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ये मौत की कोचिंग

भोपाल समेत प्रदेश भर में कोचिंग की आड़ में मनमानी कमाई की जा रही है। साधारण से साधारण काम के लिए प्रशासन से लाइसेंस लेने का नियम होता है, लेकिन इस प्रोफेशन में कोई नियम नहीं है। स्कूलों में जितनी संख्या बच्चों की नहीं होती है, उससे कहीं अधिक कोचिंग सेंटरों में है। कई जगहों में दिन भर में हजारों बच्चे कोचिंग में पढ़ते हैं। यहां मनमानी फीस भी वसूली जा रही है और बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई मापदंड नहीं है। सूरत में कोचिंग सेंटर चौथी मंजिल में चल रहा था। यहां आगजनी की घटना के बाद बच्चों को बचा पाना मुश्किल हो गया। ऐसी स्थिति मप्र में चल रहे कांचिंग संस्थानों में भी है।
25 मई को भोपाल में नगर निगम के फायर अधिकारियों ने कई कोचिंग संस्थानों का निरीक्षण कर फायर सेफ्टी की व्यवस्थाओं का जायजा लिया तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। इस दौरान पाया कि ज्यादातर कोचिंग में फायर सेफ्टी सिर्फ खाना पूर्ति व दिखावे के लिए ही की गई है। केके प्लाजा बिल्डिंग में संचालित सभी कोचिंग में आग से बचाव के कोई इंतजाम या उपकरण नहीं मिला। कई कोचिंग में आने-जाने के लिए सिर्फ एक गेट है। जबकि, नियम के मुताबिक दो दरवाजे अनिवार्य रूप से होने चाहिए। उधर, कोचिंग के अंदर क्लास रूम के दरवाजों की चौड़ाई भी दो फीट से कम पाई गई। मतलब एक बार में एक छात्र ही यहां से निकल सकता है। निरीक्षण के दौरान कोचिंग संचालकों की एक और बड़ी लापरवाही पाई गई। कक्षाओं में वेंटिलेशन की भी व्यवस्था नहीं की गई थी। जो खिड़कियां थी, उन्हें भी अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया है। जब अधिकारियों ने मामले पर संचालकों से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि साउंड प्रूफ (बाहर की आवाज अंदर न आ सके) करने के लिए ऐसा किया गया है।
एमपी नगर स्थित अधिकांश कोचिंग सेंटर चौथी व पांचवी मंजिल पर चल रहे हैं। यहां तक पहुंचने के लिए सैकड़ों छात्र सीढिय़ों के सहारे ही आना-जाना करते हैं। निगम अधिकारियों से बातचीत के दौरान छात्रों ने बताया कि भीड़ के कारण नीचे से ऊपर पहुंचने में ही 15 मिनट लग जाता है। अधिकारियों ने आपातकालीन स्थिति के मद्देनजर आपस में सटी इमारतों का भी निरीक्षण किया। इस दौरान यह देखा गया कि एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग तक कैसे पहुंचा जा सकता है। अधिकांश इमारतों की ऊंचाई में 10 से 15 फीट का अंतर मिला। अधिकारियों ने बिल्डिंग मालिकों से कहा कि आपसी तालमेल कर ऐसी व्यवस्था करें, जिससे की लोग एक से दूसरी इमारत पर जा सकें। उन्होंने कोचिंग संचालकों को रस्सी व फोल्डिंग सीढ़ी रखने के निर्देश भी दिए। जबकि एक साल पहले निगम के फायर अमले ने कोचिंग सेंटर्स का निरीक्षण कर बिल्डिंग में साइन बोर्ड (संकेतक) लगाने का निर्देश दिया था। लेकिन किसी भी संचालक ने इसका पालन नहीं किया। दरअसल, इन संकेतों में आपातकालीन स्थिति में निकासी संबंधित निर्देश दिए जाने थे। निर्देश का पालन नहीं करने पर अधिकारियों ने बिल्डिंग मालिकों और कोचिंग संचालकों को जमकर फटकारा।
बताया जाता है कि प्रदेश में फायर एक्ट नहीं होने के कारण अधिकारियों का भी दायरा सीमित है। नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि कई बार बड़े कोचिंग सेंटर संचालक अधिकारियों को निरीक्षण तो दूर बल्कि अंदर तक आने की अनुमति नहीं देते। इतना ही नहीं, बल्कि नियमों का हवाला दिया जाता है। प्रदेश में फायर एक्ट लागू नहीं होने से सील करने, जुर्माना व सजा जैसी कार्रवाई नहीं हो पाती।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों की बढ़ती भूमिका समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। पर देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि आर्थिक शोषण के बावजूद कोई इसकी जरूरत से इनकार नहीं कर पा रहा है। अब तो ऐसे अध्ययन भी सामने आ गए हैं, जिनमें दावा किया गया है कि कोचिंग के कारण बच्चों पर सिर्फ मनोवैज्ञानिक दबाव नहीं पड़ता, बल्कि कोचिंग उनमें कई शारीरिक व्याधियां भी पैदा कर देती है। हाल में जर्नल ऑफ फेमिली मेडिसिन ऐंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित दिल्ली के सफदरगंज और भोपाल के एम्स अस्पतालों के वरिष्ठ डॉक्टरों की देखरेख में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि करिअर संवारने के सपने दिखाने वाले कोचिंग सेंटर छात्रों को बीमार कर रहे हैं। लेकिन अभिभावक प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर अपने बच्चों को मकडज़ाल में डाल रहे हैं।
-बृजेश साहू