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डर्टी पॉलिटिक्स

क्या वह राहुल गांधी को इस बात का सुबूत दे पाएंगी कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी उनके पिता हैं? यह सवाल अक्सर विवादित बयान देने वाले भाजपा नेता विनय कटियार ने संप्रग अध्यक्ष से एक रैली में की। इससे पहले कटियार ने प्रियंका गांधी पर भी कथित आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। नरेंद्र मोदी ने पैंट और पैजामा पहनना भी नहीं सीखा था तब पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने देश की फौज, नौसेना और वायुसेना बनाई थी यह कहना है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ का।
आखिरकार चुनाव आयोग ने कुछ नेताओं की बदजुबानी को लेकर सख्त रवैया अपनाया है। उसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बीएसपी सुप्रीमो मायावती, केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान द्वारा प्रचार के दौरान सांप्रदायिक और अभद्र बयान देने की शिकायतों पर संज्ञान लिया। इसके साथ ही अलग-अलग आदेश जारी करके मायावती और मेनका गांधी के चुनाव प्रचार करने पर 48 घंटे की और योगी आदित्यनाथ और आजम खां पर 72 घंटे की रोक लगा दी है। चुनाव आयोग ने सार्थक प्रयास किया है, लेकिन इसे ज्यादा प्रभावी बनाये गया, तो आज कम से कम 25 प्रतिशत राजनेता और उम्मीदवार इसके दायरे में होंगे।
इस लोकसभा चुनाव में विभिन्न दलों के बीच जैसी कटुता और नेताओं की भाषा में जिस स्तर की अभद्रता देखी जा रही है, वह चिंता का विषय है। 1977 और 1989 के चुनावों में भी सियासी तनातनी कुछ-कुछ आज जैसी ही थी लेकिन भाषा का पैमाना इतना नीचे तब भी नहीं आया था। इस बार तो जैसे अमर्यादित होने की होड़ सी लग गई है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पूरे विश्व के बदलते माहौल का असर है। अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव और उसके बाद होने वाले यूरोप के चुनावों में ऐसी ही गिरावट देखी गई थी। एक राय यह भी है कि सोशल मीडिया जैसे नए संचार माध्यम के कारण भी कटुता तेजी से फैल रही है। यह टकराव दिमाग पर इस कदर हावी रहता है कि एक उम्मीदवार अपने प्रतिद्वंद्वी की आलोचना का करारा जवाब देने की कोशिश में धैर्य खो बैठता है। इस बार एक नई बात यह देखी जा रही है कि नेतागण सीधे मतदाताओं को धमका रहे हैं। जिन लोगों के ऊपर सिस्टम को चलाने और बचाए रखने की जिम्मेदारी है, वही ऐसी गतिविधियों में लिप्त हैं। चुनाव आयोग की ताकत सीमित है। वह प्रतीकात्मक फैसले ही दे सकता है। न्यायपालिका की भूमिका भी इसमें बहुत ज्यादा नहीं हो
सकती क्योंकि इस मामले में कोई सुसंगत कानून नहीं बना है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि अराजकता का व्याकरण लोकतंत्र को काम करने लायक नहीं रहने देगा। राजनीति में मर्यादा हर हाल में बनी रहनी चाहिए, तभी लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा। मतदाता जिस तरह अपने प्रतिनिधियों के कामकाज पर सवाल करते हैं, उसी तरह उन्हें नेताओं के बिगड़े बोल पर भी आपत्ति करनी चाहिए।
नेताओं के बिगड़े बोलों और बेतुके बयानों के लगातार मीडिया में सुर्खियां बनने पर लोगों को एकबारगी फिर यह एहसास हो गया कि चुनावी मौसम आ गया है और इस मौसम में गालियां, एक-दूसरे को नीचा दिखाना और छींटाकशी का दौर शुरू होना नेताओं की फितरत है। वैसे, हमारे देश के कुछ नेता चुनावी मौसम में जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं और उनकी जबान करेले की तरह कड़वी हो जाती है।
चुनावी समय में कोई धर्म के नाम पर वोट मांगता है तो कोई जाति के नाम पर। इस दौरान सांप्रदायिक सद्भाव बिगाडऩे का माहौल भी खूब बनाया जाता है। क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू ने पिछले दिनों चुनावी रैली में बोलते हुए कहा, अल्पसंख्यको, समय आ गया है कि आप वोट की ताकत दिखाओ और उन्हें हराओ जो आप का दुश्मन है। इस जगह आपकी आबादी ज्यादा है, इसलिए यह आप के हाथ में है कि किसे बहुमत से जीता जा सकते हो, यह क्या बोल गए आजम खान सपा नेता आजम खान के कथित बोल ने तो मर्यादा की सारी हदें ही लांघ दीं। डर्टी पॉलिटिक्स पर शीर्ष अदालत ने भी संज्ञान लिया और आयोग की कार्रवाई को उचित ठहराया। जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा, हम कह सकते हैं कि चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया। उसने आचार संहिता तोडऩे वालों पर कार्रवाई की।
-अक्स ब्यूरो