awedh-khanan

सरकार मालामाल जनता बीमार

डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड (डीएमएफ) अर्थात जिला खनिज विकास निधि के दुरुपयोग की कहानी देशव्यापी है और इसमें छत्तीसगढ़ भी पीछे नहीं है। पिछली रमन सिंह सरकार में खनन की इस राशि पर मिलने वाली रॉयल्टी पर कलेक्टर का एकाधिकार होता था। अब सूबे की भूपेश बघेल सरकार ने नया कुछ करने के उद्देश्य से जिले के प्रभारी मंत्री को इस फंड का प्रभारी बना दिया है यानि पहले एक आदमी इसका दुरुपयोग करता था अब दो लोग मिलकर करेंगे। जल, जंगल, जमीन के पैरोकार तो डीएमएफ के स्ट्रक्चर पर ही सवाल खड़ा करते हैं। उनका आरोप है कि खनिज संसाधनों से भरपूर क्षेत्र को हथिया कर वहां के लोगों को विकास का झुनझुना पकड़ा देने का नाम है खनिज विकास निधि।
दरअसल आठ साल पहले बने इस कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि खनिजों के खनन से मिलने वाली रॉयल्टी की राशि को खनन प्रभावित क्षेत्र के विकास में लगाई जाये। मसलन उस क्षेत्र में स्कूल अस्पताल, सड़क, पानी, बिजली, रोजगार, खेती के लिए पानी के अलावा वे सारी बुनियादी सुविधाएं विकसित होना चाहिए जो एक आम आदमी की जरूरत हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। इसे रायगढ़ जिले के घटनाक्रम से समझा जा सकता हैं। अधिकारिक सूत्रों की यदि मानें तो राज्य के एक दो जिलों को छोड़ शेष 25 जिलों में कोयला, डोलामाईट, आयरन ओर, बाक्साईड, टीन, रेती के अलावा अन्य ऐसे कीमती खनिजों का खनन होता है। जिससे रॉयल्टी के रूप में सरकार को सालाना 1200 करोड़ रुपए का राजस्व आता है जो डीएमएफ कहलाता है। रायगढ जिले की तमनार कोल माईन्स से पिछले साल 183 करोड़ रुपए की रॉयल्टी कलेक्टर रायगढ़ को मिली लेकिन इसका खर्च कहां हुआ इसे देखा जाये।
वैसे तो कोलमाईन्स के 10 किलोमीटर के एरिया में आने वाले गावों में यह पैसा खर्च होना था लेकिन 50 किलोमीटर दूर रायगढ जिला मुख्यालय में इस पैसे से लिफ्ट लगवा ली गई, कैलो नदी के दोनों तटों पर मरीन ड्राईव बना दिया गया, पिछली सरकार की विकास यात्रा के लिए सड़कों का पैच वर्क और हर साल होने वाला चक्रधर समारोह भी इसी पैसे से कर लिया गया! यहां तक कि चुनाव के दरम्यान जिला प्रशासन द्वारा कराई जाने वाली विडियोग्राफी भी इसी पैसे से कर ली गई। साथ ही 183 करोड़ की वसूली के एवज 200 करोड़ रूपये खर्च करने का प्लान भी बना दिया गया। इस जिले की एक पूर्व विधायक के गांव में स्कूल की बाउन्ड्री भी इसी पैसे से बन गई जबकि यह गांव इस सीमा में है ही नहीं। दरअसल जिन कामों में कमीशनखोरी की गुंजाईश रही वह सारे काम हो गए। अब इस खनन क्षेत्र में खनन शुरू होने से शुरू हुई बीमारियों पर नजर डालें तो और भी गंभीर है। दरअसल यहां जब से कोल की माईनिंग शुरू हुई पानी में फ्लोराईड की मात्रा बढ़ गई। जिससे इस क्षेत्र के दो सरईटोला और मूढ़ा गांव की पूरी आबादी कुबड़ी हो गई है यानि महिलाओं और पुरुषों के कुबड़ निकल गए हैं।
आंगनबाड़ी के बच्चो के दांत काले हो गए हैं। यहां एक वाटर ट्रीटमेन्ट प्लान्ट के अलावा किसानों को सिंचाई के लिए पानी और रोजगार की दरकार थी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और न ही हो रहा है। जनचेतना के सदस्य राजेश त्रिपाठी का कहना है कि ‘मनरेगा की तर्ज पर जब तक डीएमएफ का सोशल आडिट सिस्टम लागू नहीं होगा तब तक इसके दुरुपयोग को नहीं रोका जा सकता। इसके लिए ग्रामसभा से माईक्रोप्लान बनना चाहिए।Ó
राजधानी रायपुर से महज 70 किलोमीटर की दूरी पर बलौदा बाजार जिले को सीमेन्ट प्लान्टों का हब इसलिए कहा जाता है कि यहां पर डोलामाईट की खदानें हैं। इस जिले में लार्सन एंड टुब्रो, इमामी, अल्ट्राटेक, जैसी सात सीमेन्ट कम्पनियों की चिमनियों से निकलने वाली राख ने किसानों की हजारों एकड़ जमीन को बंजर तो बना दिया हैं। लेकिन इन जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए कोई उपाय डीएमएफ फंड से नहीं किया गया अलबत्ता इस फंड से नया रायपुर में हरियर छत्तीसगढ़ के नाम से पेड़ लगवा दिए गए। यहां के आसपास के 40 गावों में लोगों को चर्मरोग की शिकायत हैं। यहां के लोगों का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए जब सरकारी खर्च का प्रावधान है तो डीएमएफ के फंड से नया मानव संसाधन तैयार होना चाहिए। ग्राम पंचायत को इसकी जानकारी नहीं दी जाती।
-रायपुर से टीपी सिंह