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अब निकाय की चुनौती

लोकसभा चुनाव खत्म होते ही नगरीय निकाय चुनाव की छाया मंडराने लगी है। लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद जहां भाजपा नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी में जुट गई है वहीं कांग्रेस अभी इसके लिए तैयार नजर नहीं आ रही है। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद प्रदेश सरकार फिलहाल नगरीय निकाय चुनाव कराने के मूड में नहीं है। ऐसे में सरकार निकाय चुनाव को छह माह तक टालने की तैयारी कर रही है।
गौरतलब है कि मप्र की 290 स्थानीय निकाय संस्थाओं का कार्यकाल जनवरी 2020 में समाप्त हो रहा है। ऐसे में दिसंबर में चुनाव कराना होगा। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने अभी छह माह ही हुए हैं। उस पर लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के कारण सरकार कोई विकास कार्य नहीं करवा पाई है। ऐसे में अगर सरकार निकाय चुनाव के लिए जाती है तो वह उसके लिए फायदेमंद नहीं होगा। क्योंकि अधिकांश संस्थाओं में भाजपा का कब्जा है। इसलिए सरकार इनका कार्यकाल समाप्त होते ही इनमें प्रशासक की नियुक्ति करेगी और छह महीने बाद निर्वाचन कराया जाएगा। इसी प्रकार पंचायती संस्थाओं का कार्यकाल छह माह बढ़ाने पर विचार चल रहा है।
सूत्रों के अनुसार मंत्रिमंडल में इस विषय पर अनौपचारिक चर्चा हुई है। अधिकांश मंत्रियों का कहना था कि बार-बार आचार संहिता के कारण सरकार के काम नहीं हो पा रहे हैं। प्रदेश की 290 स्थानीय संस्थाओं के चुनाव इसी साल दिसंबर में कराने हैं। इनमें 17 नगर निगमों के अलावा नगर पालिकाएं और नगर पंचायतें शामिल हैं। यदि समय से चुनाव कराए गए तो अक्टूबर में फिर आचार संहिता लगानी होगी। इधर राजनीतिक माहौल भी कांग्रेस के पक्ष में नहीं है। इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सहमति बनी है कि इन 290 संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होते ही छह माह के लिए प्रशासक की नियुक्ति की जाएगी और अगले साल मई-जून में चुनाव कराने पर विचार किया जाएगा। पंचायती संस्थाओं को यथावत रखते हुए उनका कार्यकाल छह माह बढ़ाने पर भी सहमति बन गई है। पिछली बार के निकाय चुनाव में भाजपा ने प्रदेश की सभी 16 नगर निगमों पर कब्जा जमाया था। अब लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित पार्टी के नेताओं ने फिर मिशन-16 पर काम शुरू कर दिया है। उधर, लोकसभा चुनाव में करारी हार से विचलित कांग्रेस भी नगरीय निकायों में जीत के लिए संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में जुट गई है। पार्टी ने मंत्रियों को जिम्मेदारियां सौंपी हैं। दोनों ही पार्टियों की संगठनात्मक तैयारी जून के पहले हफ्ते से नजर आने लगेगी। नगरीय निकाय के साथ ही पार्टियों की नजर पंचायत, मंडी और सहकारिता चुनावों पर भी है।
विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद अब भाजपा कोई नुकसान उठाने के मूड में नहीं है। नेताओं का मानना है कि नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में जीत उसके प्रदेश सरकार में वापसी का रास्ता मजबूत करेगी। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष विजेश लुनावत का कहना है कि जनता ने प्रदेश सरकार को पूरी तरह नकार दिया है। लोग भाजपा के साथ हैं। आने वाले चुनावों में भाजपा को फिर सफलता मिलेगी। पार्टी ने इसके लिए छह महीने का रोड मैप तैयार कर लिया है। लोकसभा चुनाव में जिन बूथों पर पार्टी कमजोर रही, वहां नए सिरे से बूथ मैनेजमेंट किया जा रहा है। निकाय चुनाव के लिए पदाधिकारियों को अभी से जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के परिणामों को बूथ स्तर पर तीन भागों में बांटा है। पहला जहां पार्टी को बंपर बढ़त मिली है। दूसरा, वे बूथ जहां बढ़त तो है, लेकिन अंतर बहुत ज्यादा नहीं है और तीसरा, वे बूथ जहां पार्टी को कांग्रेस या दूसरे प्रत्याशी से कम वोट मिले हैं। तीनों स्तर के बूथों के लिए भाजपा अब निकाय चुनाव के लिए अलग-अलग रणनीति बनाने जा रही है।
-सुनील सिंह