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लौट के उद्धव मथुरा आए

जब कृष्ण उद्धव की ज्ञान भरी बासी बातों से बोर हो गए तो उन्होंने उद्धव से कहा, हे सरकारी वेतनधारी पंडित, आपने गोपियों की माया मोह से मुझे छुड़ाने हेतु अपने इस देह रुपी आस्था चैनल से 24 & 7 लगातार अनेक धार्मिक प्रवचनों का प्रसारण किया पर एक छोटी सी बात फिर भी बताना भूल गए। उन्होंने कृष्ण से पूछा, आखिर वो कौन सी बात है जिसे मैं बताना भूल गया। कृष्ण ने कहा, बरसाने के दौरे की बात।
कृष्ण के मुंह से इस तरह का सामान्य प्रश्न सुन कर उद्धव को घोर आश्चर्य हुआ। कृष्ण के ऊपर कुछ क्रोध भी आया। इतना साधारण प्रश्न, और इतने महान पंडित से। पर उद्धव जी अपने गुस्से को पान की पीक की तरह से पी गए और कार्यालयीन विनम्रता से जवाब दिया, जी, उस क्षेत्र में अभी तक कभी न सूखा पड़ा, और न बाढ़ आई है। इसलिए वहां का दौरा करने का अवसर अभी नहीं मिला है।
कृष्ण ने कहा, तो ठीक है, आप कुछ दिवस के लिए सरकारी दौरे पर बरसाने चले जाइए। किसी घिसे हुए सरकारी बाबू की तरह से उद्धव को भी राजधानी का आनंद छोड़ कर बरसाने जैसे पिछड़े इलाके के दौरे का यह प्रस्ताव बड़ा घातक लगा। लेकिन उन्हें जाना पड़ा।
उद्धव की शहरी छटा धजा को देख कर गांव के बच्चों ने पहले ही शोर मचा कर मथुरा से मेहमान का शोर मचा दिया। गोप गोपियां कान्हा-कान्हा करते हुए दौड़े चले आए पर वहां आकर उद्धव को देख कर वे लोग ऐसे ही निराश हुए। गोपियों ने तो उन्हें देखते ही ऐसे मुंह बनाया जैसे कि आजकल घर के टीवी पर सास बहु का सीरियल आता देख कर घर के पुरुष मुंह बिचका लेते हैं। सरकारी बाबू की मुफ्त सेवा करने के डर से गोप ग्वाले भी एक-एक करके सटकने लगे। पर उद्धव सरकारी प्रशासन के साथ-साथ एक एनजीओ भी चलाते थे।
इसलिए उन्हें लोगों को बातों के जाल में फंसाने का व्यावहारिक तजुर्बा था। वे सट से भागते हुए लोगों के आगे खड़े हो गए और बोले, हे, बरसाने वासियों मैं कोई वसूली इंस्पेक्टर नहीं हूं, जिसे देख कर आप भाग रहे हैं। मैं तो आपके प्रिय कृष्ण का परम प्रिय मित्र हूं। यहां पर वे जिस तरह से आप लोगों के साथ टाइम पास किया करते थे, मथुरा ठीक वैसे ही मेरे साथ टाइम पास करते हैं। इस बराबरी के रिश्ते से आप और मैं भी मित्र हुए। है कि नहीं। ये कहते-कहते उन्होंने एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे को धन्य किया और कहना शुरू किया, देखिए हम हैं प्रकांड प्रतिभाधारक, उच्च प्रशासक, कृष्ण उपदेशक श्री उद्धव यानि कि मथुरा नरेश के सबसे विश्वस्त साथी। श्री कृष्ण ने मुझे एक अत्यंत आवश्यक मिशन पर यहां भेजा है और वह यह है कि आप लोगों के आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक चिंतन का अध्ययन करना और उसकी रिपोर्ट तैयार करके देश के बुद्धिजीवियों के सामने रखना। वे बुद्धिजीवी उस रिपोर्ट को पढ़ कर उस पर बहस करेंगे फिर उस बहस पर देश के मंत्री बहस करेंगे, उसके बाद देश का दरबार बहस करेगा और तब उसके बाद तय होगा कि आप लोगों के आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक चिंतन का सूचकांक क्या है।
उद्धव की ज्ञान भरी बातों की गर्मी से वातानुकूलित कमरे में बैठे कृष्ण को भी पसीना आ जाता था फिर वे बेचारे गांव वाले तो खुले बदन, खुली जगह पर बैठे थे। उनके तो होश उड़ गए। उन्हें समझ ही नहीं आया कि अपनी छोटी सी बुद्धि से इतनी बड़ी बात का क्या जवाब दें इसलिए उनमे से कुछ फौरन उद्धव जी के लिए दूध, छाछ, मक्खन लाने के नाम पर निकल लिए। गोपियां अभी भी इस आस में खड़ी थीं कि शायद उद्धव कृष्ण के बारे में कुछ बात करेंगे पर उद्धव ने पेशेवर विद्वान की तरह से तुरंत पैड और पेन निकाल अपना राष्ट्रीय महत्व का शोध कार्य शुरू कर दिया।
इसी अवसर पर एक भंवरा कहीं से उड़ता हुआ वहां आ गया। गोपियों को लगा कि इस बुद्धिजीवी की बुद्धि ठिकाने लगाने का मौका हाथ आ गया। उन्होंने फौरन अपनी गोपी गायन मंडली को इशारा किया और गाना शुरू कर दिया। उनके गानों में भंवरे के माध्यम से उद्धव को बताया गया कि हमारी जमीन बंजर हो रही है, मवेशी चारे के अभाव में सूख रहे हैं, गांव के छोटे उद्योग धंधे चौपट हो गए हैं, काम की तलाश में युवक शहरों को पलायन कर गए हैं, इसलिए हे सरकारी अधिकारी हमारे पास कृष्ण का नाम रटने के अलावा रास्ता ही क्या है? अगर तुम्हे हमारी बहुत चिंता है तो हमारे लिए सड़क, पानी और रोजगार की व्यवस्था करो। और सालों में दर्शन देने की बजाय, साल में एक बार तो दर्शन दिया करो।
अब उद्धव के समझ आया कि कृष्ण क्यों ब्रज, बरसाने और गोप गोपियों को याद करके आंसू बहाते रहते हैं। मथुरा के राजमहल की सुविधाओं के बीच कृष्ण के मन में ब्रज के लोगों के कष्ट भरे जीवन के तीर चुभते रहते हैं। मथुरा के राजपथों पर रथ पर चलते हुए उन्हें ब्रज की टूटी-फूटी गलियों पर नंगे पैर चलने वालों की पीड़ा का दंश दुख देता रहता है। पर आंकड़ों से प्रगति दिखाने वाले उनके अधिकारियों ने जन कल्याण की जमीनी योजनाओं को कभी कागज की जमीन से आगे ही नहीं बढऩे दिया। बरसाने के लोगों के दुख के बारे में राधा के व्यंग्य गीतों से विचलित उद्धव से वहां रुकना संभव नहीं हो सका और वे खुद राधे-राधे करते हुए मथुरा को वापस चल पड़े।
– संजीव निगम