Sumitra-Mahajan

यह कैसी विदाई

सुमित्रा महाजन के चुनाव लडऩे से इनकार के साथ ही इंदौर की सियासत का एक बड़ा अध्याय पूरा हो गया। आठ लोकसभा चुनाव से वे इंदौर का चेहरा रही हैं। 38 वर्ष से भी अधिक लंबी पारी में उन्होंने पार्षद से लेकर लोकसभा की सबसे उम्रदराज और सर्वाधिक समय तक सेवा देने वाली महिला सांसद का गौरव हासिल किया। केंद्रीय मंत्री रहीं और देश की दूसरी महिला लोकसभा अध्यक्ष बनने का सौभाग्य उन्हें मिला। पार्टी द्वारा तय उम्र के मापदंड के चलते उन्हें इस बार चुनावी सियासत से किनारा करना पड़ा है। व्यक्तिगत तौर पर भी उनकी यात्रा अनूठी रही है, वे 1965 में इंदौर की बहू बनकर आईं थीं, लेकिन शहर की बड़ी बहन बनकर रही हैं। ससुराल को मायका बनाने वाली वे राजनीति में अकेली शख्स कहीं जा सकती हैं।
उम्र की पाबंदियों के कारण संस्थापक सदस्यों के टिकट काटने के बाद तो यह लगभग साफ हो चुका था कि ताई की राह इस बार आसान नहीं है। बावजूद इसके ताई मैदान में डटी हुई थीं। हालांकि जब सूचियां दर सूचियां ताई का नाम नहीं आया तो इंदौर की हवाओं में भी एक चिढ़ महसूस होने लगी। सियासी गलियारों से लेकर शहर के आम गली-मोहल्लों तक सवाल उठने लगे कि जिस इंदौर के टिकट पर इतने सालों में कभी बात करने की नौबत भी नहीं आई, वहां इतना हीला-हवाला क्यों।
जितनी देर हो रही थी, उतनी ही छटपटाहट बढ़ती जा रही थी। शुरुआती दौर में खबरें आई कि इंदौर से हर बार की तरह फिर पैनल में एक ही नाम है, लेकिन बाद में मामला उलझता गया। बात यहां तक पहुंची कि एक बैठक में ताई ने यह तक कह दिया कि इंदौर से या तो मैं चुनाव लडूंगी या फिर नरेंद्र मोदी लड़ेंगे। हालांकि बाद में सफाई भी दे डाली कि मैंने तो मजाक किया था। इसके पहले एक बैठक में ताई कह ही चुकी थी कि मुझे इंदौर की चाबी पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी ने सौंपी थी, इसेे मैं ऐसे ही किसी को नहीं दे दूंगी। इसी चाबी को लेकर कई दिनों तक इंदौर का सियासी पारा गर्म रहा। पूर्व विधायक सत्यनारायण सत्तन वैसे भी पहले से मोर्चा खोले बैठे थे। साफ कह चुके थे कि इस बार भी अगर महाजन को टिकट दिया गया तो वे निर्दलीय लड़ेंगे। ताई ने घर जाकर उन्हें मनाने की कोशिश भी की, लेकिन उनके तेवर नहीं बदले।
इन सबके बीच भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय (भाई) का पूरा गुट भी अपने स्तर पर लगा हुआ था, जो वर्षों से राजनीतिक रूप से उनका प्रतिद्वंद्वी बना रहा है। लोकसभा प्रभारी भी विधायक रमेश मेंदोला बनाए गए थे, जो विजयवर्गीय के करीबी हैं। इस बार घेराबंदी तगड़ी थी, जिसके चलते ताई को इंदौर की चाबी छोडऩा ही पड़ी। उन्होंने यह चि_ी चिढ़कर खुद लिखी है या उनसे लिखवाई गई है, यह समय आने पर पता लगेगा, फिलहाल इसने इंदौर की राजनीति में एक दाग तो लगा ही दिया है। इस चि_ी के बाद सब यही कह रहे हैं कि चुनावी राजनीति से भी ताई इससे कहीं अच्छी विदाई की हकदार थीं।
पार्टी को निर्णय लेने
में हो आसानी
चुनाव न लडऩे की घोषणा के बाद मीडिया से चर्चा में ताई ने कहा कि पार्टी को निर्णय लेने में आसानी हो इसलिए मैंने इंकार कर दिया। पार्टी को टिकट की घोषणा करने में देरी हो रही थी और मुझे लगा कि यह अच्छा नहीं है। जितनी देर होगी उतना कम समय प्रचार के लिए मिलेगा। इसलिए मैंने खुद ही मना कर दिया। अब पार्टी स्वतंत्र है वो जिसे चाहे उम्मीदवार बनाए। अगर पार्टी अब भी टिकिट देगी तो उस वक्त सोचूंगी। शहर की चाबी अब किसे सौंपेंगी इस सवाल पर महाजन ने कहा कि जो भी भाजपा का प्रत्याशी होगा उसे चाबी मिलेगी, अब प्रत्याशी कौन होगा इसका निर्णय चुनाव समिति को लेना है।
– अजय धीर