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प्रियंका कितनी कारगर

राजनीति की रणभेरी अब बज चुकी है। 2019 का आम चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिये ही जीने मरने का सवाल बन गया है। 3 राज्यों में मिली जीत से कांग्रेस में उत्साह है। वह इस उत्साह को पार्टी और वोटर दोनों के लिये प्रयोग करना चाहती है। यही वजह है कि कांग्रेस ने भी प्रियंका गांधी को मैदान में उतार कर अपना सबसे अहम किरदार सामने कर दिया है। कांग्रेस के पक्ष में बन रही हवा को इस ‘मास्टर स्ट्रोकÓ से केवल चुनावी लाभ ही नहीं मिलेगा बल्कि चुनाव के बाद उपजे हालात में नये तालमेल बनाने में भी सहायता मिलेगी। ‘शाह-मोदीÓ खेमे में भी इससे बेचैनी हो गई है।
चुनावों में कांग्रेस की जब-जब पराजय होती थी कांग्रेस कार्यकर्ता प्रियंका गांधी को पार्टी में लाने की मांग करते थे। प्रियंका अब सक्रिय राजनीति में आ गई हैं। 23 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का महासचिव बनाकर राजनीति में उनकी लंबी पारी की शुरुआत कर दी। देश की राजनीति में प्रियंका के आगमन को एक बड़ी घटना के रूप में देखा जा रहा है। राजनीति में प्रियंका के आगाज को लोग कांग्रेस के तुरुप का एक्का और ब्रह्मास्त्र के रूप में देखने लगे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रियंका कीसक्रियता ने कांग्रेस में एक नई जान फूंक दी है। यूपी में लगातार हार से आत्मविश्वास खो चुके कांग्रेस कार्यकर्ता नई ऊर्जा और उत्साह से लबरेज हैं। यूपी में कुछ नया करने के लिए कांग्रेस अंगड़ाई लेने लगी है।
किसी भी चुनावी जंग को जीतने के लिए सबसे पहले जरूरी होता है कि जमीनी स्तर और बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का हौसला एवं मनोबल ऊंचा हो, उनमें जीतने का जज्बा हो। क्योंकि हारे हुए मन से कोई जंग नहीं जाती जा सकती। कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं के इस मनोविज्ञान को साधने में सफल हुई है लेकिन आगे की राह उसके लिए आसान नहीं है।
प्रियंका के आने से इतना जरूर हो गया कि यूपी की राजनीतिक लड़ाई में वह भी दिखने लगी है और वह अपनी रणनीति में सफल होती रही तो वह एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर सकती है। जानकार मान रहे हैं कि प्रियंका के आ जाने के बाद यूपी की कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। राजनीति में प्रियंका की एंट्री ऐसे समय में हुई है जब राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर कोई सवाल नहीं है। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने भाजपा को पटखनी दी है।
हिंदी पट्टी का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश है और यह राज्य दिल्ली की राजनीति की दिशा और दशा तय करता है। यूपी में सपा और बसपा के गठबंधन के बाद से कांग्रेस सबसे बड़े प्रदेश में चुनावी लड़ाई में पिछड़ते और हाशिए पर जाती दिखाई दे रही थी। सबसे बड़े राज्य की चुनावी लड़ाई में मुकाबले से बाहर रहना कांग्रेस के लिए नुकसान दायक साबित हो सकता था। यही नहीं यूपी के चुनावी परिदृश्य में उसका धुंधलापन उसकी राष्ट्रीय राजनीति के मंसूबों में अड़चन डाल सकता था। राहुल गांधी ने बहुत सोच-समझकर प्रियंका कार्ड खेला है। उनकी नजर लोकसभा के साथ-साथ 2022 के विधानसभा चुनावों पर है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि यूपी में कमजोर होकर देश की राजनीतिक लड़ाई नहीं जीती जा सकती। प्रियंका को पूर्वी यूपी की कमान सौंपकर उन्होंने सपा और बसपा को भी संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में कांग्रेस खुद के दम पर खड़ी होगी। इससे सपा और बसपा पर दबाव भी बना है। कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि लोकसभा चुनावों में उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उसे बस हासिल करने की राह पर आगे बढऩा है।
प्रियंका की सबसे बड़ी ताकत उनकी सहजता और कार्यकर्ताओं के साथ उनका जुड़ाव है। वह बड़ी आसानी से कार्यकर्ताओं एवं नेताओं के साथ घुलमिल जाती हैं। लोगों को उनमें इंदिरा गांधी का अक्स भी दिखाई देता है। वह मृदुभाषी हैं और उन्हें चतुराई के साथ भाषण देने की कला भी आती है। प्रियंका की ये सारी खासियतें कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में फायदा पहुंचा सकती हैं। उन्हें इस बार बड़ी जिम्मेदारी मिली है। खासकर यूपी के उस हिस्से में उन्हें कांग्रेस का झंडा बुलंद करना है जो मोदी और योगी का गढ़ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाराणसी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की गोरखपुर सीट इसी इलाके में है। यहां उन्हें मोदी और योगी की रैलियों और उनकी ललकार का सामना करना है। पूर्वांचल भाजपा का गढ़ है। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने यहां की करीब-करीब सभी सीटें जीती थीं। भगवा पार्टी के इस गढ़ को भेदना और उसे चुनौती देना प्रियंका के लिए आसान काम नहीं है। राजनीति प्रियंका के लिए नई नहीं है लेकिन उनके नाम के साथ कोई बड़ी राजनीतिक उपलब्धि नहीं जुड़ी है। वह अमेठी और रायबरेली तक अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के लिए चुनाव प्रचार करती आई हैं। उन्होंने पहली बार 1999 में अमेठी में अपनी मां सोनिया गांधी के लिए चुनाव प्रचार किया था।
इसके बाद वह बीच-बीच में अमेठी और रायबरेली जाकर अपने राजनीतिक हुनर का परिचय देती रही हैं। करीब 20 साल तक उन्होंने खुद को इन दो जिलों तक सीमित रखा। अब दो दशक बाद कांग्रेस में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिली है जिस पर उन्हें खरा उतरने की चुनौती है। प्रियंका के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक को वापस लाने और नए वोटरों को अपने साथ जोडऩे की है। ब्राह्मण, दलित और मुसलमान कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक रहे हैं लेकिन भाजपा, सपा और बसपा के उभार ने कांग्रेस के इस वोट बैंक को अपने-अपने पाले में खींच लिया। 1984 में कांग्रेस ने यूपी में 51 फीसदी वोटों के साथ 83 सीटें जीती थीं। इसके बाद से देश के सबसे बड़े सूबे में सबसे पुरानी पार्टी की जमीन दरकती चली गई। हालांकि 2009 के चुनावों में पार्टी वापसी करती दिखी और 18 प्रतिशत वोट के साथ 21 सीटें जीतने में कामयाब रही लेकिन 2014 के मोदी लहर में पार्टी 7.5 प्रतिशत वोटों के साथ सिमटकर 2 सीटों पर आ गई। जाहिर है कि कांग्रेस को उसके पुराने स्वरूप में खड़ा करना प्रियंका के लिए एक बड़ी चुनौती है और इन चुनौतियों को स्वीकारते हुए उन्हें पार्टी के लिए राह बनानी है।
लोकसभा में सबसे ज्यादा सीटे होने के कारण उत्तर प्रदेश बहुत अहम हो जाता है। उम्मीद की जा रही है कि प्रियंका अपनी मां की संसदीय सीट रायबरेली से चुनाव भी लड़ेंगी। प्रियंका का लम्बा छरहरा कद छोटे बाल और साड़ी पहनने का लुक उन्हें दादी इंदिरा के करीब लाता है। वह 5 फिट 7 इंच लंबी हैं। अपने परिवार में वह सबसे लंबी महिला हैं। प्रियंका के अंदर संगठन की क्षमता, राजनीतिक चतुराई और वाकपटुता सबसे अलग है। लोगों से बात करते समय खिलखिला कर हंसना और अपनी बात बच्चों की तरह जिद करके मनवाने की कला प्रियंका को दूसरों से अलग करती है। सौम्य सहज और आत्मीय दिखने वाली प्रियंका जरूरत पडऩे पर अपने तेवर तल्ख करना भी जानती हैं। इससे कार्यकर्ता अनुशासन में रहते हैं। वह देश के सबसे बड़े सियासी परिवार की होने के बाद भी सियासी बातें कम करती हैं। विरोधी दल के नेता उनके बारें में कुछ भी कहे पर वह कभी इन नेताओं पर कमेंट नहीं करती। कभी मीडिया कमेंट के लिये कहती भी है तो वह मुस्कुुराकर बात को टाल जाती हैं।
– दिल्ली से रेणु आगाल