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नारों की लड़ाई

बंगाल में जय श्री राम के नारे के सहारे लोकसभा चुनाव में चमत्कार कर दिखाने वाली बीजेपी ने अब साथ में जय महाकाली का नारा भी दिया है। इसे ममता बनर्जी के जय हिंद और जय बांग्ला नारे का जवाब माना जा रहा है। बंगाल में घर-घर कालीपूजा होती है और बीजेपी को लगता है कि जय महाकाली का नारा लगाने से ममता बनर्जी उसे बाहरी साबित करने की कोशिशों में कामयाब नहीं होंगी।
साढ़े तीन दशक के वामपंथी शासन को हटाने का अवसर ममता बनर्जी को संयोग से मिला था। वे लड़ तो बहुत समय से रही थीं पर सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि आंदोलन ने उनको निर्णायक मौका दिया। जबकि भाजपा ने अपना अवसर खुद बनाया है। बहुत होशियारी से भाजपा ने एक जाल बिछाया, जिसमें ममता बनर्जी फंसती दिख रही है। वे मां, माटी और मानुष की राजनीति करती थीं और अब मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली नेता के तौर पर दिखने लगी हैं। सोचें, भाजपा ने कहां से शुरू किया था? पांच साल पहले नरेंद्र मोदी ममता के साहस की तारीफ करते थे और लेफ्ट पर हमला करने के लिए उनके बनाए नैरेटिव का इस्तेमाल करते थे। वे कहा करते थे साढ़े तीन दशक में लेफ्ट ने इतने गडढ़े बनाए हैं कि ममता दीदी को उन्हें भरने में ही बहुत समय लग जाएगा। अब जबकि लेफ्ट का बोरिया बिस्तर बंगाल सहित पूरे देश में बंध गया है तो ममता के प्रति उनका सद्भाव भी जानी दुश्मनी में बदल गया है। अब मोदी के लोग जय श्री राम के नारे लगा रहे हैं और ‘ममता बानोÓ कह कर मुख्यमंत्री को संबोधित कर रहे हैं।
केंद्र में सरकार बनने और तमाम किस्म के नए साजो सामान से लैस होने के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल में आक्रामक राजनीति शुरू की। यहीं पर ममता बनर्जी ने भाजपा को समझने में गलती की और उसके बिछाए जाल में फंस गई। ममता को लगा कि भाजपा एक कमजोर दुश्मन है, जिससे ज्यादा आसानी से लड़ा जा सकता है। उनके लिए लेफ्ट और कांग्रेस दोनों बड़े दुश्मन थे। वे समझती थीं कि लेफ्ट और कांग्रेस का पूरे प्रदेश में संगठन है और दोनों का वोट भी कमोबेश वहीं है, जो तृणमूल कांग्रेस का है। इस लिहाज से उनको भाजपा बाहरी पार्टी लगी, जिसका न तो राजनीतिक आधार प्रदेश में था, न वह कोई संघर्ष कर रही थी और न उसका कोई सांस्कृतिक आधार था। भाजपा प्रदेश में उन्हीं इलाकों में राजनीति करती थी, जहां बचा हुआ औद्योगिक इलाका था और प्रवासी लोग थे। इसलिए ममता को लगा कि बांग्ला मानुष में भाजपा अपनी जगह नहीं बना पाएगी।
तभी उन्होंने भाजपा को अपनी तरफ से चुना और उसे मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान कर उससे लडऩा शुरू किया। स्थिति भाजपा के अनुकूल थी, इसलिए उसने लड़ाई चलने दी। जहां पहले भाजपा से लेफ्ट का काडर लड़ रहा था वहां भाजपा और संघ के लोग लडऩे लगे। इस लड़ाई का फर्क यह था कि लेफ्ट के लोग उन्हीं नारों के साथ लड़ते थे, जो उनकी और प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा थे। जबकि भाजपा ने कमंडल की राजनीति के समय ईजाद किए गए जय श्री राम के नारे के साथ लडऩा शुरू किया। भाजपा अपनी राजनीतिक लड़ाई एक धार्मिक नारे के सहारे लड़ रही थी। ममता ने इस लड़ाई को बढ़ावा दिया, जिसका नतीजा यह हुआ है कि प्रदेश में भाजपा अपने आप मुख्य विपक्षी के तौर पर उभरने लगी। 2016 के विधानसभा चुनाव में 10 फीसदी वोट लेकर कांग्रेस से भी पीछे चौथे नंबर की पार्टी रही भाजपा उसके बाद हर उपचुनाव में ममता बनर्जी की कृपा से दूसरे स्थान पर रही। वह तृणमूल की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गई और 2019 के लोकसभा चुनाव में 40 फीसदी वोट के साथ ममता की लगभग बराबरी में पहुंच गई।
द्य अक्स ब्यूरो