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चुनावी चक्रव्यूह

चुनाव अंतिम चरणों में है। नेता जनता के चरणों पर पड़े-पड़े उतावले हो रहे हैं। लंबी चुनाव अवधि अपने साथ एक विचित्र सा निरुत्साह घेर लाई है। सब चक्रव्यूह घेरे जा चुके हैं। सब असत्य बोले जा चुके हैं। सब विवादों का दूध उबलकर पतीले के बाहर फैल चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो या कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी सभी का गला चुनावी गर्मी में कुछ भी उगल रहा है। इससे चुनावी मुद्दे हवा हो गए हैं। नेताओं के तरह-तरह के बोल वचन से मतदाता भी भ्रमित हो गए हैं।
दुनिया भर में अस्मिता की राजनीति का प्रचलन है। भारत में जाति व्यवस्था के कारण शायद ज्यादा ही। पिछले 70 सालों की बात करें तो जातीय अस्मिता का भारतीय राजनीति पर सबसे ज्यादा प्रभाव रहा है। जातीय अस्मिता की राजनीति लंबे समय से राजनीति में सफलता की कुंजी रही है। अब खत्म हो गई हो, ऐसा नहीं है। इसका स्वरूप बदलता रहता है। जाति के साथ ही धार्मिक अस्मिता भी चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाती रही है। इस कारण सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव अलग ही चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।
बंगाल की संप्रभु नेत्री भारतीय लोकतंत्र में ऐतिहासिक वीरतापूर्ण आचरण की पुनस्र्थापना के लिए कटिबद्ध हैं। वीरभोग्या वसुंधरा के अमर सिद्धांत को बूथ कैप्चरिंग के पुरुषार्थपूर्ण दिनों के इतने समय बाद आज के ईवीएम युग में भी जीवित रखने के लिए और आधुनिक भीरूता से भारतीय समाज को बाहर लाने के लिए समाज उनका सदैव अनुग्र्रहीत रहेगा। उत्तर प्रदेश और बिहार में माहौल बड़ा ही रोमांचक हो गया है। कांगे्रस प्रत्याशी सपा का प्रचार कर रहा है, सपा प्रत्याशी कम्युनिस्टों और कम्युनिस्ट कांग्रेस के नेता का। ऐसा लगता है कि जिसको जहां मंच खाली दिखता है, वह वहीं किसी भी प्रत्याशी के प्रचार में उतर जाता है। जनता भी हेलीकॉप्टर किसी का देखने जाती है और वोट किसी और प्रत्याशी को देती है।
उग्र नेता भी गाली गलौच करके थक चुके हैं। क्रांतिकारी नेता अब अपनी सफलता के लिए प्रतिद्वंद्वी के नामांकन के निरस्त होने पर निर्भर हैं। बुजुर्ग कांग्रेस वोट कटवा बनकर संतुष्ट है। ऐसे बोरियत भरे माहौल में राहुल जी की नागरिकता जैसे प्रश्न उठाकर निरुत्साहित जनता में उत्साह फूंकने का प्रयास हो रहा है, किंतु निरहुआ का संगीत भी बोर हो रही जनता को उबारने में असमर्थ है।
भारत एक कमेटी प्रधान देश है और जैसा कि हर समस्या का समाधान हम एक नई कमेटी में ढूंढते हैं। इस विषय पर बाकायदा एक कमेटी नियुक्त है। अब एक ही संभावना बचती है कि उस कमेटी के कार्यकलाप में ऊर्जा प्रदान करने के लिए एक अन्य कमेटी नियुक्त की जाए ताकि अधिक से अधिक संख्या में जनता का मन लगा रहे। भारतीय समाज में कमेटी का वही स्थान है जो रोमन साम्राज्य में ग्लेडिएटर परंपरा का था। समाजवाद का हंस बेगुसराय से दाना चुगकर पूंजीवाद के क्षितिज की ओर उड़ चला है। भूख पर भाषण देने के बाद पूंजीवाद से रोटी का प्रबंध किया जा रहा है। गरीब को गरीबी के महात्म्य का गायन सुनाने के बाद गायक-दल गुच्ची का चश्मा लगाकर अमेरिका पहुंच गया है।
समाजवादी दलों के नेता आर्थिक स्थिति में पूंजीवादी नेताओं के समान संपन्नता प्राप्त कर चुके हैं। शीघ्र ही यह समानता सर्वहारा तक भी पहुंचेगी, ऐसी बुद्धिजीवियों में सर्वसम्मति है। ‘पार्टी ही परिवार हैÓ से आरंभ हुई समाजवादी सोच ‘परिवार ही पार्टी हैÓ पर आकर थमी है। अंतरराष्ट्रीयकरण के इस दौर में प्रचारक और समर्थक अंतरराष्ट्रीय हो रहे हैं। ईश्वर ने चाहा तो आगे प्रत्याशी भी अंतरराष्ट्रीय निकलेंगे। वर्तमान में यही प्रतीक्षा है कि शीघ्रतिशीघ्र चुनावी चरण पूर्ण हों और नेतागण जनता के चरणों में पड़े चारण की छद्म मुद्रा से बाहर आकर पुन: नेतासुलभ भ्रष्ट भाव धारण करें और लोकतंत्र अपने स्वाभाविक स्वरूप में लौटे।
मतदान के छह चरण पूरे होने के साथ ही लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अपने चरम पर आ चुका है। चुनावी मैदान में राजनीतिक दल विभिन्न मुद्दों की रणभेरी बजा रहे हैं, लेकिन जाने-अनजाने एक ही मुद्दा सब मुद्दों के केंद्र में है और वह है नरेंद्र मोदी। पूरा चुनाव एक तरह ‘मोदी लाओÓ अथवा ‘मोदी हटाओÓ पर केंद्रित हो गया है। नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और नेतृत्व को लेकर बौद्धिक-राजनीतिक जगत दो फाड़ है। एक तरफ कुछ लोग आशंकित हैं तो दूसरी ओर अनेक लोग बहुत ही उत्साहित हैैं।
मोदी सरीखे किसी नेतृत्व की सीमाओं और लाभ को समझने के लिए प्रसिद्ध जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर के राजनीतिक नेतृत्व संबंधी विचारों को जानना प्रासंगिक होगा। मैक्स वेबर ने कहा था कि राज्य को नियंत्रित करने वाले राजनीतिक नेतृत्व तीन प्रकार के होते हैं-पारंपरिक प्राधिकारी, करिश्माई प्राधिकारी और तर्कसंगत-कानूनी प्राधिकारी। पारंपरिक प्राधिकारी अपनी वैधता परंपरा से प्राप्त करता है यानी लंबे समय से स्थापित रिवाज, आदतें और सामाजिक संरचनाओं के आधार पर सत्ता पीढ़ीगत हस्तांतरित होती है। वंशानुगत राजाओं का शासन इसका उदाहरण है। दूसरी ओर करिश्माई प्राधिकारी या नेता अपने करिश्म अर्थात विशिष्ट गुणों और उच्च क्षमता के आधार पर वैधता एवं सत्ता हासिल करता है। तीसरे, तर्कसंगत-कानूनी प्राधिकारी जो राज्य के कानून-संविधान पर वैधता के लिए निर्भर होते हैं। वेबर के अनुसार अधिकांश आधुनिक समाज कानूनी- तर्कसंगत प्राधिकार पर निर्भर है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में खास तौर से वर्तमान संदर्भों में देखें तो वेबर के राजनीतिक नेतृत्व अथवा प्राधिकार के सिद्धांत को पूरी तरह से लागू किया नहीं जा सकता। आधुनिक भारतीय राज्य और राजनीतिक प्राधिकार नि:संदेह अपनी वैधता कानून-संविधान से ग्रहण करता है और इस रूप में तर्कसंगत यानी कानूनी है, लेकिन इसके साथ-साथ पारंपरिक एवं करिश्माई नेतृत्व-प्राधिकार भी आधुनिक भारत में क्रियाशील है। यद्यपि वेबर के अनुसार पारंपरिक नेतृत्व वंशानुगत राजाओं का शासन होता है और आधुनिक समाजों में प्राय: इसके लिए जगह नहीं, लेकिन भारतीय परिवेश में संवैधानिक राज्य होने के बावजूद पारंपरिक नेतृत्व अब भी बरकरार है, जहां वंशानुगत शासन या वंशवाद ही प्रधान होता है।
कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिव सेना, अकाली दल, झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि इसके उदाहरण हैं। लोकतंत्र-संवैधानिक शासन के बावजूद इन राजनीतिक दलों में नेतृत्व एक ही परिवार और उनके भाई-भतीजों के कब्जे में बरकरार है। इसी राह पर अब मायावती की बहुजन समाज पार्टी और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी चल पड़ी है। पारंपरिक नेतृत्व अथवा वंशवाद-परिवारवाद के लिए अपना परिवार और उससे जुड़े हुए कुछ लोगों का हित ही सर्वोपरि होता है।
चुनाव जीतने की मजबूरी में कुछ जनहितकारी काम उन्हें जरूर करने पड़ते हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता जनहित न होकर परिवार-हित ही होता है। नहीं तो क्या कारण है कि वंशवादी-पारिवारिक नेतृत्व वाली पार्टियों के इतने लंबे शासन के बावजूद आम जनता बुनियादी जरूरतों से भी महरूम है, जबकि इन परिवारों की संपत्ति अरबों में पहुंच गई है। पारंपरिक नेतृत्व की एक अन्य सीमा यह भी है कि उत्तराधिकारी चाहे नेतृत्व-गुण से हीन हो तो भी सत्ता उसे ही मिलेगी।
जनता का दुख-दर्द, उसकी आशाओं-आकांक्षाओं को समझने वाले जमीन से उठे सच्चे जननायकों के लिए वंशवादी नेतृत्व वाली पार्टियों में ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। इसलिए ऐसा नेतृत्व और पार्टियां आम जनता के लिए लाभकारी नहीं होतीं। इसका एक प्रमाण यह है कि आज कई राजनीतिक दलों का नेतृत्व उन हाथों में है जो एक समय कांग्रेस का हिस्सा थे। ममता बनर्जी, शरद पवार आदि इसके उदाहरण हैं कि कांग्रेस में किस तरह उनके लिए स्थान नहीं रह गया था।
दिलचस्प यह भी है कि मोदी के पर्सनैलिटी कल्ट के निर्माण में उनके राजनीतिक विरोधियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक हिस्से की अहम भूमिका है। अंध विरोध से ग्रस्त होकर इन लोगों ने अनर्गल और आधारहीन आरोप लगाकर ब्रांड मोदी को और मजबूत ही किया है।
– दिल्ली से रेणु आगाल