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कुपोषण की कागजी जंग

अनूपपुर जिले में बढ़ती आबादी के साथ कुपोषण का प्रभाव भी बढ़ता चला गया। जिसमें कुपोषण से लडऩे स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास विभाग की लापरवाहपूर्ण भूमिका ने जिले में चिह्नित 10 हजार से अधिक कुपोषित बच्चों की जान को खतरे में डाल दिया है। हालात यह हैं कि जिला और ब्लॉक स्तर पर आयोजित कार्यशालाओं व प्रशिक्षणों के बाद भी चिह्नित हुए कुपोषित बच्चों में मात्र 65 फीसदी बच्चों को एनआरसी केन्द्रों पर भर्ती कराया जा सका है। शेष चिह्नित बच्चों को एनआरसी तक पहुंचाने की पहल नहीं की जा सकी है। जिसके कारण वर्ष 2018-2019 के आंकड़ों में देखा जाए तो जिले के खंड स्तर पर संचालित अनूपपुर, कोतमा, जैतहरी, राजेन्द्रग्राम व करपा पोषण पुर्नवास केन्द्रों में निर्धारित सीटों के बाद भी आधे से कम की भर्ती हो सकी। इसमें जिला मुख्यालय अनूपपुर में भर्ती कराने की प्रक्रिया बहुत ही निराशाजनक रही। इसका मुख्य कारण ऐसे कुपोषित बच्चों के अभिभावकों को प्रेरित कर पुनर्वास केन्द्र तक भेजने में कॉन्सलर सहित क्षेत्र में कार्यरत अमले की अक्षमता मानी गई है। हालांकि कुछ प्रकरणों में मजदूर परिवार के जच्चा व बच्चा केन्द्र इस वजह से नहीं पहुंच पाते, क्योंकि केन्द्र में भर्ती होने पर 15 दिनों तक वह घर से दूर हो जाएंगे तथा घर पर पारिवारिक व्यवस्थाओं को संचालित करने में उनकी कमी महसूस की जाएगी। लेकिन जानकारों का मानना है कि अगर अभिभावकों को बच्चों को होने वाले कुपोषण और उससे होने वाले खतरों के प्रति अमला प्रेरित करने का कार्य करेगा तो 100 बच्चों में 95 बच्चे अवश्य रूप से एनआरसी केन्द्र पहुंचेंगे। लेकिन कुपोषण के प्रति विभागीय अनदेखी ने इसे और अधिक प्रभावी बना दिया है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी महिला बाल विकास विभाग के पास उपलब्ध जानकारियों में पिछले एक साल में कुपोषण से लडऩे विभागीय अमले ने सिर्फ कागजी जंग जारी रखी है। जबकि ब्लॉक स्तर पर कुपोषण से न्यून लक्ष्यों के साथ लडऩे की रणनीतियों में भी विभाग खरा नहीं उतर पाया है। यहीं वजह रही कि पिछले एक साल में जिलेभर के विभिन्न केन्द्रों पर निर्धारित लक्ष्य में कुल 1680 में मात्र 1097 बच्चों को ही भर्ती कराने में समर्थ हो सकी है, जो लक्ष्य का मात्र 65.30 फीसदी आंकड़ा है। जिसमें अनूपपुर ब्लॉक की निर्धारित लक्ष्यों में 480 की जगह सालभर में मात्र 281 बच्चों यानि 58.54 फीसदी ही भर्ती हो सके हैं।
उमरिया जिले में कुपोषण बीते वर्षों की तुलना में घटने के स्थान पर बढ़ता ही जा रहा है। महिला बाल विकास विभाग का कहना है कि पहले कुपोषित बच्चों को खोजा नहीं गया था, इसके कारण पहले से कुपोषित बच्चों की संख्या में वृद्धि दिखाई हुई है। सन् 2014 में कुपोषित बच्चों की संख्या जिले में 1729 थी, वर्तमान समय में जिले मेंं 2613 से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। जानकारों के अनुसार जिले में कुपोषण ना घटने का प्रमुख कारण अधिकारियों की लापरवाही के साथ, खाद्यान्न उठाव की स्थिति को बिगाडऩा और इसमें भ्रष्टाचार करना, स्नीप परियोजना को सही तरीके से लागू नहीं कर पाना शामिल है। अधिकांश सालों से जमे परियोजना अधिकारी अपने कार्यालयों से ही सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों में निगाह रखने की कोशिश करते हैं, जिसके कारण कई माह में पोषण पुर्नवास केन्द्रों में कुपोषित बच्चों की संख्या नगण्य रहती है।
जिले में मिनी और आंगनबाड़ी केन्द्रो की संख्या कुल 637 है। इन सभी केन्द्रों में पोषण आहार को सही तरीके से पहुंचाने की जिम्मेदारी विभाग की रहती है। इसके लिए और खाद्यान्न उठाव के लिए जो बजट शासन के द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, उसकी बंदरबांट विभाग के अधिकारियों के द्वारा की जाती है। इसकी लिखित शिकायत भी मुख्यमंत्री से की गयी है। परियोजना अधिकारी और विभाग प्रमुख आपसी तालमेल के साथ पोषण आहार को केन्द्रों तक पहुंचाने में धांधली करते हैं। जानकारी के अनुसार मंहगाई के दौर में भी पोषण आहार केन्द्रों तक पहुंचाने वाले सन् 2007 की रेट में पोषण आहार को केन्द्रों में पहुंचा रहे है। वे लोग इसे किस लालच में कर रहे हैं, यह जांच के बाद ही पता चल सकता है।
– धर्मेन्द्र सिंह कथूरिया