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निष्काम कर्मयोग

कर्म की धुरी पर ही सृष्टि का गतिचक्र अविराम चक्कर काट रहा है। संसार का दृश्य स्वरूप इस गति प्रक्रिया पर अवलम्बित है। जड़ परमाणु एक सुनिश्चित परिकर में गति करते और अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं और चेतन जीव दूसरे तरह की हलचल में अपने को नियोजित रखते हैं। कर्म किए बिना यहां कोई नहीं रह सकता। जीवित रहने के लिए कर्म आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। अविकसित मनुष्येत्तर जीवों में यह प्रकृति प्रेरणा से परिचालित है।
‘कर्मÓ आत्मा और परमात्मा को एकाकार कर देने वाला ‘योगÓ तब बन जाता है जब वह निष्काम हो। निष्काम क्यों-कामना से युक्त क्यों नहीं? क्योंकि मन की कामना ही भव-बन्धनों का कारण है। गीताकार ने इसी सत्य का रहस्योद्घाटन इस प्रकार किया है- ‘मन एवं मनुष्याणाम् कारणं बन्ध मोक्षयो:।Ó अर्थात- ‘मन ही मनुष्य के बन्धन या मुक्ति का कारण है।Ó कामना युक्त कर्म जहां बन्धनों में बांधता है, निष्काम कर्म ‘मुक्तिÓ का साधक बन जाता है। एक क्षण के लिए भी कर्म से विरत रहना सम्भव नहीं है, साथ ही कर्म भव-बन्धनों में भी जकड़ता है फिर संसार में किस तरह रहा जाय? जीवन-मुक्ति का आनन्द कैसे उठाया जाए?
निष्काम कर्मयोग के पथ पर चलने वाला साधक अपनी समस्त इच्छाओं, आकांक्षाओं को परमात्मा को समर्पित कर देता है। कर्मफल के प्रति उसकी आसक्ति नहीं रहती। अपने कत्र्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति वह तत्पर और सजग रहता है। उनके निर्वाह में सन्तोष की अनुभूति करता है। शरीर में कर्म और मन से चिन्तन करते हुए भी वह सांसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति निरासक्त होता है।
अर्जुन को सम्बोधित कर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
योगस्थ: कुरु कर्मांणि संगत्याक्तवा धनंजय। सिद्धयसिद्धयो: समो झूत्वा
समत्वं योगउच्यते॥
अर्थात हे अर्जुन! आसक्ति छोड़कर सिद्धि और असिद्धि के विषय में समबुद्धि रखकर, योग में स्थिर होकर कर्म कर। समत्व को ही योग कहते हैं। ‘समत्वÓ का अर्थ हुआ समान भाव, समभाव वृत्ति की एकरूपता, चित्तवृत्तियों की चंचलता पर निरोध। जिसे पातंजलि ने योगश्चित्तवृत्ति निरोध: करके समझाया है, उसे भगवान ने यहां एक ही शब्द ‘समत्वÓ में गूंथ दिया है। हर पल चित्त की चंचलता कर्मों के करने में बाधा डालती है। सुख-दुख, जय-पराजय, हानि-लाभ के द्वन्द्व मानस पटल पर सतत् उभरते हैं। जय होने से घमण्ड होता है और पराजय से व्यक्ति हताश हो जाता है। परिस्थितियों से जो मन:स्थिति को प्रभावित न होने दे, वह समत्व योग की ही उपासना करता है। बाह्य परिस्थिति जैसी भी बने, जिसकी वृत्ति में चंचलता नहीं है, वही कुछ कत्र्तव्य पालन कर सकते हैं।
चित्त की चंचलता के कई कारणों में अनुकूल भोग पाने की इच्छा भी एक प्रमुख कारण है। मनोवृत्ति की यही चंचलता असंयम को जन्म देकर उसे पथ भ्रष्ट कर देती है। समत्व योग का उपासक वस्तुत: निष्काम कर्मयोगी के साथ चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण रखने वाला कठोर साधक भी है जो पल-पल अपनी मन:स्थिति पर पैनी नजर रखता है। सिद्धि हो, चाहे असिद्धि, हम जीवन क्षेत्र में सफल हों अथवा असफल, कभी भी अपनी समस्वरता पर उसका प्रभाव न पडऩे देंगे-यही साधक का लक्ष्य होता है। इसी श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है- ‘संगं व्यक्त्वाÓ अर्थात् फल की आसक्ति भी त्यागी जाय। वही मानव आमन्त्रित दुर्बुद्धिजन्य आपत्तियां हैं। संगं से ही विषयासक्ति की कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मूढ़ता, मूढ़ता से भ्रम व भ्रम से बुद्धि का नाश होता है। बुद्धि का नाश ही मनुष्य के नाश का कारण है। इसीलिये कहा गया है कि-
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोतिय:।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा॥
जो मनुष्य आसक्ति छोड़कर ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्मों को करता है, वह पानी में कमल पत्र की भांति पाप से लिप्त नहीं
होता। इसीलिये फलेच्छा का त्याग करके किये गये कर्म ही सात्विक कहे जाते हैं। ऐसा व्यक्ति ही योगी; कत्र्तव्य-परायण साधक कहा जा सकता है।
ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म बहुत अनिवार्य है। साधारण मनुष्य जो कर्म करता है, वह स्वार्थवश करता है। उस सकाम कर्म करके वाला मनुष्य अपने अंश रूप आत्मा को प्रधान और सर्वव्यापी परमात्मा को गौण मानता है। किरण को प्रधान मानना और सूर्य का विचार तक के
निवारण तथा ब्रह्मार्पण बुद्धि से कार्य करने के ज्ञान की प्राप्ति कराने वाले इस ‘समत्वयोगÓ को ‘निष्काम कर्म योगÓ के अलावा ‘बुद्धियोगÓ भी कहा गया है। अज्ञान ही सारे अभावों व अनास्था का कारण है। यह भावना चली जाय तो संकीर्ण स्वार्थपरता में लिप्त -यह जीवात्मा भवबन्धन से निकले और कुछ विश्वात्मा के लिये भी सोचे। पर आरम्भ वहीं से होता है जिसे भगवान् ‘संगं त्यक्त्वाÓ अर्थात् अनासक्ति कहते हैं।
कर्मफल के प्रति अनासक्ति का होना इसलिए भी आवश्यक है कि मनुष्य का अधिकार नहीं है। यह सच है कि कर्मों का फल अपने निश्चित समय पर मिलता है, पर यह भी उतना ही सत्य है कि यह प्रक्रिया किसी अदृश्य के हाथों संचालित है। कई बार कर्मफल प्रक्रिया में व्यतिरेक पड़ते भी दिखायी पड़ता है। एक निश्चित प्रकार के कर्म करते हुए भी उसका परिणाम उल्टा देखकर मन में कर्मफल के सिद्धान्त को सही रूप से न समझने के कारण ही होता है। प्रत्यक्ष जीवन और उससे जुड़ी भली बुरी उपलब्धियां मात्र इसी जीवन की ही नहीं जन्म-जन्मान्तरों के संचित कर्मों का परिणाम होती हैं। कितनी ही बार अच्छे कर्म करते हुए भी उनके परिणाम अनुकूल नहीं निकलते और अप्रत्याशित विघ्न-बाधाएं ऐसे आकर अड़ जाती हैं जिन्हें हटाने में मानवी पुरुषार्थ असमर्थ सिद्ध होता है।
द्यओम