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बेपटरी भाजपा

मप्र में भाजपा के पोस्टर ब्वाय रहे शिवराज सिंह चौहान के साथ ही पूरी भाजपा बेपटरी होती जा रही है। सभी नेता अपनी ढपली अपना राग गाने में लगे हुए हैं। 13 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान लगातार पार्टी लाइन से बाहर जाकर जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में लगे हुए हैं। शिवराज सिंह चौहान की गतिविधियां कई बीजेपी नेताओं को रास नहीं आ रहीं हैं। पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद भी शिवराज सिंह चौहान अपनी गतिविधियों से यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि राज्य में बीजेपी का नेतृत्व अभी भी उनके ही हाथ में है। विधानसभा के चुनाव में बीजेपी को 109 सीटें मिलीं हैं। कांग्रेस के खाते में 114 सीटें आईं। दो तिहाई बहुमत के लिए 116 सीटों की जरूरत होती है। कांग्रेस को बीजेपी से सिर्फ पांच सीटें ही ज्यादा मिलीं। इतने कम अंतर की हार को शिवराज सिंह चौहान अपनी लोकप्रियता की हार नहीं मानते हैं। वे अपनी लोकप्रियता पार्टी को मिले वोटों के प्रतिशत के आधार पर जताने से भी पीछे नहीं हटते हैं। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले हैं। बीजेपी को कुल 41.02 प्रतिशत और कांग्रेस को 40.89 प्रतिशत वोट मिले हैं। शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि बीजेपी को मिले वोट यह बताने के लिए काफी हैं कि जनता उनकी सरकार की नीतियों से नाराज नहीं थी।
शिवराज सिंह चौहान चुनाव में मिली हार को हजम नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें अभी भी लगता है कि कांग्रेसी नेताओं के अंतर्विरोध के चलते कभी भी सरकार गिर सकती है। इसी आस में चुनाव परिणाम के कुछ दिन बाद ही चौहान ने साफ तौर पर कह दिया कि उनका मूड केंद्र की राजनीति में जाने का नहीं है। राज्य की राजनीति में ही रहने की इच्छा भी उन्होंने जताई थी। उनकी इस इच्छा के विपरीत पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया।
दरअसल शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लगातार चुनाव में मिलीं सफलताओं के बाद मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पूरी तरह से उनके ही ईदगिर्द सिमटती चली गई। पार्टी के कई दिग्गज नेता पिछले 13 साल में हासिए पर डाल दिए गए थे। फैसले सामूहिक राय के बजाए शिवराज सिंह चौहान की पसंद-नापसंद के आधार पर लिए जाने लगे थे। संगठन भी पूरी तरह से शिवराज सिंह चौहान पर ही निर्भर नजर आता था। जबकि मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी का संगठन देश में सबसे मजबूत संगठन माना जाता रहा है। विधानसभा चुनाव में इस बार संगठन कहीं भी सक्रिय दिखाई नहीं दिया। पार्टी अध्यक्ष राकेश सिंह भी अपनी भूमिका को स्वतंत्र रूप से निर्वहन करने में असहज महसूस करते देखे गए। उनकी असहजता अभी भी दिखाई दे रही है। चुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद राकेश सिंह ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश भी की थी। उनकी इस पेशकश को राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अस्वीकार कर दिया। दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान यह कोशिश करते नजर आए कि उनके करीबी नरोत्तम मिश्रा को प्रतिपक्ष का नेता बना दिया जाए।
केंद्रीय नेतृत्व को भरोसे में लिए बगैर नेता चुनने के लिए विधायक दल की बैठक बुलाने की कोशिश भी शिवराज सिंह चौहान ने की थी। सूत्रों ने बताया कि उनकी इस कोशिश को राकेश सिंह ने केंद्रीय नेतृत्व की मदद से नाकाम कर दिया। शिवराज सिंह चौहान ने एक कोशिश यात्रा निकालने की भी की। उन्होंने संगठन को भरोसे में लिए बगैर आभार यात्रा निकालने की सार्वजनिक घोषणा भी कर दी। पार्टी ने उनकी इस यात्रा को भी मंजूरी नहीं दी। बारी जब विधायक दल का नेता चुनने की आई तो पार्टी ने सबसे वरिष्ठ विधायक गोपाल भार्गव के नाम का फैसला सुना दिया। गोपाल भार्गव को शिवराज सिंह चौहान पसंद नहीं करते हैं। विधानसभा सत्र के दौरान भी नेतृत्व को लेकर शिवराज सिंह चौहान की बैचेनी साफ देखी गई। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यदि चौहान के समर्थक कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का ठीक से अध्ययन करते तो बीजेपी को परंपरा के अनुसार विधानसभा उपाध्यक्ष का पद मिल सकता था। विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार उतारे जाने के फैसले के कारण ही बीजेपी को उपाध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ा।
– भोपाल से अजय धीर