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समर्थन मूल्य की चिंता

भोर की किरण फूटने से पहले आदिवासी परिवार खाली बोरा लेकर जंगल निकल जाते हैं। पहाड़ की पगडंडियों पर ढाई-तीन घंटे पैदल चलकर सूर्योदय होते-होते वे घने जंगल के उन इलाकों में पहुंंच जाते हैं, जहां महुआ के पेड़ बहुतायात मात्रा में होते हैं। ये लोग एक-एक बोरा महुआ संग्रह कर शाम तक घर लौट आते हैं, लेकिन निराशा इस बात की है कि इतनी मेहनत के बाद उन्हें इसका उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा। गत वर्ष शासन ने समर्थन मूल्य पर महुआ खरीदी की व्यवस्था की थी, लेकिन इस वर्ष अब तक यह प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। लिहाजा, विचौलिये सक्रिय हो गए हैं, जो औने-पौने दाम पर महुआ बेचने के लिए दबाव बना रहे हैं।
आदिवासी अंचल की नगदी फसल कहलाने वाले महुआ की खुले बाजार में आवक शुरू हो चुकी है। इस बार फसल कहीं कम और कहीं ज्यादा है। इसके कारण दाम भी 30 से 40 रुपए प्रति किलो चल रहे है। आने वाले दिनों में दाम और आवक दोनों में सुधार होने की बात व्यापारी और संग्राहक कर रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर महुआ नहीं बिकेगा। समर्थन मूल्य 30 रुपए किलो है। इससे अधिक दाम पर महुआ बिक रहा है। पुनर्वास क्षेत्र के तवापार के नारायणपुर, विष्णुपुर समेत एक दर्जन गांवों में महुआ फसल कमजोर है। शाहपुर के आसपास फसल बेहतर है। सेंचुरी एरिया के गांव विस्थापित होने से महुआ फूल एवं अन्य लघुवनोपज का बड़ा बाजार रामपुर कमजोर हो गया है। इसका असर शाहपुर और भौंरा की आवक पर पडऩे की बात व्यापारी कर रहे है। चोपना के खितीश खराती का कहना है चोपना में महुआ फसल कमजोर है, लेकिन सालीवाड़ा सिवनपाट की तरफ फसल अच्छी है। महुआ व्यापारी संतोष नायक का कहना है शाहपुर, भौंरा क्षेत्र में फसल अच्छी है।
माड़ा तहसील के गांव नगवा व इसके आसपास बड़ी संख्या में श्रमिक परिवारों की दिनचर्या इन दिनों यही है। इन परिवारों को तेज गर्मी में कुछ दिन और महुआ गिरने की इसी अवधि में अधिकाधिक महुआ संकलन कर परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा आर्थिक संबल जुटाना है। इसलिए इन दिनों अधिकतर आदिवासी या श्रमिक परिवारों की दिनचर्या बदली है। अन्य दिनों में वे काम की तलाश मेंं इधर-उधर जाते है पर इन दिनोंं उनकी दिनचर्या व उम्मीद जंगल तथा वहां खड़े महुआ के पेड़ के आसपास सिमटी है।
गांव नगवा निवासी मनबसिया नाई व बजरंग बली यादव भी परिवार के लोगों के साथ मुंह अंधेरे निकट के बंधोरा जंगल में महुआ संकलन को जाते हैं। उनको खतरनाक रास्तों, सीधी चढ़ाई व तीखी ढलान पार कर 8-10 किलोमीटर चलकर जंगल मेंं पहुंचना पड़ता है। नगवा सहित आसपास के अन्य गांवों के श्रमिक भी बड़ी संख्या मेंंं सूर्योदय तक जंगल मेेंं पहुंच जाते हैं और क्षमता से महुआ संकलन के बाद बोरा कंधे पर लादकर वापस लौट जाते हैं। नगवा के केवलाप्रसाद नापित, कंतलिप्रसाद यादव, राजनारायण नापित, राजकुमार यादव, रघुनंदन नापित व आसपास के दूसरे गांवों के दर्जनों अन्य परिवारों की मौजूदगी के कारण इन दिनों जंगल मेंं चहल-पहल है।
श्रमिक कंतलिप्रसाद यादव, रघुनंदन नापित व राजकुमार यादव ने बताया कि एक जना औसतन पांच-छह किलो महुआ संकलन कर रहा है। उनको इसका 30-35 रुपए प्रति किलो दाम मिल रहा है। इस प्रकार इस सीजन में महुआ संकलन कर हर श्रमिक परिवार कुछ न कुछ दाम कमा पा रहा है। उन्होंने बताया कि इन दिनों जंगल में पेड़ों की रखवाली भी करनी पड़ रही है। बताया गया कि कई परिवारों के एक-दो सदस्यों ने जंगल में अस्थाई ठिकाना तक बना लिया। श्रमिकों की शिकायत है कि उनके लिए महुआ बिक्री की उचित सुविधा नहीं है। इसलिए उनको गांव या आसपास के व्यापारियों को ही महुआ बेचना पड़ता है। श्रमिकों ने बताया कि पिछले वर्ष सीजन में वन विभाग ने जंगल के बाहर डिपो खोला और वहां महुआ खरीद की थी। वन विभाग को बेचने पर उनको प्रति किलो महुआ का 30 रुपए दाम मिला।
-कुमार विनोद