May__I__2019

महाचुनाव या महाभारत

लोकसभा चुनाव के चार चरणों के मतदान हो चुके हैं। इन चरणों में 343 सीटों पर मतदाताओं ने अपने मत का इस्तेमाल किया है। इसके साथ ही करीब 70 फीसदी सीटों पर उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो चुकी है। बाकी बची 169 सीटों पर तीन चरणों में चुनाव होगा। लेकिन इस चुनाव को राजनीतिक पार्टियां जिस तरह लड़ रही हैं उससे जनता असमंजस में है कि यह महाचुनाव है या महाभारत। दरअसल, इस चुनाव में साम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल खुलेआम हो रहा है।
लोकसभा चुनाव में मतदान के चार चरण बीतने के बाद दावों और संभावनाओं के बीच राजनीतिक दलों ने एक-एक सीट पर गुणा-भाग तेज कर दिया है। विपक्षी दल परदे के पीछे कुछ मसलों पर आपसी सहमति बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं, ताकि आखिरी चरणों में समीकरण को बदला जा सके। भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए चुनावों का चौथा चरण काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में इन 72 में से 56 सीटों पर उन्हें जीत मिली थी। बाकी बची 16 सीटों में से 2 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी जबकि शेष सीटें तृणमूल कांग्रेस (6) और बीजू जनता दल (6) जैसी विपक्षी पार्टियों के खाते में गई थी।
जमीनी मुद्दे गायब
भारतीय इतिहास में यह पहला ऐसा लोकसभा चुनाव है जिसमें जमीनी मुद्दे गायब हैं। इस बार के आमचुनाव में बुनियादी फर्क महसूस किया जा रहा है पिछले चुनाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि पिछली सरकारों ने अपने काम के आधार पर वोट मांगा था और वर्तमान सरकार ऐसा कुछ करती नजर नहीं आई। कभी बजरंग बली और अली की बात की गई तो कभी बालाकोट को मुद्दा बनाने की कोशिश की गई इन सबसे हटकर हिन्दू-मुसलमान करने की भी भरपूर कोशिश की गई परन्तु मोदी की भाजपा नाकाम रही। ऐसा ग्राउंड जीरो पर देखने को नहीं मिला 2019 के चुनाव में मोदी की भाजपा ने पूर्व सरकारों को पीछे छोड़ दिया है पूर्व की सरकारों ने अपने काम को आगे रख वोट मांगे थे। चाहे भाजपा की ही 2004 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार हो या 2009 में मनमोहन सरकार हो दोनों सरकारों ने अपने काम के दम पर वोट मांगे थे। लेकिन मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों की बजाए विपक्ष की विफलता को मुद्दा बनाए हुए है। असल बात जो देखने को मिली वो ये रही कि मोदी की भाजपा ने अपने काम को वोट मांगने का आधार नहीं बनाया और न ही काम को आधार बनने दिया।
चौथे चरण के बाद ठंडे पड़े दावे
लोकसभा संग्राम के आमचुनाव में 543 सीटों में से चार चरणों में 374 पर चुनाव हो चुका है जिसके बाद ये कहा जा सकता है कि देश में किसकी सरकार बनेगी ये लगभग तय हो चुका है। उधर चुनाव सर्वेक्षण करने वाली कंपनियों के सुर बदलना शुरू हो गए हैं। लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए को 300 प्लस सीटें देने वाले चुनावी विश्लेषक अब अपनी राय बदल रहे हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण करने वाली एक कंपनी के शीर्ष अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि अब चूंकि देश में आधी से अधिक लोकसभा सीटों के लिए चुनाव हो चुके हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि लोकसभा चुनाव पूर्व दिखाए गए अधिकांश सर्वेक्षण गलत साबित हो सकते हैं।
शीर्ष अधिकारी ने कहा कि लोकसभा चुनाव शुरू होने से पहले उत्तर भारत, पूर्वोत्तर और पश्चिम में जिस मोदी लहर के बरकरार होने की संभावनाओं को आधार बनाकर सर्वेक्षण तैयार किये गए थे, वे चौथे चरण के चुनाव के बाद धूमिल होते दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि चौथे चरण के चुनाव के बाद अब यह कहा जा सकता है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु यहां तक कि गुजरात में भी बीजेपी का प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं दिख रहा। ऐसे में लोकसभा चुनाव पूर्व दिखाए गए सर्वेक्षणों में कम से कम 100 से 110 सीटों का फर्क देखने को मिल सकता है। यह पूछे जाने पर कि क्या महाराष्ट्र और बिहार में एनडीए गठबंधन उम्मीदों पर खरा उतरेगा? अधिकारी ने कहा कि दोनों ही राज्यों में एनडीए को बंपर सफलता नहीं मिलती दिख रही लेकिन ओडिशा में बीजेपी का प्रदर्शन अन्य राज्यों की तुलना में कहीं बेहतर दिखाई दे रहा है। एक सवाल के जबाव में अधिकारी ने कहा कि केवल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात मिलाकर ही बीजेपी को 2014 के मुकाबले 75-80 सीटों का घाटा होता दिख रहा है। अधिकारी ने कहा कि अब तक जितनी भी जगह चुनाव हो चुके हैं, वहां मतदाताओं में बीजेपी के लिए 2014 जैसा जोश नहीं दिखा है। इसके अलावा शहरी इलाको में कम मतदान बीजेपी के वोट प्रतिशत पर भी असर डाल सकता है।
पूरे विश्व की नजर
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के चुनाव को हमेशा उत्सुकता से देखा जाता रहा है, लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा खास है। भारतीय चुनावों में अमेरिका, इंग्लैंड और विभिन्न यूरोपीय देशों की ज्यादा दिलचस्पी देखी गई है। लेकिन इस बार दक्षिण-पूर्वी एशिया और खाड़ी इलाके के कई देश इसमें काफी रुचि ले रहे हैं। उन्होंने भारत में नियुक्त अपने राजनयिकों को इस काम में लगाया है, जो अपनी कूटनीतिक सीमाओं में रहते हुए चुनावों के विभिन्न कारकों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। जैसे, एक युवा राजनयिक को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह यूपी के वोटिंग पैटर्न को समझे। सबकी बड़ी जिज्ञासा चुनावों में जाति की भूमिका को लेकर है। वे जानना चाहते हैं कि जाति जैसी पुरानी सामाजिक संरचना भारत जैसी तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था और आधुनिक जीवन मूल्यों वाले समाज में आखिर किस तरह अपनी निर्णायक उपस्थिति बनाए हुए है।
चार चरणों के मतदान के बाद अब लोगों की दिलचस्पी इस बात में सिमटती नजर आ रही हैं कि कौन सी पार्टी कितनी सीटें कहां से ले जाकर सरकार बनाएगी। चुनाव का हाल तो गर्भवती बहू जैसा हो गया है जिसकी चाल- ढाल, खान- पान और हाव- भाव देखते घर के बड़े बूढ़े अंदाजा लगाते रहते हैं कि लड़का होगा या फिर लड़की होगी। यही 23 मई को लेकर हो रहा है। सबका अपना-अपना अंदाज हैं कि इस दिन क्या होगा, क्या भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे और नाम के सहारे अपनी चुनावी नैया पार लगा पाएगी या फिर कांग्रेस उसकी राह में रोड़े अटकाने में कामयाब हो पाएगी। इस बात को लेकर राजनीतिक पंडितों, वैज्ञानिकों, विश्लेषकों और सटोरियों के साथ-साथ तोता छाप और ब्रांडेड ज्योतिषों के माथे पर भी बल हैं।
बहुत फर्क है 2014 और 2019 में
यह चुनाव 2014 के चुनावों से एकदम भिन्न है क्योंकि वोटर की कसौटी पर आस्था नहीं बल्कि पांच साल का कार्यकाल है। प्रचार भले ही धर्म, जाति, भूतपूर्व व वर्तमान भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद को लेकर ज्यादा हो रहा हो लेकिन हकीकत में वोट इस बात पर ज्यादा पड़ रहे है कि मोदी सरकार ने ऐसा किया क्या है, जो उसे दोबारा देश सौंप दिया जाये। सिर्फ यहीं सवाल, जो कोई 90 फीसदी लोग पूछ और सोच रहे हैं। पर कांग्रेस की उम्मीदें टिकी हैं। वजह उसे यह समझ आ रही है कि एयर स्ट्राइक और आतंकवाद के खात्मे का हल्ला भाजपा को 200 पार नहीं ले जा पाएगा। और वह 100 सीटें बड़े इतमीनान से जीतकर एनडीए को सरकार बनाने से रोक लेगी और दूसरों के दम पर सरकार बना ले जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे साल 2004 में 144 सीटें ले जाकर बनाई थी।
इस बात को आंकड़ों की शक्ल में समझने से पहले दो दिग्गज नेताओं के बयानो पर गौर करना जरूरी है जो साफ साफ त्रिशंकु लोकसभा की बात कह चुके हैं। एनसीपी मुखिया शरद पवार ने स्पष्ट कहा कि अगर एनडीए बहुमत में नहीं आता है तो अगला प्रधानमंत्री ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू या फिर मायावती में से कोई एक होगा। उनका मानना है कि इन तीनों के पास खासा प्रशासनिक अनुभव है और ये तीनों भी नरेंद्र मोदी की तरह मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बात बड़ी दिलचस्प और अहम इस लिहाज से है कि शरद पवार ने राहुल गांधी का नाम इस सबसे बड़े पद के लिए नहीं लिया और न ही बतौर प्रधानमंत्री खुद को प्रस्तुत किया। सांख्यिकीय लिहाज से देखें तो वे मान रहे हैं कि उनकी पार्टी एनसीपी 10-12 से ज्यादा सीटें नहीं ले जाने वाली और कांग्रेस 140 के लगभग सिमट रही है। उलट इसके ममता बनर्जी की टीएमसी 30 के और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी भी 18 के लगभग सीटें ले जा सकती है और बसपा भी 15 से 20 सीटें ले जा सकती है। 15 से भी ज्यादा सीटें ले जाने का दम भर रही बीजू जनता दल के मुखिया नवीन पटनायक को शरद पवार प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं मानते हैं तो मुमकिन है इसके पीछे उनकी कोई कुंठा या पूर्वाग्रह हो।
कमलनाथ का दावा
दूसरा अहम बयान बड़े हैरतअंगेज तरीके से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का यह आया कि कांग्रेस 2014 के मुकाबले तीन गुना यानि 132 सीटें जीत रही है। बकौल कमलनाथ नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए इतनी सीटें काफी होंगी। इस बयान पर खुद कांग्रेसी सन्न रह गए थे क्योंकि बात एक ऐसे जिम्मेदार नेता ने कही थी जिसके तजुर्बे और गांधी परिवार के प्रति भक्ति पर किसी को रत्ती भर भी शक नहीं है और आमतौर पर चुनाव के वक्त में नेता बढ़ चढ़ कर बातें और दावे करते हैं। मसलन मध्यप्रदेश के ही पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश की सभी 29 और छतीसगढ़ की पूरी 11 सीटें ले जाने की बात कर रहे हैं।