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कोटे की राजनीति

लोकसभा चुनावों के मद्देनजर शुरू में जिसे विपक्ष के खिलाफ नरेंद्र मोदी सरकार का सर्जिकल स्ट्राइक बताया जा रहा था, केंद्र सरकार की ओर से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए 10 प्रतिशत का वह आरक्षण अब बिहार की राजनीति में हर किसी के लिए दोधारी तलवार बनता दिख रहा है। जहां भाजपा को उम्मीद है कि पिछड़े वर्ग का कोटा अगड़ी जातियों का वोट उनके पक्ष में दिलाने में मददगार साबित होगा।
वहीं पार्टी का प्रदेश नेतृत्व इस बात को लेकर बहुत सजग है कि बिहार की जातिगत राजनीति को देखते हुए उसे सावधानी से संतुलन बनाकर चलना होगा ताकि बाकी जातियों का समर्थन भी बरकरार रहे। बिहार में अगड़ी जातियों की संख्या करीब 12 प्रतिशत है, जो कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में गिनती के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है। 10 प्रतिशत आरक्षण के दांव से भाजपा, जो हाल के विधानसभा चुनावों में हार के बाद सहमी लग रही थी, उम्मीद कर रही है कि वह विपक्ष को मात दे सकती है।
लेकिन केवल अगड़ी जातियों का समर्थन ही काफी नहीं है। भाजपा या पूरा एनडीए अपनी यह छवि बनाने का साहस नहीं कर सकता है कि वह ओबीसी और अति पिछड़ी जाति (ईबीसी) के वोटों की अनदेखी करके केवल अगड़ी जातियों की हितैषी है। भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि अगड़ी जातियों को खुश करते हुए भी वह कहीं से भी ओबीसी विरोधी न दिखाई दे। जातियों के व्यापक रूप से ध्रुवीकरण वाले बिहार में अगड़ी जातियों और ओबीसी के बीच गठजोड़ सफल नहीं रहा है।
केंद्र के इस फैसले के तुरंत बाद भाजपा की सहयोगी नीतीश कुमार की जद (यू) और मुख्य प्रतिद्वंदी लालू प्रसाद यादव की राजद ने आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग कर दी। भाजपा ने भी 2021 तक ताजा जातीय जनगणना की बात शुरू कर दी है। जद (यू)नेतृत्व ने मौके की नजाकत को देखते हुए ताजा जनगणना का समर्थन किया है। बिहार के राजनीतिक वर्ग ने पिछड़े वर्ग आरक्षण पर जिस तेजी से प्रतिक्रिया दी है, वह अकारण नहीं है क्योंकि बिहार में जाति बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है और भाजपा को अच्छी तरह याद है कि 2015 के विधानसभा चुनाव में उसे शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा था। एनडीए के एक वर्ग के नेता भी मानते हैं कि लालू यादव ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण विरोधी बयान का बड़ी चतुराई से इस्तेमाल कर फायदा उठाया था। 2015 के विधानसभा चुनावों के समय लालू प्रसाद यादव ने भाजपा को आरक्षण विरोधी बताया था।
दरअसल, पिछड़े वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा के बाद भाजपा ने अगर दूसरी जातियों के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग शुरू कर दी है तो इसकी वजह यही है कि भाजपा ईबीसी, ओबीसी और अनुसूचित जातियों में अपना जनाधार गंवाना नहीं चाहती है। बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने हालांकि पिछड़े वर्ग को दिए गए आरक्षण का विरोध नहीं किया है लेकिन उन्होंने भी सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में ओबीसी, ईबीसी और एससी-एसटी के लिए आरक्षण की मौजूदा सीमा बढ़ाकर 90 प्रतिशत किए जाने की मांग की है। उन्होंने निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी आरक्षण दिए जाने की मांग की है। इस समय एससी, एसटी और अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा निर्धारित है। दूसरी तरफ कांग्रेस इस बात को लेकर चिंतित है कि भाजपा बिहार में अगड़ी जातियों का अपना वोट बैंक मजबूत बनाए रख सकती है। उधर, भाजपा को भी चिंता है कि इस फैसले से पिछड़ी जातियां कहीं उससे नाराज न हो जाएं। यह देखना दिलचस्प होगा कि जातिगत रूप से संवेदनशील बिहार में आरक्षण का इस खेल का नतीजा किसके पक्ष में जाता है।
– विनोद बक्सरी