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गुटबाजी बड़ी चुनौती

राजस्थान की राजनीति में गुटबाजी और अंदरूनी कलह के बाद चुनावी मौसम में उम्मीदवारों का टिकट मामला, सीएम पद की रेस और फिर सरकार के लिए मंत्रीपद का बंटवारा शांति से निपट गया। राज्य के सभी अनुभवी और जोश से लबरेज नेताओं के सम्मान का ध्यान रखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने ताजपोशी भी कर दी। ये सब देखते हुए सियासत की सीधी तस्वीर कहती है कि राजस्थान कांग्रेस में अब शांति है और लोकसभा चुनाव की तैयारियों में कांग्रेस जुट गई है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई राजस्थान में गुटबाजी थम गई?
अशोक गहलोत को गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में अपनी जादुगरी दिखाने का ईनाम मिला तो सचिन पायलट को 21 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के एवज में डिप्टी सीएम का पद मिला। वहीं शपथ लेने वाले मंत्रियों की सूची में नाम न होने के बाद अब सीपी जोशी को भी विधानसभा अध्यक्ष का पद दिया गया है। क्या वाकई जिन चेहरों के ईर्द-गिर्द राजस्थान की राजनीति घूमती है वो चेहरे अपनी पदस्थापना से संतुष्ट हैं? क्या ये सब मिलकर कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव में भी विधानसभा चुनाव की ही तरह दमदार प्रदर्शन के लिए सामूहिक प्रण और रण करेंगे? साल 2013 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से राजस्थान का किला जिस तरह फिसला उससे दोबारा जीत दूर-दूर तक मुमकिन नहीं थी। लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में गुटबाजी हावी न हो उसके लिए कांग्रेस ने सबसे पहले गुटबाजी पर विराम लगाने की रणनीति पर काम किया। कांग्रेस ने सीएम की रेस में सभी चेहरों को चुनाव के आखिर तक बने रहने दिया। किसी भी एक नाम को न तो खारिज किया और न ही आगे बढ़ाया।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब राजस्थान विधानसभा चुनाव से तकरीबन 4 महीने पहले जयपुर में रोड शो किया तो उन्होंने मंच पर अशोक गहलोत और सचिन पायलट को गले मिलवाकर समर्थकों में संदेश भिजवाया। संदेश साफ था कि पहले सब मिलकर लड़ें और बाद में तय होगा कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। लेकिन संकेतात्मक प्रयासों के बावजूद राजस्थान में पार्टी अंदरूनी कलह और गुटबाजी को झेल रही थी। पहली गुटबाजी टिकटों के बंटवारे को लेकर अपनी पसंद के उम्मीदवारों को मौका दिए जाने पर शुरू हुई। विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन भरने का पहला दिन आ चुका था। लेकिन कांग्रेस अपने उम्मीदवारों के नाम तय नहीं कर सकी थीं। नामों पर मंथन के साथ-साथ खींचतान चलती रही। यहां तक कि अशोक गहलोत- सचिन पायलट के बीच टिकटों के बंटवारे के वक्त खींचतान के आरोप लग रहे थे। राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के बीच तो तीखी बहस तक हो गई थी। वहीं ‘मेरा बूथ, मेरा गौरवÓ अभियान नाम के कार्यक्रमों में नेताओं के साथ मारपीट और कपड़े फाडऩे की घटना भी सामने आई थी। दरअसल, राजनीति के तराजू में महत्वाकांक्षा और असुरक्षा के पलड़ों के बीच नेता हाथ आए मौके को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहते हैं और यही वजह है कि जब चुनाव आते हैं तो उनका सब्र एक तरफ और आक्रमण हावी हो जाता है। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने समय-समय पर इसी सब्र के बांध को मजबूती से बांधने का काम किया ताकि चुनाव तक एकजुटता बनी रहे। सार्वजनिक मंच पर गहलोत और पायलट को साथ खड़े कर दोनों के ही समर्थकों में सीएम पद को लेकर सस्पेंस भरने का काम किया ताकि चुनावी संगठन और प्रबंधन कमजोर न हो सके। एक तस्वीर राजस्थान की सियासत में वाइरल हुई थी। एक रैली के दौरान एक ही मोटर साइकिल पर अशोक गहलोत और सचिन पायलट साथ जा रहे थे।
किसी तरह गुटबाजी पर अंकुश लगा। लेकिन चुनावी नतीजों ने कांग्रेस को सीटों की सेंचुरी बनाने से रोक दिया। बावजूद इसके कांग्रेस ने राजस्थान में अपने तीन बड़े खिलाडिय़ों के जरिए सभी जातियों को साधने का काम बखूबी पूरा किया। अब जबकि गहलोत सरकार ने पूरी तरह से कामकाज शुरू नहीं किया है तो ऐसे में पार्टी की गुटबाजी का कोई ताजा मामला सामने नहीं है जो कि लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए चिंता का सबब बने।
-जयपुर से आर.के. बिन्नानी