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मनरेगा से मोहभंग

मजदूरों और गरीबों का पलायन रोकने के लिए शुरू की गई मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों में बीते तीन सालों के अंदर 27 लाख की कमी आ गई है। यह वे लोग हैं जिनका जॉबकार्ड बना हुआ है। तीन साल पहले तक प्रदेश में एक करोड़ 17 लाख जॉब कार्डधारी थे, जिसको लेकर फर्जीवाडे के खूब आरोप लगे। इसके बाद कराए गए सत्यापन में इनकी संख्या 97 लाख रह गई थी। अब इनकी संख्या घटकर 69.66 लाख है और इनमें से 52 लाख जॉबकार्डधारियों को मनरेगा से मजदूरी मिल सकी है, जबकि प्रशासनिक व्यय में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है। मजदूरों की संख्या घटने के बावजूद केंद्र सरकार से मनरेगा के बजट में बढ़ोतरी हुई है। वैसे केन्द्र से प्रदेश को इस योजना के तहत मिलने वाली राशि में से बीते साल का बकाया तीन सौ करोड़ है। इस मामले में सीएम सहित पंचायत मंत्री ने भी केंद्र को कई पत्र लिखे, मगर कोई फायदा नहीं हुआ।
दरअसल केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद से मप्र में मनरेगा के कार्यों की गति धीमी पड़ती जा रही है। यदि हम आंकड़ों पर नजर डाले तो स्थिति कुछ इस तरह बनती जा रही है। जैसे वर्ष 2015-16 में 4 लाख 27 हजार कार्य स्वीकृत हुए, लेकिन पूर्ण 2 लाख 24 हजार ही कराए जा सके। वर्ष 2016- 17 में 7 लाख 72 हजार काम मंजूर किए गए, मगर पूर्ण कराए गए 3 लाख 8 हजार। वर्ष 2017- 18 में 12 लाख 34 हजार काम स्वीकृत हुए और पूर्ण कराए गए 4 लाख 73 हजार। इसी तरह वर्ष 2018-19 में 7 लाख 16 हजार कार्य स्वीकृत हुए, लेकिन पुराने मिलाते हुए पूर्ण कराए गए 12 लाख 25 हजार। केंद्र से मिले फंड का मटेरियल पर भी खूब खर्चा किया गया है। वर्ष 2015-16 में मटेरियल पर 804 करोड़, वर्ष 2016-17 में 1137 करोड़ 98 लाख, वर्ष 2017-18 में 1312 करोड़, वर्ष 2018-19 में 1733 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है।
मनरेगा से मजदूरों का मोहभंग होने के पीछे एक कारण है कम मजदूरी। सरकार हर साल मनरेगा कि मजदूरी में बढ़ोतरी करती है जो एक से लेकर 10 रुपए तक होती है। इस बार भी मजदूरी में वृद्धि की गई है जो संतोषजनक नहीं है। इस बार मनरेगा के तहत मप्र के अकुशल श्रमिकों की एक दिन की मजदूरी में दो रुपए का इजाफा किया है। अब 176 रुपए मजदूरी मिलेगी। एक अप्रैल, 2018 से मनरेगा में मजदूरी दर 174 रूपए थी। ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार ने आचार संहिता लागू होने के दौरान चुनाव आयोग से मंजूरी लेकर मनरेगा मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि कर दी है।
ग्रामीण संकट और मांग बढऩे के बावजूद मोदी सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए मनरेगा के तहत अब तक सबसे कम मजदूरी बढ़ाई है। साल 2019-20 के लिए मनरेगा के तहत अकुशल श्रमिकों के लिए राज्य-वार मजदूरी को अधिसूचित किया, जो कि औसत वार्षिक बढ़ोतरी मात्र 2.16 फीसदी है। मोदी सरकार द्वारा की गई ये बढ़ोतरी अब तक की सबसे कम है। मनरेगा के तहत काम करने वाले छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मजदूरों की रोजाना मजदूरी में एक रुपये की भी बढोतरी नहीं हुई है वहीं 15 राज्यों के मजदूरों की रोजाना मजदूरी को एक रुपया से लेकर पांच रुपये तक बढ़ाया गया है। पिछले कुछ सालों से मनरेगा मजदूरों की औसत वेतन वृद्धि कम हो रही है। 2018-19 के लिए यह 2.9 प्रतिशत था और दो पूर्ववर्ती वर्षों में यह क्रमश: 2.7 प्रतिशत और 5.7 प्रतिशत की वृद्धि थी। लेकिन सबसे कम बढ़ोतरी तब हुई है, जब ग्रामीण संकट को दर्शाते हुए मनरेगा के तहत 2010-11 के बाद से सबसे अधिक व्यक्ति दिवस के कार्य पंजीकृत किए।
मनरेगा से मजदूरों का मोहभंग होने की एक वजह है समय पर मजदूरी का न मिलना। इस बार पैसों की कमी के कारण मनरेगा योजना में काम करने वाले 95 लाख मजदूरों का मेहनताना अटक गया है। दिसंबर से केंद्र सरकार ने हर माह जारी होने वाली 300 करोड़ रुपए की राशि रोक दी है। मप्र में इस समय 52 लाख एक्टिव परिवार जॉॅब कार्डधारी हैं। साथ ही 95 लाख मजदूर हैं। हर रोज 2 लाख से लेकर 5 लाख लोग काम करते हैं। लेकिन इस बार केंद्र सरकार ने अभी तक इनकी मजदूरी जारी नहीं की है। ऐसे में मजदूर मनरेगा की बजाए अन्य जगह काम कर रहे हैं।
कम हैं मनरेगा मजदूरी
इस बार सरकार ने एक रुपए से लेकर 15 रुपए तक मनरेगा की मजदूरी में वृद्धि की है। अगर मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां अब एक मजदूर को प्रतिदिन 176 रुपए मजदूरी मिलेगी। जबकि मप्र के गावों, कस्बों में भी मजदूरी ढाई सौ रूपये प्रतिदिन से लेकर तीन सौ रूपये तक मिल रही है। पूरा दिन काम करने के बाद शाम को मजदूरी भी नकद मिल जाती है, बहुत से गावों में स्थिति यह है कि लोग मजदूरी के सहारे ही परिवार का पोषण कर रहे है जिस दिन मजदूरी न मिले तो घर में खाने की दिक्कत हो जाती है। इसीलिए गांव के ज्यादातर मजदूर काम की तलाश में गांव से दूर कस्बों तक चले जाते है और मनरेगा में काम करने से कतराते हैं।
– विकास दुबे