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जवानों की आहुति कब तक?

पुलवामा आतंकी हमले में मारे गये 40 जवानों की चिताएं अभी ठंडी भी नहीं पड़ीं, उनके परिजनों के आंसू अभी थमे भी नहीं कि मजदूर दिवस 1 मई के रोज महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सलियों ने ब्लास्ट करके सी-60 के 15 कमांडोज और एक ड्राइवर को मौत की नींद सुला दिया। नक्सलियों ने घात लगा कर कमांडोज को ले जा रही बस को आईईडी ब्लास्ट से उड़ा दिया। करखुड़ा से छह किलोमीटर दूर कोरची मार्ग पर लेंदारी पुल पर यह हमला हुआ। इससे पहले रात में ही नक्सलियों ने यहां एक सड़क निर्माण कम्पनी के करीब 30 वाहनों को आग के हवाले कर दिया था। वाहनों को जलाने के बाद सुरक्षाकर्मियों की गश्त जरूर होगी, इसी साजिश के तहत वाहनों को जलाया गया था। नक्सलियों ने सटीक योजना बनायी थी। वाहनों के जलने की खबर सुनते ही कमांडोज का एक जत्था रवाना कर दिया गया। पहले 60 कमांडोज का जत्था भेजा जाना था, मगर पहली गाड़ी में सिर्फ 15 ही गये और नक्सलियों की आसान सी साजिश का शिकार होकर अपनी जानें गंवा बैठे।
पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवाद अब देश के 11 राज्यों के 90 जिलों में फैल चुका है। देश के 11 राज्यों छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के 90 जिलों में नक्सलियों का ‘रेड कॉरिडोरÓ फैला हुआ है। इन जिलों में नक्सली लगातार सुरक्षाकर्मियों को अपना निशाना बना रहे हैं। अभी 2019 को शुरू हुए मात्र चार माह ही हुए हैं कि 15 जवानों के खून से गढ़चिरौली की धरती लाल हुई। इससे पहले वर्ष 2018 में यहां 58 जवान शहीद हुए थे। वर्ष 2017 में 24 जवान मारे गये। वर्ष 2016 में 22 जवान, 2015 में 16 जवान और 2014 में 30 जवान गढ़चिरौली में शहीद हो चुके हैं। यूपीए सरकार के वक्त भी गढ़चिरौली में लाल आतंक का कहर जारी था। वर्ष 2013 में यहां 43 जवान नक्सली हमले का शिकार हुए, 2012 में 36 जवान, 2011 में 65 जवान और 2010 में 43 जवान अपनी जान से हाथ धो बैठे।
नक्सली समस्या से जूझ रहे बस्तर जिले में आज करीब 50 हजार सीआरपीएफ जवान तैनात हैं, वहीं गढ़चिरौली में भी 10 हजार जवान जंगलों की खाक छान रहे हैं। इसी तरह से देश के अन्य हिस्सों में भी बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। इतने वर्षों से यहां सुरक्षाबलों की भारी तैनाती के बावजूद अगर स्थानीय लोगों में उनके प्रति विश्वास पैदा नहीं हो पाया है, उनसे अपनी सुरक्षा का अहसास पैदा नहीं हो पाया है, और वह नक्सलियों को अपने बीच छिपने का मौका देते हैं, तो यह सेना और सरकार की कमी और घोर विफलता है। साफ है कि ग्रामीणों और आदिवासियों को पुसिल और सेना से ज्यादा नक्सलियों पर भरोसा है इसीलिए नक्सलियों के क्षेत्र में होने की सूचना इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट को नहीं मिलती है।
आज ओडिशा, महाराष्ट, पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में नक्सलियों ने तांडव मचा रखा है। छत्तीसगढ़ तो नक्सलियों के गढ़ के रूप में ख्यात हो चुका है। मोदी सरकार के दौर में यहां कई बड़ी नक्सली घटनाएं हुई हैं, जिनमें सैकड़ों जवान शहीद हो चुके हैं। जवानों को मार कर हजारों की संख्या में उनकी सरकारी बन्दूकें, पिस्तौलें, वायरलेस सेट, दूरबीन, बुलेटप्रूफ जैकेट, माइन डिटेक्टर, जिंदा कारतूस, मैग्जीन और अंडर बैरल ग्रेनेड लॉन्चर लूट कर नक्सली फरार हो चुके हैं और उनकी परछाईं तक खुफिया एजेंसियों को कभी नहीं मिली। ऐसे में गोली का जवाब गोली से देते रहने से और देश की धरती को देश के नागरिकों और देश के जवानों के खून से रक्तरंजित करते रहने से इस समस्या का समाधान कभी नहीं होगा। इसके समाधान के लिए इन तमाम क्षेत्रों के वाशिंदों के साथ समन्वय बनाने और लगातार वार्तालाप करने की जरूरत है।
-इन्द्र कुमार