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संधि पर ग्रहण

रूस के साथ की गई 31 साल पुरानी परमाणु हथियार नियंत्रण संधि से अमेरिका जल्द अलग होने की घोषणा कर चुका है। 1980 में शीत युद्ध के समय तत्कालीन सोवियत संघ ने यूरोपीय देशों को निशाना बनाने के मकसद से अपने सीमाई इलाकों में सैकड़ों मिसाइलें तैनात कर दी थीं। मध्यम दूरी की ये मिसाइलें परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम थीं। इसके बाद 1987 में शीत युद्ध की स्थिति को खत्म करने के लिए अमेरिका और उसके बीच मध्यम दूरी परमाणु शक्ति (आईएनएफ) संधि हुई। यह संधि इन दोनों को जमीन से मार करने वाली ऐसी मिसाइलें बनाने से रोकती है जो परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम हों और जिनकी मारक क्षमता 500 से लेकर 5,500 किलोमीटर तक हो।
अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि रूस लगातार इस संधि का उल्लंघन कर रहा है। उनका यह भी कहना है कि जब तक रूस मध्यम दूरी की इन बैलिस्टिक मिसाइलों का निर्माण करता रहेगा, तब तक अमेरिका इस समझौते का पालन नहीं करेगा। और वह भी जमीन से मार करने वाली इन मिसाइलों को बनाएगा।
कई लोगों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने जल्दबाजी में यह फैसला लिया, लेकिन ऐसा नहीं है। अमेरिकी मीडिया की मानें तो अमेरिकी रक्षा विभाग से जुड़े अधिकारी ट्रंप पर यह फैसला लेने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे। इनका कहना था कि रूस को लेकर कोई बड़ा फैसला लेना बेहद जरूरी हो गया है क्योंकि वह लाख मना करने के बाद भी मध्यम दूरी की मिसाइलों का निर्माण कर रहा है। पिछले प्रशासन में भी यह मुद्दा कई बार उठा था लेकिन, बराक ओबामा ने हर बार रूस को चेतावनी देकर छोड़ दिया था।
बीते साल भी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने सूचना दी थी कि रूस न केवल मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है बल्कि उसने इस तरह की तैयारी भी कर रखी है कि वह चंद मिनटों में पूरे यूरोप पर ये मिसाइलें दाग सकता है। इस सूचना के बाद अमेरिका की ओर से रूस पर दबाव बनाने के कई प्रयास किए गए। अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने एक बार यह तक कह दिया कि अगर रूस नहीं माना तो अमेरिका समुद्र से लांच की जाने वाली मध्यम दूरी की क्रूज मिसाइल को अपने बेड़े में शामिल करेगा। बताते हैं कि जब रूस पर अमेरिका की इन धमकियों का कोई असर नहीं पड़ा, तब डोनाल्ड ट्रंप को संधि से अलग हो जाने का फैसला करना पड़ा।
हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के पीछे का एक कारण जॉन बोल्टन को भी माना जा रहा है। बताते हैं कि बीते मार्च में जॉन बोल्टन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने के बाद से नियमित रूप से यह मामला ट्रंप के सामने उठाया जाने लगा था। यूएन में अमेरिका के राजदूत रह चुके बोल्टन हमेशा से ही ऐसी संधियों के खिलाफ रहे हैं, जो कहीं न कहीं अमेरिका को बंधनों में बांधती हैं। बोल्टन कई बार यह कह भी चुके हैं कि रूस के साथ हुई आईएनएफ संधि अमेरिका का नुकसान कर रही है क्योंकि इसके चलते वह खुद बैलिस्टिक मिसाइलें बना नहीं पा रहा है और रूस को बनाने से रोक भी नहीं पा रहा है।
1990 के बाद से देखें तो चीन ने सामरिक क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। उसने नए हथियार हासिल करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है। हथियारों के मामले में चीन ने बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों पर विशेष ध्यान दिया है। पिछले दिनों अमेरिकी रक्षा विभाग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि चीन जिस तरह की मिसाइलें बना रहा है, अगर उसे भी रूस के साथ हुई आईएनएफ संधि में शामिल किया जाए तो उसकी 95 फीसदी मिसाइलें इस संधि का उल्लंघन करेंगी। इस रिपोर्ट के बाद अधिकारियों का कहना था कि अब या तो इस संधि में चीन को भी शामिल किया जाना चाहिए या फिर अमेरिका को संधि से हट जाना चाहिए। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक अधिकारियों के इस सुझाव के बाद से डोनाल्ड ट्रंप हर हाल में चीन को भी आईएनएफ संधि का हिस्सा बनाना चाहते हैं।
– माया राठी