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सत्कर्म की राह दिखाती भागवत गीता

श्रीमद्भागवत गीता सिर्फ ग्रंथ नहीं जिसे सिर्फ सहेज कर रखा जाए, बल्कि इसके अध्ययन से माया मोह का त्याग होता है और व्यक्ति को सत्कर्म की राह आसान हो जाती है। अधर्म पर धर्म की जीत के साथ मनुष्य को परमात्मा पर अटूट विश्वास की सार है भागवत गीता। गीता मानव जीवन के लिए संजीवनी कोष के समान है। गीता में भगवान कृष्ण ने ज्ञान, भक्ति, कर्म और वैराग्य सभी का सार अर्जुन को प्रदान किया। प्रभु की अमृतमय वाणी ही भगवत गीता है, जो मनुष्य के लिए जीवन जीने की संहिता है। भगवत गीता मानव मात्र के कल्याण के लिए है। चाहे वह देश के हो, चाहे विदेश के। सभी को जीवन मुक्ति प्रदान करने के लिए गीता का ज्ञान पथ प्रदर्शित करता है। इसलिए देश और विदेश में भी गीता के दर्शन को विश्व का दर्शन स्वीकार किया गया है। गीता का दर्शन एक वात्सल्यमयी माता की तरह है। जैसे छोटा बच्चा माता-पिता से बिछड़ जाता है, तो माता-पिता और बच्चे दोनों को वेदना होती है। ऐसे ही ईश्वर हमारे माता-पिता हैं। संसार मेला है, यहां जीव रूपी बच्चे बिछड़ गए है, जिसे गीता के ज्ञान से अनुभव करना है। जीव ईश्वर से कभी अलग नहीं। इस बात का ज्ञान जिसे हो गया, उसका जीवन पूरी तरह संवर जाता है।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान
श्रीकृष्ण कहते हैं कि…
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:॥
यानी जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है। श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन से माया मोह का त्याग होता है और व्यक्ति को सत्कर्म की राह आसान हो जाती है। अधर्म पर धर्म की जीत के साथ मनुष्य को परमात्मा पर अटूट विश्वास का सार भागवत गीता है।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान ने कहा है जैसा बोयेंगे वैसा पायेंगे। जो हम बोते हैं, वही हमें कई गुना होकर वापिस मिलता है। प्रकृति की इस व्यवस्था से सुख बांटने पर वह हमें कई गुना होकर वापिस मिलता है और दूसरों को दु:ख देने पर वह भी कई गुना होकर हमारे पास आता है। जैसे बिना मांगे दु:ख मिलता है, वैसे ही बिना प्रयत्न के सुख मिलता है। जब सुख-दु:ख हमारे ही कर्मों का फल है तो सुख आने पर हम क्यों फूल जाएं और दु:ख पडऩे पर मुरझाएं क्यों? क्योंकि सुख-दु:ख सदा रहने वाले नहीं और क्षण-क्षण में बदलने वाले हैं। सुख-दु:ख जब अपनी ही करनी का फल हैं तो एक के साथ राग और दूसरे के साथ द्वेष किसलिए? गीता में भगवान कहते हैं—
इहैव तैर्जित सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
यानी जिन लोगों के मन में सुख-दु:ख के भोग में समता आ गई है उन्होंने तो इसी जन्म में और इसी शरीर से ही संसार को जीत लिया और वे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गए। भाग्य का विधान अटल है। जितने भी ज्योतिषीय उपाय हैं, वे सब तात्कालिक हैं। मनुष्य यदि अपने को एक खूंटे (इष्टदेव) से बांध ले और ध्यान-जप, सत्कर्म और ईश्वर भक्ति को अपना ले तो जीवन में सब कुछ शुभ ही होगा। कर्म रूपी पुरुषार्थ से ही मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। मनुष्य स्वयं भाग्यविधाता है काल तो केवल कर्मफल को प्रस्तुत कर देता है। यदि मनुष्य जन्म-मरण के जंजाल से छूटना चाहता है तो भगवान ने उसका भी रास्ता गीता में बताया है—
‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्
कुरते तथा।Ó
ज्ञानरूपी अग्नि संचित कर्म के बड़े-से-बड़े भण्डार को क्षणभर में जला डालती है। ज्ञान की चिंगारी जब पाप के ईंधन पर गिरती है तो पाप जलते हैं। ज्ञान को अपनाने पर कर्म सुधरेंगे। तत्वज्ञान होने से कर्म वास्तव में कर्म नहीं रह जाते तब उनका फल तो कैसे ही हो सकता है? अत: समस्त कर्मों के साथ उनका कर्मफल भी मिट जाता है और जीव को पुन: शरीर धारण नहीं करना पड़ता।
यह ज्ञान क्या है? यह है हम भगवान के हैं, वे हमारे हैं, फिर उनसे हमारा भेद क्या? हम दासत्व स्वीकार कर लें और जो कुछ करें उनके लिए करें (सब कर्म कृष्णार्पण कर दें) या फल की भावना का त्याग कर दें नहीं तो कर्म रूपी भयंकर सर्प काटता ही रहेगा। करने में सावधान रहें और जो हो जाए उसमें प्रसन्न रहे एवं भगवन्नाम जपते रहें, आप एक सच्चे कर्मयोगी बन जाएंगे।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते में युक्ततमा मता:॥
अर्थात हे अर्जुन! जो मनुष्य मुझमें अपने मन को स्थिर करके निरंतर मेरे सगुण-साकार रूप की पूजा में लगे रहते हैं, और अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरे दिव्यस्वरूप की आराधना करते हैं वह मेरे द्वारा योगियों में अधिक पूर्ण सिद्ध योगी माने जाते हैं।
-ओम