jangalnama

लचर सुरक्षा

न वाहन, न स्टाफ समरधा रेंज में इस समय बाघिन और उसके दो शावक भ्रमण कर रहे हैं। बाघिन और शावक अक्सर भानपुर सर्किल की चीचली बीट में दिखते हैं, लेकिन इस सर्किल में मात्र चार वनरक्षकों का स्टाफ है, जबकि बीट में एक वनरक्षक हैं। इन्हीं के पास रात्रिकालीन गश्त और फील्ड दोनों की जिम्मेदारी भी रहती है। रेंज में बाघों की सुरक्षा और गश्त के लिए मात्र दो वाहन है, वह भी अक्सर केरवा चौकी के पास गश्त करते हैं जबकि भानपुर जैसे सर्किल की ओर कम चक्कर लगता है।
समरधा रेंज में बाघों के मूवमेंट के बावजूद सुरक्षा चौकीदारों की संख्या बेहद कम है। भानपुर सर्किल में मात्र 22 चौकीदारों को रखा गया है। जबकि एक बीट में तो इनकी संख्या चार से पांच ही रह जाती है। उस पर हालात यह है कि जो चौकीदार रखे जाते हैं उन्हें भी न तो कोई ट्रेनिंग दी जाती है, न ही वर्दी ही होती है। हालात यह है कि सुरक्षा चौकीदारों को मात्र सात हजार रुपए वेतन दिया जाता है वह भी अक्सर सही समय पर नहीं मिलता। इनके पास टार्च भी नहीं होती, बिना वर्दी और टार्च सादे कपड़ों में जंगलों में दिन-रात ऐसे ही घूमने वाले चौकीदार कितना सुरक्षा कर सकते हैं यह स्पष्ट है।
भारत में बाघों की संख्या लगातार कम होती जा रही हैं। कभी लोगों के बीच अपनी दहाड़ से दहशत पैदा करने वाले बाघ आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बढ़ते शहरीकरण और सिकुड़ते जंगलों ने जहां बाघों से उनका आशियाना छीना हैं, वहीं मानव ने भी बाघों के साथ क्रूरता बरतने में कोई कसर नहीं छोड़ी हैं। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक बीते दो साल में देश में 201 बाघों की मौत हुई है। इनमें से 63 बाघों का शिकार किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में 116 और 2018 में 85 बाघों की मौत हुई है। 2018 में हुई गणना के अनुसार बाघों की संख्या 308 है। साल 2016 में 120 बाघों की मौतें हुईं थीं, जो साल 2006 के बाद सबसे अधिक थी। साल 2015 में 80 बाघों की मौत की पुष्टि की गई थी। इससे पहले साल 2014 में यह संख्या 78 थी। आज दुनिया में केवल 3,890 बाघ ही बचे हैं। अकेले भारत में दुनिया के 60 फीसदी बाघ पाये जाते हैं। लेकिन भारत में बाघों की संख्या में बीते सालों में काफी गिरावट आई है। एक सदी पहले भारत में कुल एक लाख बाघ हुआ करते थे। यह संख्या आज घटकर महज 1500 रह गई है। ये बाघ अब भारत के दो फीसदी हिस्से में रह रहे हैं।
गति और शक्ति के लिए पहचाने जाने वाले इन बाघों की संख्या में आने वाली इस गिरावट के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। इसमें पहला कारण तो निरंतर बढ़ती आबादी और तीव्र गति से होते शहरीकरण की वजह से दिनोंदिन जंगलों का स्थान कांक्रीट के मकान लेते जा रहे हैं। यूं कहे कि जंगल में जबरन घुसे विकास ने जानवरों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। वनोन्मूलन के कारण बाघों के रहने के निवास में कमी आ रही हैं, जिससे बाघों की संख्या घटती जा रही हैं। वहीं दूसरा कारण बाघों की होने वाली तस्करी हैं। बाघों के साम्राज्य में डिजिटल कैमरे की घुसपैठ और पर्यटन की खुली छूट के कारण तस्कर आसानी से बाघों तक पहुंच रहे हैं और तस्करी की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि अभयारण्यों के आसपास रहने वाले कुत्ते संक्रामक बीमारी फैला रहे हैं, जो बाघों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। इसके अलावा करंट, आपसी संघर्ष, रेल-रोड एक्सीडेंट और जहर देकर मारने के कारण भी सामने आ रहे हैं। गौर करने वाली बात तो यह भी है कि अधिकतर बाघों की मौत इंसानी बस्तियों में घुसने और शिकारियों के हाथों हुई हैं और हो रही हैं। जंगलों में पानी के अभाव के कारण अक्सर बाघ मानव बस्तियों तक आने के लिए विवश हो रहे हैं। जिसके चलते कई बार बाघों के सिर पानी के बर्तन में फंसने की खबरे सुर्खियों में रहती है।
बाघ परिस्थिति के लिए खास महत्व रखता है। पारिस्थितिकी पिरामिड तथा आहार श्रृंखला में बाघ सबसे बड़ा उपभोक्ता है। आज बाघ संरक्षण देश ही नहीं बल्कि दुनिया के समक्ष भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। संरक्षण के अभाव में बाघ से मिलने वाले लाभ से भी हमें वंचित रहना पड़ रहा है। भारत में भारतीय वन्यजीवन बोर्ड द्वारा 1972 में शेर के स्थान पर बाघ को भारत के राष्ट्रीय पशु के रूप में अपनाया गया था।
-कुमार विनोद