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हरियाली गायब

एक ओर जहां हरियाली की कमी के चलते पर्यावरण का संतुलन बिगडऩे से प्रकृति का प्रकोप बार-बार सामने आ रहा है। सरकारें ही शहरी विकास और देश के विकास को रफ्तार देने, लंबी-चौड़ी सड़के बनाने के नाम पर लाखों ऐसे वृक्षों का सर्वनाश करने का फरमान जारी करने में विलंब नहीं करतीं, जिनमें से बहुत से पेड़ तो डेढ़ सौ साल तक पुराने नीम, पीपल और बरगद जैसे विशालकाय होते हैं। देश के सबसे अधिक वन क्षेत्र वाले प्रदेश मप्र में भी तेजी से हरियाली गायब हो रही है। जबकि यहां हर साल करोड़ों पौधे रोपने का दावा किया जाता है। प्रदेश में 60 वर्ग किमी हरियाली घटी है और ये वन क्षेत्र आदिवासी बहुल 18 जिलों में आता है।
भाजपा सरकार के राज में हरियाली भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े बिना नहीं रह पाई। 2015 में यह 22 प्रतिशत थी। एक सर्वे में खुलासा हुआ है कि प्रदेश में 60 किलोमीटर क्षेत्र में हरियाली लगातार घट रही है। पिछली सरकार ने 350 करोड़ रुपए खर्च कर 50 करोड़ पौधे रोपने का दावा किया था, मगर हकीकत में सिर्फ 20 करोड़ पौधे जमीन पर दिख रहे हैं। सरकारी दावों में 30 करोड़ पौधे सूख चुके हैं। बता दें कि प्रदेश में हर साल 7 से 8 करोड़ पौधे वन विभाग और अन्य सरकारी विभागों द्वारा लगाए जा रहे हैं, फिर भी हरियाली बढऩे की बजाय घट रही है। भारतीय वन सर्वेक्षण संस्थान की सर्वे रिपोर्ट से पता चलता है कि प्रदेश में 60 वर्ग किमी हरियाली घटी है, जबकि पौधरोपण पर हर साल औसतन 60 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इस हिसाब से पांच साल में 350 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी हरियाली नहीं बढ़ी।
प्रदेश में 60 वर्ग किमी हरियाली घटी है और ये वन क्षेत्र आदिवासी बहुल 18 जिलों में आते है। संस्थान ने रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया है। इस हिसाब से आदिवासी बहुल इलाकों में जंगलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा रहा है। वन अधिकार कानून आने के बाद पेड़ों की कटाई में तेजी आई है। वहीं अतिक्रमण भी बढ़ा है। पांच साल में भोपाल में 2.50 लाख ऐसे पेड़ काटे जा चुके हैं, जिनकी उम्र 40 वर्ष से अधिक थी। 95 हजार 850 पेड़ तो उन 9 स्थानों पर काटे गए हैं, जहां कोई सरकारी या व्यावसायिक निर्माण प्रोजेक्ट चल रहे हैं। थोड़ा और पीछे चलें तो बीते एक दशक में राजधानी में ग्रीन कवर 35 फीसदी से घटकर 9 फीसदी पर आ गया है। यानी दस साल में भोपाल शहर का कुल 26 प्रतिशत ग्रीन कवर खत्म कर दिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि शहर के ग्रीन कवर में 13 प्रतिशत की गिरावट बीते 3 साल में आई है। व्यापक स्तर पर पेड़ों की कटाई वाले 9 स्थानों पर 225 एकड़ ग्रीन कवर के सफाए के बाद सीमेंटीकरण हो चुका है। भोपाल में पड़ रही भीषण गर्मी का सबसे बड़ा कारण यही है, क्योंकि इसी वजह से यहां औसत तापमान 5 से 7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। शहर के पर्यावरण को सर्वाधिक नुकसान 5 साल यानी 2014 से 2019 के बीच हुआ है। इसी समय लगभग 60 प्रतिशत पेड़ काटे गए। जबकि 40 प्रतिशत पेड़ों की कटाई 2009 से 2013 के बीच हुई है। डिकेडल डीफॉरेस्टेशन ऑफ भोपाल सिटी 2009 से 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल में एक दशक में 26 प्रतिशत ग्रीन कवर घट गया, जबकि शहर के संसाधनों पर पांच लाख नई आबादी का बोझ बढ़ा है।
राजधानी में प्लांटेशन के लिए जिम्मेदार राजधानी परियोजना प्रशासन का दावा है कि वर्ष 2001 से अब तक शहर के अलग-अलग स्थानों पर 28 लाख पौधे लगाए गए हैं। वहीं राजधानी में कुछ सालों में तमाम सरकारी प्रोजेक्ट के लिए बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई की गई है, लेकिन इसकी भरपाई के लिए सिर्फ कागजी खानापूर्ति हुई। पेड़ों की कटाई से पहले ली जाने वाली मंजूरी में भी पेड़ों की संख्या आधी से कम या एक चौथाई ही दर्शाई जाती रही है। बारिश शुरू होते ही वन विभाग वन महोत्सव के नाम पर करोड़ों पौधे लगाएगा। इसकी तैयारियां शुरू हो गई है। लगाए जाने वाले इन पौधों को बचाने के लिए वन विभाग की कोई खास योजना नहीं होती। उल्लेखनीय है कि देश में क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे ज्यादा 77 हजार 462 वर्ग किमी वन क्षेत्र मध्य प्रदेश में है।
वृक्ष हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, इसे समझने के लिए न्यूयार्क के पर्यावरण संरक्षण विभाग द्वारा जारी तथ्यों पर गौर करना बेहद जरूरी है। इसमें बताया गया है कि सौ विशाल वृक्ष प्रतिवर्ष तिरपन टन कार्बन डाईऑक्साइड और दो सौ किलोग्राम अन्य वायु प्रदूषकों को दूर करते हैं और पांच लाख तीस हजार लीटर वर्षा जल को थामने में भी मददगार साबित होती हैं।
-राजेश बोरकर