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फिर पावरफुल हुए शिवराज

मध्य प्रदेश में 13 साल तक मुख्यमंत्री रहकर हर चुनाव में अपनी अहम् भूमिका निभाने वाले शिवराज सिंह चौहान पर पार्टी हाईकमान ने एक बार फिर भरोसा जताया है। विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव भी शिवराज ही लीड करेंगे। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने शिवराज को चुनाव की कमान सौंपी है। इससे पहले कई नेताओं को हाई कमान ने परखा लेकिन शिवराज ही एक मात्र पसंद है जिन पर एक बार फिर बड़ी जिम्मेदारी है। शिवराज पांव-पांव वाले भैया के नाम से जाने जाते हैं, जो सबसे ज्यादा दौरे करते हैं और चुनावी समय में उन पर प्रत्याशियों के समर्थन में सबसे ज्यादा सभाएं करने की भी जिम्मेदारी रहेगी।
मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी में चरम तक पहुंच चुकी गुटबाजी ने शिवराज सिंह चौहान को काफी प्रभावित किया परंतु संगठन में विरोधियों की तमाम लामबंदी भी शिवराज सिंह को मध्यप्रदेश से अलग नहीं कर पाई। खबर आ रही है कि पीएम नरेंद्र मोदी एवं अध्यक्ष अमित शाह ने अंतत: लोकसभा चुनाव की कमान शिवराज सिंह चौहान को सौंप दी है। इससे पहले तक शिवराज सिंह को निर्देशित किया गया था कि वो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद का दायित्व निभाएं, मप्र की चिंता छोड़ दें।
खबर आ रही है कि लंबी चर्चा और कई नेताओं को परखने के बाद आलाकमान ने शिवराज सिंह चौहान को मप्र की जिम्मेदारी दी है। वे चुनाव का नेतृत्व करने के साथ-साथ केंद्रीय संगठन के सहयोग खर्च का जिम्मा भी संभालेंगे। बताया जा रहा है कि यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लिया है। राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल मॉनिटरिंग करेंगे। मप्र में कहां-कहां किसकी रैलियां होंगी, कौन कहां सभा करेगा, यह भी शिवराज तय कर रहे हैं। खुद शिवराज ने 19 अप्रैल से मप्र में सभाओं और रैली की शुरुआत कर दी है।
शिवराज सिंह चौहान और उनके विरोधियों के बीच पूरे 23 दिन तक संघर्ष चला। विरोधियों ने अमित शाह को भरोसा दिला दिया था कि शिवराज सिंह चौहान के बिना भी मध्यप्रदेश में भाजपा वैसी ही नजर आएगी, जैसी कि दिखाई देती थी। शिवराज सिंह को शिथिल करने से फायदा ही होगा, नुक्सान नहीं होगा। अमित शाह ने शिवराज सिंह को पीछे हटने के लिए कह भी दिया परंतु गुटबाज संगठन पर राज नहीं कर पाए। शिवराज सिंह लगातार संघर्ष करते रहे और 23 दिन बाद लोकसभा चुनाव की चाबी अपने कुर्ते की जेब में रख लाए।
केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह चूंकि खुद चुनाव मैदान में हैं, इसलिए वे सक्रिय नहीं थे। बीच-बीच में स्वतंत्र देव व सतीश उपाध्याय लोकसभा में बैठकें लेकर अपनी उपस्थिति दिखा रहे थे। नेता प्रतिपक्ष भार्गव और प्रभात झा भोपाल में होते हुए भी उनके दौरे कार्यक्रम तय किए गए। विनय सहस्त्रबुद्धे अपने कामों में व्यस्त रहे। लोकसभा के हिसाब से मप्र का जिम्मा देख रहे अनिल जैन दिल्ली में रहे। चुनाव लीड कौन करेगा यह तय नहीं हो रहा था।
विधानसभा चुनाव के बाद अलग-थलग किए गए शिवराज को पार्टी हाइकमान ने फिर से लीडरशीप सौंप दी है। विधानसभा हार के बाद शिवराज हाशिए पर जा रहे थे। वह परिदृष्य अब बदल चुका है। इसकी वजह है- पार्टी हाइकमान को इन सौ दिनों में समझ आ गया कि प्रदेश के नेता तो आज भी शिवराज हैं। वे पिछले 13 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए सरकार ही नहीं चलाते रहे बल्कि संगठन में भी पूरी दखल देते रहे हैं।
भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह या नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव को मौका दिया गया। लेकिन वे पूरे प्रदेश के नेता नहीं बन पाए। आज भी जनता के बीच लोकप्रिय और जाना -पहचाना चेहरा शिवराज हैं। जिसकी अहमियत को पार्टी हाइकमान नकार नहीं पाई है। तमाम अटकलों के बावजूद शिवराज सिंह का प्रदेश की राजनीति में बने रहने का दबाव भी काम आया है। हाइकमान उन्हें भोपाल से चुनाव मैदान में उतारना चाहता था। शिवराज आखिरी दम तक इस बात के लिए अड़े रहे कि वे दिल्ली की राजनीति में जाना नहीं चाहते। वे अपने इस मकसद में कामयाब भी रहे।
– अजय धीर