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चोट कहीं और दर्द कहीं

प्रदेशाध्यक्ष पर रार
बताया जा रहा है कि इस बैठक में वसुंधरा राजे ने भी अपनी तरफ से कुछ नाम आगे बढ़ाए, लेकिन उन पर भी कोई सहमति नहीं बन पाई। लिहाजा प्रदेशाध्यक्ष से जुड़ा यह फैसला कर्नाटक चुनावों के बाद तक के लिए टल गया। प्रदेश के राजनीतिक जानकार बताते हैं कि इस दौरान राजे का हर विरोधी मान कर चल रहा था कि कर्नाटक जीत कर आए शाह प्रदेशाध्यक्ष पद पर उनकी एक न चलने देंगे। लेकिन हुआ उल्टा। सूत्रों की मानें तो अब अमित शाह की खुद की कुर्सी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं तो ऐसे में वे ऐसी किसी मजबूत दीवार से टकराने से हिचकेंगे जिससे चोट लगने का खतरा हो। नतीजतन कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए उन्हें वसुंधरा राजे की पसंद ही स्वीकारनी होगी। जानकार इसका एक कारण यह भी बताते हैं कि यदि राजस्थान में वसुंधरा राजे ही भाजपा का चेहरा बनी रहीं तो यहां जीत हासिल करने में शायद पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन यदि वे नाराज होकर बगावत पर उतर आईं तो फिर राजस्थान जीतना भाजपा के लिए नामुमकिन सरीखा हो जाएगा। इसलिए प्रदेश संगठन से जुड़े कुछ लोगों की मानें तो वसुंधरा राजे के करीबियों के मन में कर्नाटक नतीजों के बाद से ही लड्डू फूट रहे हैं कि न जाने कब उन्हें प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने की सूचना मिल जाए!