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अपनों से ही डर

लोकसभा चुनाव में किसकी सरकार बनेगी यह तो 23 मई को साफ हो जाएगा। लेकिन राजस्थान में अजब-गजब माहौल ने राजनीतिक पार्टियों को फेर में डाल दिया है। पार्टियों को विरोधियों के साथ ही अपनों का भी डर सता रहा है। दरअसल कुछ प्रत्याशियों को अपनों की भितरघात की संभावना ने परेशान कर रखा है तो कुछ का प्रत्यक्ष रूप से विरोध हुआ है। महाराष्ट्र के दोनों गठबंधनों, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-शिवसेना और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), ने इधर अपने चुनाव अभियान के लिए कमर कसी, उधर उनकी निजी अदावतों ने खासकर पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में उनकी चुनावी तैयारी को ग्रहण लगा दिया। ये सभी दल चार साल एक दूसरे से लडऩे के बाद अपना-अपना गठबंधन कर साथ आए हैं। लेकिन उनमें दिलों की दूरियां कायम हैं। राज्य में कम से कम आठ लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां गठबंधन के भागीदार एक-दूसरे के खिलाफ होने की वजह से नतीजे उनके खिलाफ जा सकते हैं।
छह में से तीन विधानसभा क्षेत्रों में अपनी शैक्षणिक संस्थाओं के जरिए वोटरों पर असर रखने वाले कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य सतेज पाटील कोल्हापुर में एक अभियान चला रहे हैं जिसका नारा है आमचं ठरलं (हमने फैसला कर लिया है)। इसके जरिए वे एनसीपी के उम्मीदवार और मौजूदा सांसद धनंजय महाडिक को वोट नहीं देने की अपील कर रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता खुलेआम महाडिक के खिलाफ काम कर रहे हैं। पाटील की मुहिम इतनी असरदार है कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार को सुलह करवाने के लिए पखवाड़े में चार बार कोल्हापुर आना पड़ा। पवार ने 12 अप्रैल को एक रैली में धमकी देते हुए कहा, वे कहते हैं उन्होंने फैसला कर लिया है। मैं पूरे राज्य में घूम रहा हूं और अच्छी तरह जानता हूं कि कौन क्या कर रहा है। मैंने भी फैसला कर लिया है कि क्या करना है। कांग्रेस और शिवसेना के बीच अच्छे रिश्ते तब साफ जाहिर हो गए जब पाटिल की सालगिरह पर 11 अप्रैल को शिवसेना के उम्मीदवार संजय मंडलिक ने उनके साथ आमचं ठरलं की धुन पर ठुमके लगाए।
पड़ोस के लोकसभा क्षेत्र माधा में भी निजी अदावत अपने चरम पर है। 2009 में शरद पवार ने इस सीट की नुमाइंदगी की थी। उनके मुकाबले से हटने के बाद यह फिर चर्चा में आ गई। एक सूत्र का कहना है कि पवार ने यह फैसला तीन सर्वे करवाने के बाद लिया जिनमें सामने आया था कि वे माढा में हार जाएंगे क्योंकि एनसीपी की अंतर्कलह और कांग्रेस के साथ उसके टकरावों ने संगठन को खोखला कर दिया है। यहां के छह में से चार विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के कार्यकर्ता एनसीपी के खिलाफ हो गए हैं। मान-खटाव के कांग्रेस विधायक जयकुमार गोरे ने भाजपा के उम्मीदवार रणजीतसिंह नाईक-निंबालकर को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। सांगोला के पूर्व कांग्रेस विधायक शाहाजी पाटील, जो 1995 में दिग्गज नेता गणपतराव देशमुख को हराकर कद्दावर नेता बन गए थे और एक और पूर्व कांग्रेस विधायक कल्याण काले ने भी ऐलान किया है कि वे भाजपा के लिए काम करेंगे और वह भी केवल इसलिए क्योंकि वे एनसीपी को हराना चाहते हैं। मालशिरस के एक किसान सुदाम शेलके कहते हैं, यह एनसीपी बनाम बाकी सब का चुनाव है।
पवार के अपने गृहक्षेत्र बारामती में कांग्रेस के दो विधायकों इंदापुर के हर्षवर्धन पाटील और भोर के संग्राम थोपटे, की भूमिका संदेह के घेरे में है। एनसीपी इन दोनों विधायकों के विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा पर बढ़त हासिल करने के लिए उन पर निर्भर है।
राजस्व मंत्री और भाजपा के पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रभारी चंद्रकांत पाटील दावा करते हैं कि पाटील (हर्षवर्धन) अंदरखाने भाजपा की मदद कर रहे हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद वे भाजपा में शामिल होने के लिए तैयार हैं। हालांकि यहां के एक स्थानीय राजनीतिक पर्यवेक्षक सावता नवले को लगता है कि पाटील और थोपटे नाराज जरूर हैं पर वे एनसीपी से किनारा नहीं करेंगे। महाराष्ट्र में कई अन्य नेता ऐसे हैं जो दिख तो अपनों के साथ रहे हैं और काम दूसरे के लिए कर रहे हैं।
– बिन्दु माथुर