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सूखे की मार

हर साल सूखे की मार झेलने वाले बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की तलाश में एक पूरे इलाके के लोगों ने अपना गांव छोड़ दिया। मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड क्षेत्र के दमोह जिले के एक गांव में करीब 400 लोग अपने गांव को छोड़कर जबलपुर जिले में विस्थापित हो चुके हैं। गांव से पलायन की वजह सिर्फ प्रचंड सूखा है, जिसकी वजह से यहां के लोगों को पानी तक के लिए मोहताज होना पड़ रहा है।
पलायन के लिए मजबूर यह लोग दमोह के पंजहीरी गांव के रहने वाले हैं। बताया जा रहा है कि पंजहीरी गांव में इस बार अप्रैल महीने की शुरुआत से ही सूखे के हालात बनने लगे थे और इसी के प्रभाव से गांव के आसपास के तमाम जलाशयों में भी पानी का स्तर घटने लगा। मई तक गांव में पानी का स्तर बेहद कम हो गया और यहां पर लगे तीन ट्यूबवेल भी सूख गए। स्थानीय आंकड़ों के अनुसार, सहजपुरा पंचायत जिसमें की पंजहीरी गांव स्थित है उसमें सिर्फ 13 हैंडपंप हैं। इनमें से तीन हैंडपंप पंजहीरी गांव में हैं और सभी से पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। गांव में बने सूखे के इसी हालात के कारण तमाम लोगों ने अपने घरों के छोड़कर जबलपुर का रुख कर लिया है। ग्रामीणों के मुताबिक, पंजहीरी गांव में सिर्फ वही लोग रह रहे हैं जो कि पलायन कर दूसरी जगह पर नहीं जा सकते।
सूखे की यह स्थिति सिर्फ पंजहीरी में नहीं बल्कि इस पूरे इलाके में है। दमोह के तेंदूखेड़ा ब्लॉक में कुल 181 गांव हैं और पंजहीरी इनमें से एक है। इस ब्लॉक में ही पंजहीरी के अलावा करीब 100 से अधिक गांव पानी की समस्या से जूझ रहे हैं और हालत यह है कि इस इलाके में लोगों को 2-3 किमी दूर जाकर एक बाल्टी पानी मिल पाता है। जबलपुर की पाटन तहसील के पास स्थित पंजहीरी में मुख्य रूप से दलित और पिछड़ी जातियों के लोग रहते हैं। इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिन्हें सूखे के कारण घर छोडऩा पड़ा है और अब यह लोग जबलपुर में रिक्शा चलाने और फुटपाथ पर सोने के लिए मजबूर हो गए हैं। पंजहीरी के स्थानीय लोगों का कहना है कि गांव के लोगों को पानी के लिए 8 किमी दूर जाना पड़ता है और इसके कारण यहां जीवन यापन करना काफी मुश्किल हो गया है। छतरपुर से झांसी की ओर जाने वाले मार्ग पर अलीपुरा के पास का मैदान में बदल चुका तालाब बुंदेलखंड के हालात को बयां करने वाला है। तालाब की मिट्टी पूरी तरह शुष्क है और हवाओं के साथ उड़ता गुबार यहां के डरावने हालात की गवाही दे रहा है। पानी की समस्या गंभीर रूप ले चली है, मगर चुनावी मौसम में भी यह समस्या राजनीतिक दलों के लिए मुद्दा नहीं बन पाई है। बुंदेलखंड सेवा संस्थान के मंत्री वासुदेव सिंह बताते हैं कि गर्मी बढऩे के साथ पानी का संकट गहराने लगा है। आबादी वाले इलाकों के अधिकांश तालाब तो जलविहीन हो चुके हैं, मगर जंगलों के बीच के तालाबों में अब भी पानी है, मगर यह ज्यादा दिन के लिए नहीं है। कई हिस्सों में तो लोगों को पानी हासिल करने के लिए कई-कई किलो मीटर का रास्ता तय करना पड़ता है।
मध्यप्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़, दमोह व पन्ना में पानी का संकट गंभीर रूप ले चला है। राज्य के वाणिज्य कर मंत्री ब्रजेंद्र सिंह राठौर ने बुंदेलखंड के तालाबों के बुरे हाल के लिए पूर्ववर्ती बीजेपी की सरकार को जिम्मेदार ठहराया। राठौर का कहना है कि कांग्रेस की केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज में राशि दी, मगर उसका लाभ यहां के लोगों को नहीं मिला। टीकमगढ़ में 500 और इतने ही तालाब छतरपुर जिले में है, इनकी स्थिति अच्छी नहीं है। लिहाजा, नदियों को तालाब से जोड़ा जाए तो यहां की स्थिति में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। राज्य सरकार तालाबों के हालात सुधारने पर काम करेगी।
जलपुरुष के नाम से पहचाने जाने वाले राजेंद्र सिंह भी बुंदेलखंड की पानी संकट को लेकर कई बार चिंता जता चुके हैं। उनका कहना है कि बुंदेलखंड में पानी रोकने के पर्याप्त इंतजाम नहीं है, जिसका नतीजा है कि 800 मिलीमीटर वर्षा के बाद भी यह इलाका सूखा रहता है। इसलिए जरूरी है कि तालाबों को पुनर्जीवित किया जाए, नदियों के आसपास से अतिक्रमण हटे, पानी का प्रवाह ठीक रहे। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा। इस क्षेत्र के तालाब ही नहीं नदियां भी गुम हो गई है, जिसके चलते जल संकट साल-दर-साल गहराता जा रहा है।
-सिद्धार्थ पाण्डे