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परिणामों ने चौकाया

लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो बिहार की जनता ने राजनीतिक पंडितों के अलावा एनडीए और महागठबंधन के नेताओं को भी चौंकाया है। एनडीए राज्य की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रहा। भाजपा और लोजपा ने अपने-अपने हिस्से की सभी सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, जदयू केवल कांग्रेस के गढ़ और मुस्लिम बहुल सीट किशनगंज में सेंधमारी नहीं कर सका। यानी महागठबंधन के खाते में भी किशनगंज के रूप में बस एक ही सीट आई।
चुनाव से पहले बिहार में राजद के नेतृत्व में पांच दलों ने मिलकर महागठबंधन बनाया था। इनमें राजद के अलावा उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा, जीतनराम मांझी की हम, मुकेश सहनी की वीआईपी और शरद यादव का लोकतांत्रिक जनता दल शामिल था। लेकिन नतीजे आए तो पता चला कि उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतनराम मांझी अपनी-अपनी सीट भी नहीं जीत पाए। उपेंद्र कुशवाहा तो दो सीटों-काराकाट और उजियारपुर- से चुनावी मैदान में उतरे थे। वहीं, मुकेश सहनी और राजद के चुनाव चिन्ह पर लड़े शरद यादव को भी हार का मुंह देखना पड़ा।
बिहार में कहा जा रहा था कि भाजपा, जदयू और लोजपा के गठबंधन के अलावा महागठबंधन को भी ठीक-ठाक सीटें मिल सकती हैं। इसके पीछे की वजह इसका बड़ा कुनबा और इनके पीछे के जातिगत समीकरणों को बताया गया। बिहार में यादव और मुसलमान को राजद का कोर वोट बैंक माना जाता रहा है। कहा गया कि राजद और कांग्रेस के साथ आने पर इसमें कुछ सवर्ण वोटी भी जुड़ेंगे ही। वहीं, उपेंद्र कुशवाहा को कुर्मी-कोइरी समाज और जीतनराम मांझी को दलित नेता के तौर पर देखा जाता है। इसके अलावा निषाद समुदाय के नेता मुकेश सहनी के साथ आने की वजह से महागठबंधन और मजबूत दिख रहा था। लेकिन चुनावी नतीजे उलट हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव के दौरान एक वक्त मुकाबले में दिख रहे महागठबंधन को इतनी बड़ी हार का सामना क्यों करना पड़ा। इसका जवाब महागठबंधन के बीच सीट बंटवारे से ही शुरू होता दिखता है।
महागठबंधन के भीतर रालोसपा, ‘हमÓ और वीआईपी को कुल मिलाकर 40 में से 11 सीटें दी गई थीं। इन दलों के हिस्से क्रमश: पांच और तीन-तीन सीटें आईं। वहीं, यदि जमीन पर इन दलों की स्थिति देखें तो इनके पास इन सभी 11 सीटों पर एनडीए को टक्कर देने लायक उम्मीदवार की कमी साफ-साफ नजर आई। उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी अपनी-अपनी पार्टी के इकलौते बड़े चेहरे थे। उपेंद्र कुशवाहा के हिस्से में जो पांच सीटें आईं, उनमें से वे खुद दो पर लड़े। इसके अलावा पूर्वी चंपारण में भाजपा के राधामोहन सिंह के खिलाफ कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अखिलेश कुमार सिंह के पुत्र आकाश कुमार सिंह को उतार दिया गया। यह सीट रालोसपा के हिस्से में थी। आकाश को राधा मोहन सिंह के हाथों करीब तीन लाख वोटों से हार का सामना करना पड़ा। उधर, औरंगाबाद सीट को भी ‘हमÓ के खाते में डाल दिया गया जबकि इस सीट पर कांग्रेस ने अपनी दावेदारी पेश की थी और उसके नेता निखिल कुमार ने साल 2004 में इस सीट पर जीत भी दर्ज की थी। उन्हें इस बार भी प्रबल उम्मीदवार माना जा रहा था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसी ही स्थिति कई अन्य सीटों पर रही।
– विनोद बक्सरी