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आदिवासियों का कैसे होगा कल्याण

भारत में लगभग 25 प्रतिशत वन क्षेत्र है, इसके अधिकांश हिस्से में आदिवासी समुदाय रहता है। लगभग 90 प्रतिशत खनिज सम्पदा, प्रमुख औषधियां एवं मूल्यवान खाद्य पदार्थ इन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में हैं। सरकारों द्वारा वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों को विस्थापित कर संपदा का दोहन किया जा रहा है। इसके एवज में आदिवासियों के कल्याण के लिए जो भारी भरकम राशि मिल रही है उसका उपयोग ही नहीं हो पा रहा है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 के लिए आदिवासियों के कल्याण के लिए ट्राइबल सबप्लान (टीएसपी) के तहत 39,135 करोड़ रुपए आवंटित किए गए उनमें से भी बड़ी राशि खनिज भंडारों की खोज पर खर्च की गई है। वहीं आदिवासियों के कल्याण के लिए मिलने वाला 48,113 करोड़ बेकार हो गया।
भारत में कुल आबादी का लगभग 11 प्रतिशत आदिवासी समाज है। जबकि मप्र की कुल जनसंख्या की लगभग 21 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। लेकिन इस आबादी को टीएसपी का कोई फायदा नहीं मिल रहा है। भारी भरकम राशि कोयला और खान मंत्रालय को मिल रही है, लेकिन वे उसको खर्च नहीं कर पा रहे हैं। यही नहीं आदिवासियों के कल्याण की राशि खनिजों के भंडार का पता लगाने के लिए खर्च की जा रही है।
जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2018-19 के लिए बजटीय व्यय 10,14,451 करोड़ रुपए में से 8.6 प्रतिशत यानी 87,248 करोड़ रुपए आदिवासियों के कल्याण के लिए आवंटित होने थे, लेकिन सरकार ने टीएसपी के लिए 39,135 करोड़ रुपए ही आवंटित किए। यह निर्धारित बजट (8.6 प्रतिशत) के बजाय 3.86 प्रतिशत ही है। यानी आदिवासियों के कल्याण के 48,113 करोड़ रूपए बेकार चले गए। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार ने आधा बजट भी नहीं दिया। 2014-15 में कुल अनुमानित बजट का 1.84 प्रतिशत, 2015-16 में 1.13 प्रतिशत और 2016-17 में 1.21 प्रतिशत हिस्सा ही टीएसपी को आवंटित किया गया। इसी तरह 2017-18 में निर्धारित बजट का महज 1.53 प्रतिशत ही टीएसपी को नसीब हुआ। ऐसे में आदिवासियों का कल्याण कैसे हो यह सवाल चिंता का विषय बना हुआ है। इन तमाम विसंगतियों के बीच सबसे चौंकाने वाली खबर यह है कि उपलब्ध कराई जा रही धनराशि भी खर्च नहीं की जा रही है। 13 मार्च 2018 को जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, 2014-15 से 2016-17 के बीच 62,947.82 करोड़ रुपए टीएसपी के तहत खर्च किए गए जबकि इस दौरान 76,392 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। यह स्थिति तब है जब तमाम राजनीतिक दल और सरकारें आदिवासियों के हितैषी होने का दावा कर चुके हैं।
उधर, केंद्र सरकार एक बार फिर ट्राइबल सबप्लान (टीएसपी) का नाम बदलकर डेवलपमेंट एक्शन प्लान फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब करने की तैयारी में है। इससे पहले योजना आयोग को भंग कर बने नीति आयोग ने भी टीएसपी का नाम बदलकर शेड्यूल्ड ट्राइब कंपोनेंट कर दिया था। लेकिन क्या नाम बदलने से आदिवासियों को फायदा होगा। टीएसपी के रूप में आदिवासियों के लिए जारी होने वाली निधि को उनके कल्याण के बजाय उन्हें उजाडऩे पर खर्च किया जा रहा है। कम से कम कोयला और खान मंत्रालय में तो ऐसा ही हो रहा है। सूचना के अधिकार से मिले दस्तावेज बताते हैं कि इन मंत्रालयों ने टीएसपी का फंड आदिवासियों के कल्याण के बजाय उन कामों पर खर्च किया जिनसे आदिवासियों के सामने मुश्किलें खड़ी होंगी।
– नवीन रघुवंशी