आखिर क्या हो गया कि वह लोकसभा चुनाव में कुल 25 सीटों में से एक भी सीट नहीं जीत पाई? यह एक बड़ा व अहम सवाल है, जिसका जवाब ढूंढऩा कांग्रेस के लिए बहुत जरूरी हो गया है। आरोप-प्रत्यारोप से कुछ भी नहीं होने वाला है। जरूरत है जिम्मेदारी तय करने की ताकि पार्टी के भीतर साफ मैसेज जा सके कि अमुक-अमुक कारणों और व्यक्तियों की वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। आरोपों-प्रत्यारोपों पर तत्काल रोक लगाना होगा ताकि पार्टी की जड़ें और कमजोर नहीं न हो।
ताजा आरोप राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी ही सरकार के उप मुख्यमंत्री व राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट पर लगाया है और जोधपुर लोस सीट से अपने बेटे वैभव गहलोत की हार का ठीकरा पायलट के ऊपर फोड़ा है। इसका जवाब देना आसान नहीं है, लेकिन जोधपुर लोक सभा चुनाव परिणाम पर नजर डालने पर बहुत कुछ इससे जुड़ी जानकारियां हासिल हो सकती हैं। जोधपुर सीट से भाजपा के गजेंद्र सिंह शेखावत ने वैभव गहलोत को 2.7 लाख से भी अधिक मतों से हराया है। इतना ही नहीं, वैभव अपने पिता की सरदारपुरा विधानसभा सीट में भी 19,000 वोटों से पीछे रहे हैं और गहलोत अपने पोलिंग बूथ पर भी 400 से अधिक वोटों से पीछे रहे,
जबकि हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत 1998 से वहां से जीतते आ रहे हैं। वह यहां से पांच बार सांसद भी रह चुके हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो इतने बड़े कद्दावर नेता के बेटे का अपने सालों पुरानी विधानसभा सीट व पोलिंग बूथ तक से पिछडऩा बड़ी चिंता की बात है।
जोधपुर लोकसभा सीट पर हार इस लिहाज से भी चिंतनीय है कि इस लोकसभा के तहत आने वाली छह विधानसभा सीटों पर दिसम्बर में हुए चुनाव में कांग्रेस विजयी रही थी। यानी छह-छह विधायकों के रहने के बावजूद हार का सामना करना आश्चर्यजनक तो है ही। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि राजस्थान में कांग्रेस का प्रदर्शन साल 2014 के लोकसभा चुनाव से भी खराब रहा है और यह परिणाम इस लहाज से भी आश्चयर्जनक है कि महज पांच-छह महीने पहले यही कांग्रेस राज्य की कुल 200 सीटों में से 99 सीटें हासिल कर राज्य की कमान संभालने में सफल रही।
राज्य में नई सरकार होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में इस तरह का खराब प्रदर्शन आश्चर्यजनक है। इसके लिए राजस्थान कांग्रेस में आपसी मनमुटाव को प्रमुख कारण माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि राजस्थान में कांग्रेस के नेता मंच, सभा, रैलियों में अपनी एकता की तस्वीर तो पेश करते रहे, लेकिन हकीकत इससे ठीक उलट थी।
पार्टी में गुटबाजी चरम पर है। हालांकि इसमें भी दो राय नहीं कि इन चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा अच्छी रणनीति तैयार की और इसका उसे फायदा भी मिला। वहीं राज्य में दो बड़े कांग्रेस नेताओं के बीच मनमुटाव की खबरें सामने आ चुकी हैं। इससे पहले भी मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों में तनाव हो चुका है, जो अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। पार्टी के विधायक आज भी दो गुटों में बंटे हुए हैं। सचिन पायलट समर्थक विधायकों का कहना है कि अशोक गहलोत की जगह सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाए।
कांग्रेस हाईकमान को अगर आगे जीत की राह प्रशस्त करनी है तो इस मसले पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देना होगा। जानकार बताते हैं कि इस दिशा में कांग्रेस आलाकमान विचार-मंथन कर रही है और हाल-फिलहाल राजस्थान को लेकर कांग्रेस की तरफ से कोई बड़ा फैसला आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
-जयपुर से आर.के. बिन्नानी