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अपना-अपना राग

सत्ता में रहते हुए भाजपा में जो एकता देखने को मिलती थी वह सत्ता जाते ही गायब हो गई। अब स्थिति यह है कि पार्टी के नेता अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं। यही नहीं केंद्रीय नेतृत्व की नजर में अपना कद बढ़ाने के लिए अलग-अलग कार्यक्रम कर रहे हैं। इन दिनों भाजपा में कमलनाथ सरकार के खिलाफ आंदोलन करने को लेकर श्रेय लेने की होड़ मची है। पानी-बिजली और कानून व्यवस्था पर सूबे के नेता अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन कर आंदोलन कर रहे हैं। ऐसा पहले विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस में होता था।
10 जून को जहां भोपाल में कानून-व्यवस्था बिगडऩे को लेकर आंदोलन हुआ। पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता के नेतृत्व में निकाले गए इस मार्च में शिवराज सिंह चौहान, महापौर आलोक शर्मा और अन्य नेता शामिल हुए। वहीं 11 जून को भाजपा के जिलाध्यक्ष विकास वीरानी ने भोपाल, उज्जैन, नौगांव में दुष्कर्म और हत्या की घटनाओं की पीडि़त बच्चियों को श्रद्धांजलि देने के लिए श्रद्धांजलि सभा भी आयोजित की। वहीं इंदौर में किसानों की समस्याओं को लेकर राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने उसी दिन किसान आक्रोश रैली निकाली। यह इस बात का संकेत है कि पार्टी के नेता अलग-अलग कार्यक्रम कर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी कड़ी में बिजली संकट को लेकर 12 जून को प्रदेश भाजपा ने पूरे प्रदेश में चिमनी यात्रा निकाली। पार्टी के नेता भी असमंजस में हैं कि इन अलग-अलग आंदोलन के पीछे संगठन में समन्वय की कमी है या कोई विशेष रणनीति। हालांकि भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह कहते हैं कि सभी नेता वरिष्ठ हैं और संगठन की सहमति से ही आंदोलन कर रहे हैं। उधर 11 जून को पूर्व मंत्री जयंत मलैया के नेतृत्व में बिजली कटौती के खिलाफ दमोह में चक्काजाम किया गया। शहर के बिजली दफ्तर के सामने भाजपाइयों ने लगभग दो घंटे आंदोलन किया।
सवाल उठता है कि भाजपा का प्रदेश संगठन आखिर किस मोड़ पर खड़ा हो गया है। जहां बड़े और जिम्मेदार नेता व्यक्तिगत स्तर पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हैं। शिवराज सिंह चौहान के सड़क पर उतरने के बाद भाजपा संगठन जो संदेश पूरे प्रदेश में अपने कार्यकर्ताओं को नहीं दे पाया वह शिवराज ने जरूर कैंडल मार्च श्रद्धांजलि सभा से दे दिया, लेकिन संगठन स्तर पर जमावट या तो और फ्लॉप साबित हो रही या फिर उसने कमलनाथ सरकार के खिलाफ सड़क की राजनीति को लेकर अभी पूरी तरह से मन नहीं बनाया है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा ने भाजपा के बिजली, किसान और कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति के नाम पर किए जा रहे आंदोलन को पार्टी नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा बताया है। उन्होंने कहा कि भाजपा नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए अलग-अलग आंदोलन कर रहे हैं। सरप्लस बिजली के बाद भी चिमनी यात्रा निकालना हास्यास्पद है। भाजपा सरकार के मुकाबले कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर है। छह महीने में महिला अपराध में 5.5 फीसदी की कमी आई, लेकिन उप्र के अलीगढ़, मेरठ व बरेली की घटनाओं पर भाजपा मौन है। किसानों का दो लाख रुपए का कर्ज माफ होने से किसान खुश हैं। इसके बाद भी भाजपा में नंबर एक बनने की होड़ में नेता एक-दूसरे को नीचा दिखा रहे हैं। जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
दरअसल भाजपा में नेता हो या कार्यकर्ता सबकी नजर दिल्ली पर टिकी हुई है। यानी मोदी सरकार बनने के बाद भाजपा नेतृत्व की आखिर मध्य प्रदेश के लिए क्या गाइडलाइन और उसकी क्या दिशा होगी। तब मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कमलनाथ सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल अपनी ओर से संदेश दिया है कि जनता के दुख दर्द में वह उनके साथ हंै। जानकारों का कहना है कि भाजपा के दिग्गज नेताओं में होड़ मची हुई है कि वे जनता को इस बात का एहसास कराएं कि वे ही उनके हमदर्द हैं। साथ ही नेता अपने केंद्रीय संगठन को यह बतलाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे लगातार सक्रिय हैं।
द्य अरविंद नारद