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किसकी मेहनत रंग लाएगी

राजस्थान में 25 लोस सीटों के लिए दो चरणों का मतदान संपन्न हो गया है, अब नजरें नतीजों पर हैं। जिस दल के नतीजे अच्छे आएंगे, उस दल के कई नेताओं की सियासी तकदीर चमक जाएगी। चुनावी नतीजों के बाद प्रदेश में अशोक गहलोत सरकार के मंत्रिमंडल के विस्तार की संभावनाएं हैं। यदि कांग्रेस के नतीजे अच्छे रहे तो जहां कुछ प्रमुख नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है, वहीं सत्ता-संगठन के कुछ प्रभावी पदों की जिम्मेदारी भी मिल सकती है।
पिछली बार मंत्रिमंडल के गठन के समय मंत्री बनने से रह गए प्रमुख नेता पूर्व मंत्री राजकुमार शर्मा, भंवरलाल शर्मा, महेंद्रजीत सिंह मालवीया आदि को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है, तो कांग्रेस का हाथ थामने वाले घनश्याम तिवाड़ी, सुरेंद्र गोयल, राजकुमार रिणवा, जनार्दन गहलोत आदि नेताओं को भी सत्ता-संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका मिल सकती है। लेकिन, अपने प्रभाव क्षेत्र में अपेक्षा से कम वोट मिलने पर उस क्षेत्र के नेताओं को सियासी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
उधर, भाजपा कामयाब रही तो किरोड़ी लाल मीणा, किरोड़ी सिंह बैंसला, हनुमान बेनीवाल आदि को सियासी फायदा मिल सकता है। चुनाव के उत्तरार्ध में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी सक्रियता बरकरार रख कर प्रदेश की राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के सियासी संकेत दिए थे।
दोनों दलों को आधी-आधी सीटें मिलेंगी! पिछले लोस चुनाव में भाजपा ने 25 में से 25 सीटें जीत ली थी, परंतु 2018 में हुए विस चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को राजस्थान की सत्ता से बाहर कर दिया था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव परिणाम में यदि कोई बड़ा बदलाव नहीं होता है तो दोनों दलों को करीब आधी-आधी सीटें मिलेंगी, यदि किसी भी दल को राज्य में एक दर्जन से अधिक सीटें मिलें, तभी माना जाना चाहिए कि उस दल के नेताओं की मेहनत रंग लाई है!
अब सबकी नजर 23 मई मतगणना परिणाम पर टिकी हुई है। क्योंकि इस बार लोकसभा क्षेत्र की सभी आठों सीटों के मतदान प्रतिशत ने प्रत्याशियों को ही नहीं बल्कि खुद पार्टी के नेताओं को भी उलझा दिया है। यही कारण है कि समीकरणों में जोड़-तोड़ कर प्रत्याशी को खुद विजेता बताने से भी कतरा रहे हैं। इस बार लोकसभा चुनाव में विधानसभा वार मतदान पर नजर डालें तो मतदान प्रतिशत कोई खास नहीं बढ़ सका है। बल्कि सिर्फ दो ही विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पिछले लोकसभा चुनाव का रिकॉर्ड तोड़ा गया है। भरतपुर में 0.40, कामां में 0.11, नगर में 0.22, डीग-कुम्हेर में 0.18, नदबई में तीन, कठूमर में 5.70, वैर में 2.86, बयाना में 2.01 प्रतिशत मतदान पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना अधिक हुआ है।
सबसे आश्चर्यचकित करने वाली स्थिति यह है कि निर्वाचन विभाग की ओर से पिछले तीन माह से लोकसभा चुनाव में जिस तरह मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए प्रयास किया जा रहा था, वह इस बार भी खानापूर्ति बनकर रह गया। क्योंकि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, बसपा सुप्रीमो मायावती, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, डिप्टी सीएम सचिन पायलट की धड़ाधड़ सभाएं होने के बाद माना जा रहा था कि इस बार कांटे की टक्कर दोनों ही प्रमुख दलों में होने के कारण मतदान प्रतिशत भी अच्छा होगा। लेकिन इस बार भी ऐसा संभव नहीं हो सका। लेकिन यह तय है कि हार-जीत का निर्णय पिछले कुछ चुनावों के परिणामों की तुलना कम वोटों पर ही होगा। ऐसे में बताते हैं कि यहां इस बार तीन प्रमुख प्रत्याशियों के बीच मतों का ध्रुवीकरण हुआ है। साथ ही मतदान प्रतिशत में कमी बताती है कि मतदान के प्रति लोगों में उत्साह कम था। हकीकत यह है कि मतदान होने के बाद अब राजनीतिक दलों के अनुमान लडखड़़ा गए हैं। अब हर विधानसभा में बड़े नेता सक्रिय कार्यकर्ताओं के जरिए फीडबैक जुटा रहे हैं।
-जयपुर से आर.के. बिन्नानी