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जलसंकट की आहट

प्रदेश के आधे हिस्से का भू-जलस्तर तेजी से गिर रहा है। राज्य में फिलहाल 21 जिलों की 50,000 से अधिक बसाहटों (ग्राम, मजरे, टोले) में ग्राउंड वाटर लेवल की हालत गंभीर है। ये बसाहटें क्रिटिकल और सेमी क्रिटिकल जोन में शामिल हैं। कई जिलों में भू-जलस्तर 500 फीट तक गिर गया है। आने वाले समय में स्थिति और विकट होने वाली है। लेकिन इसको राष्ट्रीय जल बोर्ड और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी ने चेतावनी जारी की है। इस चेतावनी में आशंका जताई गई है कि मप्र में अप्रैल माह में ही जलसंकट पसर सकता है। जानकारों का कहना है कि प्रदेश में ग्राउंड वाटर लेवल मैनेजमेंट की कोई ठोस पॉलिसी नहीं होने के कारण जल संरक्षण और ग्राउंड वाटर रिचार्ज पर काम नहीं हो रहा है। अभी तो ठंड का मौसम है। अगर यही हालत रहे तो गर्मी के मौसम में जल संकट की गंभीर हालत पैदा हो सकती है। हाल के वर्षों में बारिश की कमी के कारण सिंचाई के लिए ग्राउंड वाटर पर निर्भरता बढ़ गयी है। वहीं, पेयजल का पानी भी ग्राउंड वाटर से ही निकाला जा रहा है। इस कारण हर साल जलसंकट बढ़ता जा रहा है।
राष्ट्रीय जल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, मप्र में कम बारिश, नदियों में अवैध खनन, भू-जल का दोहन और जल संरक्षण की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण भू-जल स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। जहां खरगोन जिले में भू-जलस्तर 500 फीट तक गिरा है, वहीं अधिकांश जिलों में 100 फीट से अधिक भू-जलस्तर गिरा है। लोक स्वास्थ्य यात्रिकी विभाग के सूत्रों का कहना है कि पिछले दो माह के दौरान प्रदेश के 21 जिलों का भू-जलस्तर तेजी से नीचे गिर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी जगह का ग्राउंड वाटर 70 प्रतिशत तक निकालना ही सुरक्षित माना जाता है। वहीं 70 से 90 प्रतिशत तक ग्राउंड वाटर निकालना सेमी क्रिटिकल जोन में आ जाता है, क्योंकि वह पूरी तरह रिचार्ज नहीं हो पाता। वहीं 90 प्रतिशत से अधिक ग्राउंड वाटर निकालना क्रिटिकल जोन में आता है। उस स्थान से जितना पानी निकाला जाता है, उससे बहुत कम पानी जमीन के अंदर जा पाता है। पीएसई के अधिकारियों का कहना है कि ग्राउंड वाटर लेवल मैनेजमेंट पॉलिसी में ग्राउंड वाटर निकालने और उसे रिचार्ज करने की व्यवस्था की जाएगी। इसके तहत रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाएगा। साथ ही पेयजल और सिंचाई के लिए ग्राउंड वाटर निकालने की निगरानी होगी। जानकारी के अनुसार, प्रदेश में सभी 52 जिलों में कुल 1,28,067 ग्राम, मजरे, टोले हैं। इनमें से जिन 21 जिलों की बसाहटों में जल संकट की स्थिति विकराल होने वाली है उनमें श्योपुर, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, टीकमगढ, छतरपुर, पन्ना, सतना, उमरिया, मन्दसौर, रतलाम, शाजापुर, झाबुआ, खरगोन, बड़वानी, खण्डवा, राजगढ़, सीहोर, रायसेन, बैतूल, अशोकनगर शामिल हैं। इन जिलों की करीब 50,000 बसाहटों में अभी से जल संकट बढऩे लगा है।
मप्र में जहां एक ओर भू-जलस्तर तेजी से नीचे गिर रहा है, वहीं नलजल योजनाएं भी दम तोड़ रही है। प्रदेश में इस समय करीब 4 हजार से अधिक नलजल योजनाएं बंद पड़ी हैं। हालांकि पीएचई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उनके पास 1,294 योजनाएं ही बंद होने की सूचना है। गौरतलब है कि प्रदेश में 15,639 नलजल योजनाएं हैं। इनमें से हजारों कई साल से बंद पड़ी हैं, वहीं भू-जलस्तर गिरने के कारण कई हजार बंद हो गई हैं। पानी की बढ़ती किल्लत को लेकर नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ हाइड्रोलॉजी ने जो रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक भारत में विकास की रफ्तार बढऩे के साथ पानी का संकट बढ़ेगा और पानी को लेकर अनेक प्रदेशों में मारा-मारी मच सकती है। रिपोर्ट के अनुसार अभी पानी की मांग प्रति व्यक्ति सौ से एक सौ दस लीटर के बीच है। अगर मप्र के संदर्भ में देखें तो यहां के लोगों को इसका आधा भी नहीं मिल पा रहा है। पीएचई के अनुसार, वर्तमान में प्रदेश के 1,09,090 ग्राम, मजरे और टोले में 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन तथा 18,977 में इससे कम पेयजल उपलब्ध कराया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि हर बसाहट में पानी के लिए मारामारी है। फरवरी तक भरे रहने वाले राजगढ़ के कपिल सागर की वर्तमान स्थिति यह है कि फरवरी के प्रथम सप्ताह में ही उसका जल स्तर 4 फीट गिर चुका है। जिससे आने वाले समय में नगर को पेयजल से जूझना पड़ेगा। इसी तरह प्रदेश की अन्य नदियों का भी जल सूख रहा है। यह इस बात का संकेत है कि आने वाला समय विकट होगा।
पीने लायक नहीं रहा
नर्मदा का पावन जल
सरदार सरोवर बांध के बैक वाटर और लगातार हो रहे नर्मदा तटों पर अवैध रेत उत्खनन से पुण्य सलिला मां नर्मदा का पावन जल अब पीने लायक नहीं रह गया है। मां नर्मदा का रुका हुआ पानी दूषित हो रहा है, जिससे इसमें जहरीले पदार्थ पनप रहे है। गुजरात सरकार ने तो सरदार सरोवर के पानी पर पीने से रोक लगा दी है। इससे सबसे अधिक संकट गुजरात के नर्मदा तटों और नहर किनारे बसे लोगों पर खतरा मंडरा रहा है। दूषित जल से मछलियां भी मर रही है। जिसके कारण मछुआरों की रोजी रोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है। ये आरोप नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बैक वाटर के दूषित होने पर गुजरात सरकार की एक रिपोर्ट के आधार पर लगाया है। नबआं का कहना है कि दूषित बैक वाटर का असर मप्र के नर्मदा तटों पर भी शुरू होने लगा है। नबआं कार्यालय में आंदोलन नेत्री मेधा पाटकर ने इसका खुलासा करते हुए कहा कि एक ओर तो घाटी में मां नर्मदा की जयंती मनाने की तैयारी जोर शोर से चल रही है। दूसरी ओर मां नर्मदा की हालत दिन ब दिन खराब होते जा रही है। गुजरात सरकार ने 138 गांवों में पीने के लिए पानी लेने से रोक दिया गया है।
– बृजेश साहू