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महिलाओं की भागीदारी

संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी पर्याप्त संख्या में नहीं है। शुरुआत से ही संसद में महिला व पुरुष सदस्यों का अनुपात असमान रहा है। चिंता की बात यह है कि महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या के बावजूद राज्य विधानसभाओं में उनकी उपस्थिति बमुश्किल सात से आठ फीसदी है तो संसद में उनकी मौजूदगी महज बारह फीसदी है। जबकि भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का करीब अड़तालीस फीसदी हैं। लेकिन विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार रोजगार में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ छब्बीस फीसदी है। गौर करने वाली बात यह है कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में महिला साक्षरता की दर पैंसठ फीसदी है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि देश में साक्षर महिलाओं में से आधी महिलाएं देश की जीडीपी में अपनी भूमिका तय नहीं कर पा रही हैं। अगर संसद में उनकी भागीदारी की बात की जाए तो वर्तमान में यह महज बारह फीसदी के आसपास है। पांच सौ तियालीस सीटों वाली लोकसभा में इस समय बासठ महिला सांसद हैं। इससे पहले 2009 में अ_ावन महिलाएं थीं। थोड़ा-सा ग्राफ जरूर बढ़ा, मगर तैंतीस फीसदी आरक्षण के हवाले से तो यह नगण्य ही कहा जाएगा। इन आंकड़ों को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि देश में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर हमारा राजनीतिक नेतृत्व क्या सोचता है।
भारत के लिए लोकतंत्र के लिए यह दुखद ही है कि पिछले बासठ सालों में भारत की लोकसभा में चुनी हुई महिलाओं की मौजूदगी दोगुनी भी नहीं हुई है। बड़े और प्रमुख राजनीतिक दल महिलाओं को बराबरी का दर्जा और लोकसभा व विधानसभाओं में तैंतीस फीसदी आरक्षण देने की चाहे जितनी वकालत करें, उनकी कथनी और करनी में फर्क बरकरार है। महिलाओं के सशक्तिकरण और बराबरी की बात करने वाले दलों की असलियत टिकट वितरण के समय सामने आ जाती है। पितृ-सत्तात्मक संरचना वाले समाज में घर हो या दफ्तर, सड़क हो या संसद, स्त्रियों के विकास का ढोल तो खूब पीटा जाता है, पर उनके हितों को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना नहीं दिखती। यह ठीक है कि चुनावों के पहले तो सभी दल महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात करते रहे हैं, लेकिन अभी तक संसद में महिला आरक्षण संबंधी बिल नहीं पारित हुआ है। आजादी हासिल करने के साथ ही भारत में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिल गया था, जबकि पश्चिमी देशों की महिलाओं को मतदान का अधिकार हासिल करने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। मतदान के लिहाज से आजादी के बाद के दशकों में बतौर मतदाता महिलाएं कम ही सामने आईं। लेकिन अब चुनाव दर चुनाव महिला मतदाताओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और किसी भी सरकार को चुनने में अब वे निर्णायक भूमिका में हैं। लेकिन संसद में तैंतीस फीसदी आरक्षण के अधिकार से आज भी वंचित हैं। जबकि आधी आबादी तो पचास फीसदी आरक्षण चाहती है। एक मतदाता के रूप में शुरू हुआ भारतीय महिला का राजनीतिक सफर गांव-पंचायत, विधानसभा और फिर संसद तक के पड़ावों तक पहुंचते-पहुंचते पस्त होने लगता है।
सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव के लिए ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की कुल बयालीस लोकसभा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस की तरफ से चालीस फीसदी यानी सत्रह महिला उम्मीदवारों को उतारा है। पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य ओडि़शा में बीजू जनता दल (बीजद) के सुप्रीमो नवीन पटनायक ने अपनी पार्टी से इक्कीस उम्मीदवारों में से सात महिलाएं यानी तैंतीस फीसदी महिलाओं को टिकट देने का फैसला किया। साफ है, दोनों राज्य सरकारों का यह फैसला महिलाओं को सशक्त बनाने के उनके इरादे के अनुरूप है। लेकिन अन्य दल इस कवायद में पीछे क्यों रहे, यह तो मतदाताओं को पूछना ही चाहिए। मालूम हो, बीते साल ओडि़शा विधानसभा ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए तैंतीस फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव पारित किया था। यह कदम प्रशंसनीय है क्योंकि लंबे समय से चले आ रहे इस प्रस्ताव को अधिकांश दलों ने महज दिखावे और शोर शराबे तक सीमित रखा है। दिलचस्प बात यह है कि शक्तिशाली महिला नेताओं के नेतृत्व में भी महिलाओं को विधायिका में समुचित हिस्सेदारी का कदम महज वादों और बातों तक सीमित रह गया है।
-ज्योत्सना अनूप यादव