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चल दरिया में डूब जाएं

इस बार उल्टा बैताल ने विक्रम से पूछ लिया, बता राजन, ये गुड… बेटर… और बेस्ट क्या होता है? यदि तूने सहीं ढंग से नहीं समझाया तो, तेरा धड़ शरीर से अलग कर दूंगा। उत्तर में विक्रम ने इस तरह सुनाना प्रारंभ किया।
पहला रूप – गुड
जब दो जवां दिल एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं, तो धीरे-धीरे उनका प्यार परवान चढऩे लगता है। और सारी दुनिया उन्हें अपना दुश्मन नजर आने लगती है। अक्सर वे अपने प्यार की बराबरी हीर-रांझा, लैला-मजनू, सोहनी-महिवाल, ससी-पुन्नी, रोमियो-जूलियट आदि-आदि से करते हैं। इतनी डींगे-पींगे भरते हैं कि, इन्हें इनकी अमर प्रेम कथाएं हल्की लगने लगती है और इन प्रेमकथाओं का दारुण अंत इन्हें धीरे-धीरे विचलित करने लगता है। धीरे-धीरे इनका विश्वास पक्का होता जाता है कि, सचमुच दुनिया प्यार की दुश्मन ही होती है। इनको न जीने देगी, न मरने देगी? और अंतत: किसी दिन चोरी छिपे अमराइयों की छांव में निश्चय करते हैं कि, दुनिया बेशक जीने नहीं देगी? लेकिन उनकी मौत पर उनका वश नहीं होगा। उनके सपनों का घोंसला बन भी नहीं पाता है कि, उन्हें उजडऩे का डर सताने लगता है। वे एक-दूसरे का कसकर हाथ पकड़ते हैं, कसकर आलिंगन करते हैं और अंतिम सांसों की धड़कनों को महसूस करते हैं। और कई बार यह सोचकर चुंबन लेते है कि, क्या पता यह शायद अंतिम चुंबन हो?
अभी तक दुनिया को कुछ पता नहीं है। दुनिया उनके इस पाक-नापाक प्यार से बेपरवाह है। अभी सब कुछ चोरी-चोरी और चुपके-चुपके चल रहा है। पता नहीं किन रातों में, किस पहर में, तारों भरे आसमान में मिलन होता है। शाख पर उल्लुओं की सरगर्मी। कभी रात की नीरवता में हवा के हल्के झोंके से कहीं पत्ता खड़कता है और इधर इनका दिल धड़कता है। कत्ल के रात जैसी सिहरन और दुनिया के जुल्म जैसी घुटन।
इस उलझन की गांठों को सुलझाते-सुलझाते वे किसी क्षण निश्चय करते हैं और उनके कदम दरिया की ओर चल पड़ते हैं। दुनिया को धता बताते हुए…। चल दरिया में डूब जाए। पोखर, तालाब या कुएं आदि में डूबकर मरेंगे तो उनका प्रेम जाहिर हो जाएगा।
दूसरा रूप – बेटर
आखिरकार अटल इरादे उन्हें दरिया तक ले ही आते हैं। दरिया के मुहाने पर खड़े होकर कुछ पल ठिठकर पीछे पलट कर देखते हैं। फिर सैकड़ों फुट खाई में गिरते दरिया की ओर, फिर नीचे की ओर। अचानक पांवों के नीचे से एक पत्थर लुढ़कता है और चट्टानों से टकराता हुआ नीचे गइराई में गुम हो जाता है। एकाएक आसन्न मौत की आहट होती है। अब दीप्त चेहरों पर घबराहट है। फिर एक-दूसरे की आंखों में देखते हैं। वह दृड़ निश्चय जिसने यहां तक आने के लिए मजबूर किया था, पत्थर की शक्ल में सैकड़ों फुट गइराई में समाकर तिरोहित हो चुका है। अचानक मौत को साक्षात सामने देख एकाएक दूसरा निश्चय जन्म लेता है।
हम क्यों डूबे? क्यों डूब कर मरे? हमने क्या पाप किया है? हमने क्या गुनाह किया है? हमने तो सिर्फ प्यार किया है। कोई चोरी नहीं की है? कोई डाका नहीं डाला है? बहुत दे चुके अपने प्यार की कुर्बानी? अब ऐसा नहीं होगा? अब हम डरेंगे नहीं? दुनिया का डटकर मुकाबला करेंगे। चाहे कितना ही कठिन इम्तिहान क्यों न देना पड़े? पीछे नहीं हटेंगे? चाहे जो भी अंजाम हो?
वे नए इरादों के साथ, फौलादी इरादों के साथ लौट पड़ते हैं। अब वे खुल्लम-खुल्ला प्यार करते हैं। अपने प्यार का खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन करते हैं। उनका प्यार हरदम उद्दाम वेग पर रहता है।
अब सगे-संबंधियों को… नाते-रिश्तेदारों को पता चलता है। अब दुनिया उनको चिढ़ाती है कि, कुछ तो कुल की, खानदान की इज्जत-आबरू का ख्याल करो। कुछ तो खानदान की मान-मर्यादा का ख्याल करो। लाज-शर्म को तो न बेच खाओ। क्यों खानदान की इज्जत पर बट्टा लगाने पर तुले हो? थोड़ी-सी भी शर्म-हया बाकी रह गई हो तो, मान-मर्यादा का थोड़ा-सा भी ख्याल बाकी रह गया हो तो, डूब मरो, चुल्लू भर पानी में।
तीसरा रूप – बेस्ट
दुनिया अब सोचती है, उनके पास दरिया में डूबने का विकल्प था। लेकिन जो दरिया में डूबकर न मरे हो, वो चुल्लू भर पानी में क्या खाक डूब कर मरेंगे? अब दुनिया अपनी पोटली में छुपा कर रखे अपने कीमती हीरे रूपी ब्रम्हास्त्र को बाहर निकालती है। मसलन सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। दुनिया सोचती है, अपनी ही मौत मरे न, क्यों अपने हाथ गंदे करे? अब उनकी कूटनीति काम करती है। यह जग जाहिर कूटनीति है फूट की। फूट डालो और तोड़ दो। अब न दरिया की दरकार रही, न चुल्लू भर पानी की।
जब विक्रम इतना सुनाकर चुप हुआ तो, बैताल ने पूछा, …। लेकिन इसमें गुड…बेटर…। और बेस्ट क्या है?
अब इसमें गुड यह है कि, उन आत्माओं को अपने प्यार की गहराई के सामने दरिया की गहराई कम लगी और वे आत्महत्या के दोष से बच गए। बेटर यह हुआ कि दुनिया के सर उनकी हत्या का ठीकरा न फूटा, दुनियां इस दोष से बच गई। और बेस्ट यह हुआ कि, अपने-अपने दांपत्य सुख भोगने के साथ-साथ अपने प्रेम के आनंद में डूबने के लिए उन आत्माओं के पास अवसर ही अवसर थे।
ठहाके लगाता हुआ बैताल उड़ गया, और पेड़ पर लटक गया।
-अरविंद कुमार खेड़े