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कांग्रेसी सिस्टम

यह लगातार दूसरा आम चुनाव है, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की इतनी बुरी पराजय हुई है। उसके पास लोकसभा में कुल सदस्य संख्या का 1/10 भी नहीं है, जिससे कि उसे आधिकारिक विपक्ष का दर्जा और नेता प्रतिपक्ष का पद मिल सके। सवाल उठता है कि ऐसा क्या हो गया है कि आजादी की लड़ाई लडऩे वाली इस पार्टी को इतनी बुरी हार हुई है? कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि पार्टी अपने सिस्टम पर काम नहीं कर रही है। अगर यूं कहा जाए की पार्टी का सिस्टम फेल हो गया है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ‘कांग्रेस सिस्टमÓ क्या है?
आजादी की लड़ाई के दौरान खड़ा हुआ कांग्रेस पार्टी का संगठन कैसे काम करता है, इसको लेकर आजादी के बाद एक दशक तक बड़ा भ्रम रहा। कांग्रेस पार्टी के 1962 के राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी ने कांग्रेस पार्टी का अध्ययन करने का जिम्मा उठाया। इस अध्ययन को रजनी कोठारी ने ‘द कांग्रेस सिस्टमÓ नाम से प्रकाशित कराया, जिसमें उन्होंने बताया कि कांग्रेस पार्टी ‘दबावÓ और ‘सहमतिÓ के सिद्धांत पर काम करने वाली पार्टी हैं, जिसमें अपनी मांगों को लेकर इसके अलग-अलग फ्रंटल संगठन और नेता दबाव बनाते हैं, जिस पर इसकी राष्ट्रीय कार्यसमिति आम सहमति से निर्णय लेती थी। राजनीतिक विज्ञानियों के अनुसार आम सहमति बनाते समय कांग्रेस पार्टी मध्यम मार्ग अपनाती थी। ‘दबावÓ और ‘सहमतिÓ से निर्णय लेने की खूबी के कारण आजादी के तीन दशक तक भारत में कोई विपक्ष नहीं पैदा हो पाया, क्योंकि तब कांग्रेस पार्टी का संगठन ही सरकार के विपक्ष का काम करता था।
यह एकदलीय शासन का एक मॉडल था। जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों एक ही दल के अंदर काम करते थे। 1980 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बेशक बहुत बड़ी जीत हासिल की, लेकिन कांग्रेस के एकतरफा वर्चस्व का दौर खत्म हो चुका था। कांग्रेस पार्टी का यह मॉडल तीन दशक तक चला, लेकिन इंदिरा गांधी के पार्टी की कमान सम्भालते ही यह दौर समाप्त हो गया। इंदिरा गांधी ने अपने बेटे संजय गांधी को पार्टी में नियंता बना कर कांग्रेस की पुरानी परंपरा को तोडऩे का सिलसिला शुरू कर दिया। उन्होंने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी में गांधी-नेहरू परिवार के वफादारों को नियुक्त करने की परम्परा शुरू की, जिसकी वजह से गांधी-नेहरू परिवार की नीतियों से असहमति रखने वाले नेताओं के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं बची। इसकी वजह से धीरे-धीरे करके एक-एक क्षेत्रीय नेता कांग्रेस छोड़ कर जाते रहे, और अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाते चले गए। ऐसे दलों में टीएमस, एनसीपी, वाइएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति, बीजू जनता दल और अनगिनत छोटे दल शामिल हैं। उनमें से कई दल बाद में कांग्रेस में लौट आए, लेकिन जो जनाधार लेकर वो निकले थे, उन्हें वो वापस कांग्रेस में नहीं जोड़ पाए। हरियाणा विकास पार्टी और हरियाणा जनहित कांग्रेस इसका उदाहरण है। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत की राजनीति में तेजी से क्षेत्रीय पार्टियों का उदय हुआ, और कांग्रेस चुनाव दर चुनाव सत्ता से दूर होती चली गयी।
2004 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अच्छा परफॉर्म किया और यूपीए के बैनर तले सरकार बनाई। लेकिन उस चुनाव में भी यूपीए के निर्माण का श्रेय किसी कांग्रेसी नेता को नहीं, बल्कि दिग्गज वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत को जाता है, जिन्होंने आगे बढ़कर लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, करुणानिधि आदि को यूपीए के बैनर तले लाने की पहल की। यह हरकिशन सिंह सुरजीत का पंजाब कनेक्शन ही था कि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने से इनकार के बाद डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए। अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से सुरजीत धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से हटते चले गए और उसके साथ ही यूपीए का कुनबा बिखरता चला गया। 2009 का आम चुनाव आते-आते इस कुनबे से वामपंथी पार्टियों समेत आरजेडी, एलजेपी और डीएमके तक बाहर हो चले थे, परिणामस्वरूप ये सारी पार्टियां 2009 का आम चुनाव अलग-अलग लड़ीं।
यूपीए से जब एक-एक करके राजनीतिक पार्टियां अलग जा रहीं थी, उस समय कांग्रेस पार्टी के पास कोई भी ऐसा नेता नहीं था जो कि इनको रोक पाए। यहां सवाल उठता है कि कांग्रेस के प्रणब मुखर्जी, अर्जुन सिंह, गुलाम नबी आजाद जैसे दिग्गज नेता यूपीए के सहयोगी दलों को रोक क्यों नहीं रोक पा रहे थे, और अपने तमाम घटक दलों के बिछड़ जाने के बाद भी यूपीए 2009 में चुनाव कैसे जीत गया। सबसे पहले आते हैं पहले सवाल पर, जिसका जवाब राहुल गांधी की राजनीति में इंट्री में छुपा है। यूपीए बनने के समय ही राहुल गांधी की कांग्रेस में इंट्री हुई थी। उन दिनों वो अपनी राजनीति की ट्रेनिंग जेएनयू के कुछ वामपंथी विचारधारा के प्रोफेसरों से प्राप्त कर रहे थे, जिनका मानना था कि (जातीय) पहचान के आधार पर बने क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस का वोट बैंक छीन लिया है, इसलिए उनको खत्म किए बिना कांग्रेस को अपने दम पर खड़ा नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी ने अपनी उस शिक्षा का प्रयोग करते हुए भट्टा परसौल में आंदोलन के माध्यम से पहले बीएसपी को निशाना बनाया, फिर आगे चलकर अपने सहयोगी लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव तक को निशाना बना दिया। लालू यादव चुनाव न लड़ सकें, इसके लिए राहुल गांधी ने सरकार का वो अध्यादेश भी फाड़ दिया, जिसके पारित होने से लालू यादव चुनावी राजनीति से बाहर न होते। यह सब करते हुए राहुल यह तक नहीं समझ सके कि अगर एक बार इन पार्टियों से किसी खास समुदाय का मतदाता छिटक भी जाता है तो वह जरूरी नहीं है कि वह वापस कांग्रेस के पास ही आए, बल्कि वो मतदाता बीजेपी के पास भी जा सकता है।
अब आते हैं दूसरे सवाल यानी यूपीए की 2009 में सफलता पर। 2009 के लोकसभा चुनाव परिणाम पर अध्ययन करते समय इसे यूपीए की जनकल्याण की योजनाओं की सफलता तक सीमित कर दिया जाता है। ऐसा करते समय विपक्ष की कमजोरियों पर बात ना करने की चूक हो जाती है। दरअसल उस चुनाव में भी कुछ ऐसा ही था। अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से हट जाने, प्रमोद महाजन की अचानक मृत्यु, और आडवाणी की जिन्ना के मजार पर फूल चढ़ाने से उठे विवाद की वजह से बीजेपी पूरी तरह निकल नहीं पायी थी। उस चुनाव में बीजेपी की हार के ये भी बड़े कारण थे।
गहलोत ने गुजरात चुनाव में पार्टी के लिए बेहतरीन कार्य किया, लेकिन राजस्थान, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ में चुनावी सफलता के बाद अचानक से गहलोत को फिर से राजस्थान का मुख्यमंत्री बना कर भेज दिया गया। अब राहुल गांधी खुद ही कह रहे हैं कि गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने के लिए उन पर संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने दबाव बनाया था, जबकि वो युवा सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाह रहे थे। लोकसभा चुनाव के ऐन वक्त पर पार्टी में दूसरे नम्बर के नेता को एक राज्य का मुख्यमंत्री बनाकर भेजने की गलती कांग्रेस ही कर सकती है। वरिष्ठ नेताओं द्वारा राहुल गांधी को ऐसा करने के लिए दबाव बनाने की मूल वजह गहलोत के आने से उनकी शक्ति में कमी होना था। राहुल गांधी इस बात को नहीं समझ पाए। ऐसा ही कुछ मप्र में भी हुआ। जिसका परिणाम यह हुआ कि छह माह पहले विधानसभा चुनाव जीतने वाली पार्टी लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार गई। अब राहुल इसका दोष दूसरों पर मढ़ कर अपनी कमजोरी पर पर्दा डाल रहे हैं।
– दिल्ली से रेणु आगाल