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वापसी की फिक्र

जुमलों का जुलाब पिलाकर 2014 में सत्ता में आए नरेन्द्र मोदी इस बार आजमाए गए तुक्कों पर नई कलई के साथ शासनतंत्र में लौटने की और है। मोदी के रथ के सारथी अमित शाह पार्टी कार्यकर्ताओं, संघ कार्यकर्ताओं और मध्यम दर्जे के नेताओं के सामने एक भयानक भविष्य का खाका उकेर रहे हैं कि, यदि भाजपा को आम चुनावों में हटा दिया जाता है और मोदी की सत्ता में वापसी नहीं होगी तो उन्हें
अगली सरकार का जबरदस्त सितम झेलना पड़ सकता है।
हालांकि अभी 2019 के लोकसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान नहीं हुआ है लेकिन भाजपा को मात देने के लिए विपक्षी पार्टियां लगातार एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं। भाजपा के खिलाफ छोटे मुद्दे को लेकर भी ये विपक्षी पार्टियां एकजुटता प्रदर्शित करती आ रही हैं। कभी एक-दूसरे के दुश्मन रही पार्टियां भी भाजपा को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए एक हो रही हैं। और इस बार ये भी चरितार्थ होते दिख रहा है कि राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है न दुश्मन।
इस बीच हम 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणामों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पिछले चुनाव में भाजपा का 117 लोकसभा सीटों पर जीत का अंतर 2 लाख मतों से भी ज्यादा था। इसमें 5 लोकसभा सीटें वो थीं जहां जीत का अंतर 5 लाख वोटों से भी ज्यादा था। 8 सीटें ऐसी थी जहां जीत का अंतर 4 लाख वोटों से भी ज्यादा था। ठीक इसी तरह 29 लोकसभा की सीटों पर जीत का अंतर 3 लाख से ज्यादा तथा 75 सीटों पर जीत का अंतर 2 लाख वोटों से ज्यादा था। यानी 117 सीटें ऐसी जहां भाजपा के जीत का अंतर 2 लाख वोटों से भी ज्यादा। ये आंकड़े जीत के अंतर के हैं न कि कुल प्राप्त मतों के। इस तरह से किसी भी पार्टी के लिए इस जीत के अंतर को पाटना इतना आसान नहीं होगा। ये सीटें सूरत, वडोदरा, नवसारी, जयपुर और गाजियाबाद हैं। इन लोकसभा सीटों पर भाजपा विजेता तथा उप-विजेता कांग्रेस रही थी। और पांच में से तीन सीटें गुजरात राज्य में थीं। इसमें एक सीट वडोदरा भी शामिल है जहां से नरेंद्र मोदी चुने गए थे। नरेंद्र मोदी यहां के अलावा वाराणसी से भी विजयी हुए थे। बाद में उन्होंने वडोदरा की सीट खाली कर दी थी।
अब बात उन 8 लोकसभा सीटों की जहां भाजपा 2014 के चुनाव में 4 लाख वोटों से भी ज्यादा के अंतर से जीती थी। ये सीटें हैंं फरीदाबाद, विदिशा, इंदौर, जोधपुर, मुंबई -उत्तर, गांधीनगर, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर शामिल हैं। इन आठों लोकसभा सीटों पर भाजपा विजयी रही थी, तो कांग्रेस 6 सीटों पर दूसरे स्थान पर तथा बसपा 2 सीटों पर उप विजेता थी। इसमें गांधीनगर सीट शामिल है जहां से भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी विजेता घोषित हुए थे। वहीं विदिशा से सुषमा स्वराज तथा इंदौर से सुमित्रा महाजन को जीत मिली थी। 29 लोकसभा की सीटों पर 3 लाख वोटों से ज्यादा के अंतर से जीत हासिल की थी। ठीक इसी प्रकार भाजपा ने 2014 के चुनावों में 29 लोकसभा सीटों पर 3 लाख वोटों से ज्यादा के अंतर से जीत हासिल की थी। इन 29 लोकसभा सीटों में से सबसे ज्यादा 8 सीटें उत्तर प्रदेश से भाजपा को मिली थीं। उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट भी इसमें शामिल है जहां से नरेंद्र मोदी को विजय हासिल हुई थी। राजस्थान से 7 सीटें तथा मध्य प्रदेश से 3 तथा गुजरात से 2 सीटें मिली थी।
75 सीटों पर 2 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। वहीं भाजपा 75 सीटों पर 2 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। यहां पर 15 सीटें भाजपा ने उत्तर प्रदेश से जीती थी। यहां की कुल 80 सीटों में से भाजपा और इसकी सहयोगी पार्टियों ने मिलकर 73 सीटें जीत ली थीं। इसी प्रकार गुजरात से 10, राजस्थान से 9 और मध्य प्रदेश से 8 सीटें भी भाजपा ने अपनी झोली में लेने में कामयाबी हासिल की थी। इन 117 लोकसभा सीटों पर जहां भाजपा की जीत का अंतर दो लाख वोटों से ज्यादा का रहा उनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान का योगदान सबसे ज्यादा रहा है। ये वो राज्यें हैं जहां भाजपा जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 160 लोकसभा सीटों में से 149 सीटें जीती थी। हालांकि लोकसभा के चुनावों में दो लाख के अंतर से जीतना भी आसान नहीं होता लेकिन बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में कुछ भी कह पाना मुश्किल होता है। लेकिन इतना तो साफ है कि इन 117 सीटों पर भाजपा को मात देना विपक्षी पार्टियों के लिए आसान भी नहीं होगा।
अल्पसंख्यकों को भविष्यहीनता की खंदक में धकेल चुकी भाजपा के सिपहसालार अमित शाह मुस्लिमों को रिझाने की जुगत में है। शाह की रणनीति का मुख्य हिस्सा है असदउद्दीन ओवेसी के आल इंडिया इत्तहादुल मुस्लिममीन को अपने पाले में खींचना ताकि नाराज दलित नेताओं से गठजोड़ किया जा सके। एक वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुसार पार्टी को ‘मुस्लिम और दलितÓ मतों की तत्काल दरकार है। क्योंकि अगर ये एकजुट नहीं हुए तो पार्टी पराजय की खाई में गिर सकती है। गुजरात और मध्यप्रदेश के अलावा अन्य भाजपा शासित राज्यों में मोदी सरकार अपने कार्यकाल में विज्ञापित की गई उज्जवला योजना समेत सभी सात कल्याणकारी योजनाओं को बड़े पैमाने पर प्रचारित करेगी?
गुजरात में लोकसभा की 26 सीटें हैं और 2014 के चुनावों में भाजपा सभी सीटों पर काबिज हुई थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में 63.6 प्रतिशत मतदान हुआ था और भाजपा का वोट शेयर 60.1 फीसदी तथा कांग्रेस का वोट शेयर 33.5 प्रतिशत रहा था। विश्लेषकों का कहना है कि, गुजरात में भाजपा के ही लोग दो खानों में बंटे हुए हैं, एक वो जो भय की राजनीति के खिलाफ है। दूसरे जो पार्टी और सरकार के ठेकेदार बने हुए हैं। वरिष्ठ पत्रकार दौलत सिंह चौहान कहते हैं कि, ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी बनने के बाद के हालात जनता की परेशानियों को बढ़ा रहे हैं। विधानसभा चुनावों में बाल-बाल बची भाजपा क्या आगामी लोकसभा चुनावों में राज्य की सभी 26 सीटों पर फिर जीतने का कारनामा कर दिखाएंगी? इस बात पर तो भाजपा के पार्टीजनों को ही भरोसा नहीं है। पार्टी द्वारा हाल ही में किया गया अंदरूनी सर्वे को मानें तो इस बार भाजपा की 14 सीटें खतरे में है। भले ही हजार अंदेशों से भाजपा घबराई हुई लेकिन सतर्क होने का दिखावा भी कर रही है। कार्यकताओं को कह दिया गया है कि, यह चुनाव करो या मरो का है। चौहान कहते हैं कि, शाह ने इस बार की जंग को पानीपत की लड़ाई की संज्ञा दी है।ÓÓ
विश्लेषक भी मानते हैं कि, गुजरात की जंग भाजपा के लिए नाक की लड़ाई बनी हुई है। पार्टी नेतृत्व के तेवर इस बात की तो तस्दीक करते हैं कि, करो या मरो के इस घमासान में भाजपा कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी।Ó विश्लेषक कहते हैं कि, भले ही सभी सीटों पर काबिज नहीं हुआ जा सके लेकिन कांग्रेस से डेढ़ गुणा सीटों पर तो कब्जा करना ही करना है। एक सर्वेक्षण का हवाला दें तो, लोकसभा की आठ शहरी सीटों पर तो भाजपा पूरी दबंगई के साथ मजबूत है। लेकिन बची 18 सीटों में से सौराष्ट्र की कुल 8 में से 6 सीटों राजकोट, सुरेन्द्र नगर, पोरबंदर, जूनागढ़, जामनगर और अमरेली में भाजपा को जीत मुश्किल ही नजर आती है। वरिष्ठ पत्रकार चौहान कहते हैं कि, उत्तरी गुजरात की पांच में से तीन सीटों मेहसाणा,पाटण और साबरकांठा में भी भाजपा की राह आसान नहीं लगती। जबकि मध्य गुजरात में 9 में से पांच आणंद, भरूच, छोटा उदयपुर,पंचमहल और दाहोद सीटों की भी कमोबेश यही स्थिति है। अलबत्ता दक्षिण गुजरात जरूर भाजपा का अभेद्य गढ़ बना हुआ है, जहां सूरत, नवसारी और वलसाड़ में भाजपा की सीटें तो पुख्ता हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि, गुजरात में भले ही भाजपा लंगड़ा रही है, लेकिन इस मनमाफिक फिजां का फायदा उठाने की बजाय गुजरात में कांग्रेस के नेताओं को परस्पर कालर खिंचाई से ही फुरसत नहीं है। इस स्थिति में कांग्रेस लोगों की नाराजगी भुनाने में कैसे कामयाब हो पाएगी? गजब है कि जीत दहलीज पर दस्तक दे रही है और कांग्रेस दीवारों से सिर टकराने में मशगूल हैं। अब देखना यह है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा अपनी स्थिति बेहतर कर पाती है या नहीं।
-इन्द्र कुमार