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पलायन का दंश

फसल कटाई को मजदूरों के साथ पलायन करके गए महिला एवं बाल विकास विभाग के लिये चुनौती बन गए हैं। वापस लौट रहे इन बच्चों की सेहत की जांच की तो अफसरों के रोंगटे खड़े हो गए क्योंकि, बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषित मिल रहे हैं। मार्च माह में हजारों आदिवासी फसल कटाई के लिए दूसरे मुरैना से लेकर राजस्थान तक पलायन कर जाते हैं। इन पलायनित परिवारों के साथ बड़ी संख्या में बच्चे भी होते हैं। परिवार के साथ पलायन कर गए बच्चे कुपोषण की जद में न आ जाए इसके लिए विभाग बच्चों की निगरानी करता है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सुपरवाईजर और ग्रोथ मोनिटर के माध्यम से पलायनित बच्चों की सूची विभाग ने तैयार की है। विभाग ने जो सूची तैयार की है उसमें 0 से 6 वर्ष तक के करीब 2500 बच्चे सूचीबद्घ किए गए हैं। इनमें से अकेले कराहल विकास खंड के 1600 बच्चे शामिल हैं। बड़ी संख्या में विभाग को बच्चे कुपोषित मिल रहे हैं। परेशानी यह है कि इनमें से कई बच्चे ऐसे है जिन्हें तत्काल एनआरसी में भर्ती कराना जरूरी है, लेकिन एक माह बाद पलायन से वापस लौटे माता-पिता अब घर छोड़कर एनआरसी जाना नहीं चाहते है।
एक माह तक फसल कटाई के बाद बापस अपने गांव कलमी में लौटे बच्चों का वजन विभाग द्वारा किया गया। सुपरवाईजर सुषमा सोनी ने बताया कि इस गांव से 40 बच्चे माता-पिता के साथ पलायन कर गए थे उनमें से 21 बच्चे लौट आए हैं। वजन करने पर नंदनी (12 माह) पुत्री सूरज आदिवासी, जामफली (12 माह) पुत्री विनोद आदिवासी, शौकीन (2 वर्ष) पुत्र शिवलाल आदिवासी गंभीर कुपोषित मिले। इन्हें टीम ने तत्काल एनआरसी भर्ती कराने की सलाह दी। माता-पिता ने कहा कि उनके यहां रिश्तेदारी में शादी है। शादी के बाद एनआरसी जाएंगे। इसके अलावा इस गु्रप में 4 बच्चे अति कुपोषित और 2 बच्चे मध्यम कुपोषित भी मिले है।
जो बच्चे गंभीर कुपोषित मिल रहे है उन्हे एनआरसी में भर्ती भी कराया जा रहा है। उधर एनआरसी से बच्चों के भाग जाने की समस्या से कुपोषण रोकने की कवायद को पलीता लग रहा है। एनआरसी में भर्ती कुलदीप एवं प्रवीण पुत्र बलराम निवासी मकडावदा, दीप्ती पुत्री राजू निवासी गोरस, निशा पुत्री विनोद आदिवासी निवासी सरजू पुरा श्योपुर एनआरसी में बच्चों को 6 दिन भर्ती करने के बाद बिना बताए वापस ले गई। इससे पहले भी कलमी गांव से राधा नाम की महिला अपनी बच्ची को 7 दिन एनआरसी में इलाज के बाद बिना बताए वापस ले गई।
एनआरसी स्टॉफ सही व्यवहार नहीं करता है हमसे कहा जाता है कि कोई पूछे तो बताना कि सब अच्छा है। अनियमितताएं बताने पर स्टॉफ गाली देता है। बुरे व्यवहार के कारण में अपनी बच्ची को एनआरसी में 7 दिन इलाज करा कर लौट आई थी। डीपीओ महिला बाल विकास विभाग रतन सिंह गुंडिया कहती हैं कि पलायनित बच्चे विभाग की निगरानी में है वापस लौटने पर उनका वजन करा कर उन्हें एनआरसी, डे-केयर सेंटर की सेवाएं दी जा रही है। सहागल होने के चलते भी अभिभावक बच्चों को एनआरसी में भर्ती नहीं करा रहे हैं यह भी बड़ी समस्या है।
जिले के कई गांवों में आधे से ज्यादा परिवार रोजगार की तलाश में मार्च माह में पलायन कर गए थे और उनके बच्चे भी गांव में नहीं थे। फिर भी अपनी योजना को सफल दर्शाने के फेर में आंगनबाड़ी केंद्रों पर कागजों में 70 से 90 फीसदी तक बच्चों की उपस्थित बताई गई है। कराहल के बागचा आंगनबाड़ी केंद्र पर करीब 60 बच्चे आते हैं, जबकि बस्ती की आबादी करीब 70 घरों की है। इसमें से मार्च में 90 फीसदी से ज्यादा परिवार पलायन कर गए थे।
गांव के वीरेंद्र आदिवासी ने बताया कि गांव में बच्चे न के बराबर रह गए थे लेकिन यहां के आंगनबाड़ी केंद्र के रिकॉर्ड में 70 फीसदी बच्चों को उपस्थित बताया जा रहा है। कराहल के ही मराठा गांव में आंगनबाड़ी केंद्र ही मार्च माह में नहीं खुला और यहां बच्चों की उपस्थित 80 फीसदी बताई गई है। करीब 90 घरों की इस बस्ती में मार्च माह में 90 फीसदी तक परिवार बच्चों के साथ पलायन कर गए थे। ऐसे में आंगनबाड़ी केंद्र को भोजन के भुगतान की श्रेणी में जोड़ा गया है। गांव के किशन आदिवासी से बातचीत की तो उसने बताया कि गांव के परिवार अब लौट रहे है और मार्च में तो पूरा गांव ही खाली हो गया था।
– धर्मेन्द्र सिंह कथूरिया