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साथ मिलकर भी जुदा

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना दोनों मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं। साथ ही भाजपा व शिवसेना ने दावा किया था कि उनके गठबंधन का आधार हिंदुत्व की साझी विचारधारा में है। इसी दावे के साथ कोल्हापुर में रैली से संयुक्त प्रचार अभियान की शुरुआत की गई। लेकिन दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बीच पिछली कड़वाहटों को भुलाकर लोगों के सामने साझी सूरत पेश करने की असहजता साफ दिखी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रत्यक्ष तौर पर मतदाताओं को यह समझाने के लिए एक मंच पर साथ आए थे कि साढ़े चार साल तक एक-दूसरे की जमकर आलोचना करने के बाद वे फिर से क्यों इक_े हुए हैं। जब वे फडनवीस के साथ मंच पर आए तो ठाकरे ने कार्यक्रम का उद्घाटन करने के लिए नारियल फोडऩे में काफी वक्त लिया। हमेशा होशियार रहने वाले ठाकरे को काफी सोच-विचार कर फैसले लेने के लिए जाना जाता रहा है। उन्होंने राम मंदिर व राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर एकजुटता दिखाने की भरसक कोशिश की। लेकिन अपने 20 मिनट के भाषण में इन दोनों विषयों को एक मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं दिया।
ठाकरे ने दावा किया कि नवंबर 2018 में उनके अयोध्या की यात्रा पर जाने से ही राम मंदिर आंदोलन को गति मिली। उन्होंने कहा, इस मसले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। मैंने इसे फिर से गति दी। राम मंदिर दरअसल रामराज्य (सुशासन) का प्रतीक है। यह संकेत देते हुए कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नेता मान लिया है, ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से पहली बार उन्हें नरेंद्र भाई कहकर संबोधित किया, सामान्य तौर पर वे केवल मोदी कहते रहे हैं। उन्होंने कहा, हमारा पीएम पद का दावेदार तय है, उन्हें (विपक्ष को) भी अपना नेता घोषित कर देना चाहिए। यह भी उनके पहले के रुख के उलट था जब उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार का फैसला सभी सहयोगी दलों के साथ सलाह-मशविरे के बाद होना चाहिए।
इससे पहले ठाकरे राज्य में किसानों की आत्महत्या की बढ़ती संख्या पर फडनवीस को निशाने पर लेते रहे हैं। लेकिन रैली में उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने सभी वादों को पूरा किया है, खासतौर पर किसानों के लिए योजनाओं को लागू करके; हालांकि उन्होंने किसी भी योजना का नाम नहीं लिया।
ठाकरे ने किसी स्कीम का कोई भी ब्योरा दिए बगैर कहा, हम गौरवशाली हिंदू हैं; धर्म की हमारी परिभाषा मानवीय रुख अपनाने में है। हम गरीबों के लाभ के लिए सामाजिक योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे। शिवसेना प्रमुख ने पाकिस्तान में बालाकोट में भारतीय वायु सेना के हमलों का कोई जिक्र नहीं किया। यह हैरानी की बात थी क्योंकि भाजपा जोर देती रही है कि इन चुनावों में राष्ट्रीय सुरक्षा बड़ा मुद्दा रहेगा। ठाकरे ने इस बात को भी स्वीकार किया कि भाजपा के साथ गठबंधन से शिवसेना को लाभ होगा। उन्होंने कहा, अतीत में जब हमारे (भाजपा व शिवसेना के) बीच दोस्ताना संबंध नहीं थे तो कांग्रेस व एनसीपी ने सरकार के खिलाफ विरोध मार्च आयोजित किया था। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि शिवसेना भारतीय जनता पार्टी की पीठ में छुरा नहीं घोंपेगी।
बदले में फडनवीस ने ठाकरे को इस गठबंधन का दिशा-निर्देशक बताया और उनकी सरकार को अतीत में शिवसेना प्रमुख की ओर से की गई आलोचनाओं का कोई जिक्र नहीं किया। फडनवीस ने कहा, यह गठबंधन जाति, भाषा व धर्म से परे है। यह राष्ट्रवादी पार्टियों का गठबंधन है। हम देशभक्ति के आधार पर साथ आए हैं। मुख्यमंत्री ने 25 मिनट के भाषण में शिवसेना का और कोई जिक्र नहीं किया। उन्होंने विभिन्न योजनाओं का हवाला देते हुए यह दावा किया कि उनकी सरकार गरीबों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लेकर आई है। हालांकि सभा में मौजूद लोग उनकी बातों से ज्यादा प्रभावित नजर नहीं आए। सभा में आए अजित सुतार नामक शख्स का कहना था, मैं यहां इस बात की उम्मीद लेकर आया था कि धैर्यशील माने (हटकनंगले से शिवसेना उम्मीदवार) अपनी चुनावी घोषणाओं को सामने रखेंगे।
गठबंधन के बावजूद मुख्यमंत्री पद को लेकर ठनी
आगामी चुनावों के लिए भाजपा और शिवसेना के बीच सीट बंटवारे के समझौते पर मुहर लगने के बाद अब महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद पर दावे को लेकर दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं के सुर अलग-अलग हैं। दरअसल, राज्य में साल के अंत में विधानसभा चुनाव होना है। उद्धव ठाकरे नीत पार्टी (शिवसेना) चुनावों के बाद मुख्यमंत्री पद की अपनी मांग को लेकर मुखर रही है। महाराष्ट्र में कुल 48 लोकसभा सीटों में भाजपा 25 सीटों पर, जबकि शिवसेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। वहीं, विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां सहयोगी दलों के साथ तालमेल कर बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेगी। वर्ष 2014 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव भाजपा और शिवसेना ने अपने-अपने बूते लड़ा था। कुल 288 सीटों में भाजपा ने 122 सीटें जीती थी जबकि शिवसेना को 63 सीटों पर जीत मिली थी। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस चुनावी फार्मूले को खारिज कर दिया है कि विधानसभा चुनाव में अधिकतम सीटें लाने वाली पार्टी को मुख्यमंत्री का पद मिलेगा। ठाकरे ने दोनों दलों को बराबर संख्या में पद देने की मांग की है। उनका कहना है कि दोनों पार्टियों ने पिछले 25 बरसों में इस फार्मूले का इस्तेमाल किया है। मैंने इसे खारिज कर दिया। मैंने यह मांग की कि दोनों पार्टियों को समान संख्या में पदों की हिस्सेदारी मिले।
-अक्स ब्यूरो