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तैयारी जीत की

लोकसभा की आहट के बीच राजनीतिक दलों की हलचल भी तेज हो गई है। हर दल अपनी जीत के लिए जी तोड़ कोशिश में जुटा है। खास तौर पर सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी के लिए न सिर्फ लोकसभा चुनाव दोबारा फतह करने की चुनौती है बल्कि इस वर्ष होने वाले अन्य विधानसभा चुनावों में भी जीत को बरकरार रखने की महती जिम्मेदारी भी है। यही वजह है कि पार्टी मोदी लहर के साथ विधानसभा चुनावों की नैया भी पार करने के मूड में है। इसका उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है। महाराष्ट्र मंत्री मंडल ने समय से पूर्व चुनाव के संकेत दे दिए हैं।
आपको बता दें कि फडणवीस सरकार का कार्यकाल अक्टूबर 2019 में खत्म हो रहा है। ऐेसे में प्रस्तावित चुनाव अगस्त सितंबर में हो सकते हंै। लेकिन भाजपा यहां केसीआर की नीति अपनाने के मूड में है। केसीआर ने तेलंगाना में चार महीने पहले चुनाव करवा कर चुनावी बाजी मार ली थी। कुछ ऐसा ही मूड भाजपा का भी लग रहा है कि लोकसभा चुनाव के साथ ब्रांड मोदी के नाम पर चुनाव लड़ ले। महाराष्ट्र मंत्रिमंडल के निर्णयों ने संकेत दे दिए हैं कि विधानसभा के चुनाव समय से पहले हो सकते हैं। इसे देखते हुए केंद्र की मोदी सरकार के तर्ज पर राज्य सरकार ने पिछड़ी जातियों के लिए लॉलीपॉप योजनाओं को हरी झंडी दिखाई है। मंत्रिमंडल में राज्य के विमुक्त जाति घुमंतू जनजाति (वीजेएनटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और विशेष पिछड़ा वर्ग (एसबीसी) पर खास मेहरबानी दिखाते हुए उनके लिए तिजोरी खोल दी। इन वर्गों के लिए सरकार ने 736.50 करोड़ रुपये के प्रस्ताव मंजूर किए हैं।
भाजपा भले ही समय से पहले चुनाव कराने का मन बना रही हो लेकिन सहयोगी दल शिवसेना से पार पाना उनके लिए मुश्किल होगा। हालांकि शिवसेना और भाजपा का गठबंधन 1999 से सत्ता पर काबिज है। लेकिन पिछले कुछ समय से भाजपा की नीतियों को लेकर शिवसेना खासी नाराज है। यही नहीं शिवसेना समय-समय पर मोदी सरकार के फैसलों पर भी निशाना साधती रही है। यही वजह है कि इस बार चुनाव में शिवसेना भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकती है। कांग्रेस और एनसीपी नेताओं ने 2019 में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए सीटों के तालमेल को लेकर प्रारंभिक बातचीत शुरू कर दी है। कांग्रेस का कहना है कि इस कदम का मकसद बीजेपी और शिवसेना से मुकाबला करने के लिए धर्मनिरपेक्ष दलों का महागठबंधन बनाना है।
उधर, पिछले चार सालों में भाजपा की कई सहयोगी पार्टियां एनडीए का साथ छोड़ चुकी हैं। अन्य पार्टियां लोकसभा चुनाव से पहले सीट शेयरिंग में बेहतर डील की कोशिश में जुटी हुई हैं। चुनावी जानकारों का कहना है कि अगर मौजूदा हालात में शिवसेना अगर भाजपा से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ती है तो इस त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा से ज्यादा नुकसान शिवसेना को उठाना पड़ सकता है। वहीं कांग्रेस-एनसीपी के लिए यह स्थिति लाभकारी साबित होगी। अगर दोनों मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो 2014 के परिणामों को दोहराने की संभावना ज्यादा है।
जानकारों का कहना है कि अगर 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में चारों पार्टियों को मिले वोटों का पैटर्न 2019 के लोकसभा चुनावों में भी रहता है तो 6 सीटों के मुकाबले 23 सीटें मिल सकती हैं। भाजपा को कोई नुकसान होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। भाजपा को 23 सीटें मिलने की संभावना है। लेकिन अगर भाजपा और शिवसेना साथ मिलकर लड़ते हैं तो गठबंधन को कुल 41 सीटों पर जीत मिल सकती है। 2014 में भाजपा और शिवसेना ने कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के सामने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में भाजपा-शिवसेना ने 48.4 फीसदी वोट पाकर कुल 41 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन 34.4 फीसदी वोट पाकर कुल 6 सीटें ही जीत पाई थी। इसके बाद जब चारों पार्टियों ने विधानसभा चुनाव में अलग-अलग चुनाव लड़ा तो भाजपा को 28.1 फीसदी, शिवसेना को 19.5 फीसदी, कांग्रेस को 18.1 फीसदी और एनसीपी को 17.4 फीसदी वोट मिले। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है वो ये है कि विधानसभा चुनाव 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद हुए थे। इसलिए उस वक्त परिस्थितियां काफी कुछ एक जैसी ही थीं।
-बिन्दु माथुर