vivad

बीजों का कॉरपोरेटीकरण

देश को रोटी देने वाले किसान के साथ पिछले चार-पांच दशकों में जो हादसे हुए हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं। आलू-प्याज से लेकर गेहूं-चावल और दाल आदि उगाने वाले किसानों की हालत से जुड़ा एक सच यह है कि चंद अपवादों को छोड़ कर अब वह आत्मनिर्भर नहीं रह गया है और उसका स्वावलंबन बैंकों से लेकर बीज, खाद, कीटनाशकों, उपकरणों का कारोबार करने वाली बड़ी कंपनियों के हाथों गिरवी रखा है। कहा जा सकता है कि कुछ मायनों में यह किसान की ही गलती थी कि समृद्धि के सपने देख कर वह इन चीजों की गिरफ्त में आ गया। लेकिन इससे जुड़ा बड़ा सच यह है कि महंगी तकनीक, संकर किस्म के बीजों, कीटनाशकों और रासायनिक खाद के दुष्चक्र में उसे बड़ी कंपनियां ने फंसाया है। इधर हालत तो यह हो गए हैं कि जिस बीज से किसान की जिंदगी शुरू होती है, उसके कॉरपोरेटीकरण ने किसान को अजब दुविधा में डाल दिया है।
बीजों के कॉरपोरेटीकरण के गुपचुप चल रहे गोरखधंधे का इधर एक उदाहरण तब मिला, जब कुछ दिन पहले 26 अप्रैल, 2019 को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के चार किसानों पर एक-एक करोड़ रुपए के हर्जाने का मुकदमा कर दिया। दावा किया गया कि इन किसानों ने आलू की वह खास किस्म उगाने की हिमाकत की है, जिससे पेप्सिको अपने एक मशहूर ब्रांड के चिप्स बनाती है और जिस पर उसे पेटेंट हासिल है। वैसे तो यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता था, लेकिन आम चुनावों के दौर में सरकार ने पेप्सिको को इस मामले में खामोश रहने का संकेत दिया और कहा कि अगर मुकदमे वापस नहीं लिए गए तो उसके अन्य उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान देश में किया जाएगा। यह राजनीतिक दबाव तुरंत रंग लाया और दो मई, 2019 को कंपनी ने इन मुकदमों की वापसी का ऐलान कर दिया। कहने को तो यह राजनीतिक रणनीति की जीत कही जाएगी पर असल में इसके पीछे करीब दो सौ किसान नेताओं और सामाजिक संगठनों का दबाव भी था, जिन्होंने साफ कर दिया था कि इस मामले में वे किसानों के साथ हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनी की दादागीरी नहीं सही जाएगी। हालांकि मुकदमे वापसी की ताजा कोशिश इसका भरोसा नहीं देती है कि भविष्य में किसानों को आलू, बैंगन, सूरजमुखी, कपास आदि फसलों के बीजों पर उनके अधिकार को लेकर झगड़े-झंझट झेलने नहीं पड़ेंगे, क्योंकि ज्यादा उत्पादन और कीटरोधी फसलों के लिए अंतत: उन्हें ऐसी ही बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के पास जाना पड़ रहा है जो पहले तो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग आदि नीतियों के तहत किसानों को खुद से जोड़ती हैं पर आगे चल कर बीज पर ही उनके मौलिक अधिकार को अपने कब्जे में ले लेती हैं। यह पूरा किस्सा कितना तकलीफदेह हो सकता है, गुजरात के आलू उत्पादक किसानों से जुड़ा ताजा मामला इसकी गवाही देता है।
पेप्सिको इंडिया होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने भारत में एफसी-5 किस्म के आलू के पेटेंट का पंजीकरण 1 फरवरी 2016 को कराया था और इसके पेटेंट की अवधि 2031 तक है। इस अवधि में कंपनी की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की शर्तों से बंधे किसानों के अलावा बाकी किसान अगर यह आलू उगाते हैं, तो नियमत: कंपनी उनसे मनमाना हर्जाना वसूल सकती है। कंपनी ने अतीत में ऐसा किया भी है। वर्ष 2018 से अब तक यानी डेढ़ वर्ष के अंतराल में ही पेप्सिको गुजरात के साबरकांठा, अरावली और बनासकांठा के ग्यारह किसानों पर ऐसे मुकदमे कर चुकी है और उनमें से कुछ किसानों से हर्जाने के रूप में एक करोड़ रुपए की मांग भी की गई थी।
आलू की यह किस्म इसलिए खास है कि इसकी पैदावार में मिलने वाले आलू की एक निश्चित गोलाई होती है। इसके अलावा चिप्स बनाने की जरूरतों के हिसाब से ही इनमें नमी की एक तय मात्रा होती है। चूंकि हमारे देश में इसकी ज्यादातर खेती कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत होती रही है और इस तरह की खेती से कंपनी पेप्सिको की जरूरतें ही पूरी की जाती रही हैं, जो इस आलू से चिप्स बनाती है। ऐसे में, देश के आम किसानों तक आलू की इस किस्म के बीजों की पहुंच नहीं है। लेकिन जिन किसानों ने अतीत में कभी पेप्सिको के साथ अनुबंध में बंधकर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की या जो किसान इस किस्म के बीज मुहैया कराने वाले केंद्रों के संपर्क में हैं, उन्हें इसके बीज मिल जाते हैं।
द्य इंद्र कुमार