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कैसे सुधरे हालात

जितनी योजनाएं उतना ही भ्रष्टाचार यह है बुंदेलखण्ड के हालात। तभी तो प्रदेश के 51 जिलों में पिछले 14 सालों में तस्वीर बदली है, लेकिन बुंदेलखण्ड के छह जिलों सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ और दतिया में हालात जस के तस हैं। आलम यह है कि विकास कार्यों के लिए बुंदेलखंड पैकेज के तहत मिले 3700 करोड़ रूपए भी स्वाहा हो गए हैं। बुंदेलखंड पैकेज में भ्रष्टाचार के खिलाफ मप्र हाईकोर्ट के निर्देश पर मुख्य तकनीकी परीक्षक से कराई गई जांच में भ्रष्टाचार की परतें खुलने लगी हैं, लेकिन मप्र सरकार ने अभी तक बुंदेलखंड पैकेज को डकारने वाले अफसरों पर कार्रवाई नहीं की है। न ही उनके नाम उजागर किए हैं।
तत्कालीन यूपीए सरकार ने बुंदेलखंड की बदहाली को दूर करने के लिए पैकेज दिया था, ताकि राज्य योजनाबद्ध तरीके से उक्त राशि से विकास कार्य करवाएं, लेकिन राशि का आवंटन होने के साथ ही उसकी बंदरबांट शुरू हो गई। जिस जिले में जिस विभाग को जो राशि मिली वह जमीनी हकीकत जाने बिना ही योजनाएं बनाकर राशि खर्च करने लगा। सामाजिक कार्यकर्ता पवन घुवारा कहते हैं कि जिलों में कई ऐसी योजनाएं शुरू कर दी गई जिसकी वहां जरूरत ही नहीं थी। उनकी मानें तो अफसरों ने अपने फायदे की योजनाएं बनाई और उन पर मनमानी राशि खर्च की।
पैकेज के तहत 20,000 नए कुएं बनाने और पुराने कुओं की मरम्मत करने के लिए 500 करोड़ रुपए की सीमा तय की गई थी, लेकिन हाल ये है कि बुंदेलखंड में नया कुआं शायद ही कहीं दिखे और पुराने कुओं की हालत देखकर लगता नहीं कि इनके रखरखाव पर सैंकड़ों करोड़ रुपए बहा दिए गए हों। बुंदेलखंड पैकेज के निर्माण कार्यों की सीटीई जांच में पता चला कि प्रथम मंजूरी के आधार पर ही काम कराए गए। ठेकेदार को कार्य आदेश जारी करने के पूर्व कार्य की विस्तृत ड्राइंग व विस्तृत प्राक्कलन तैयार कर सक्षम अधिकारी से स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही निर्माण किया। डीपीआर पर प्रदाय तकनीकी स्वीकृति के अनुसार अधिकांश कार्यस्थलों पर निर्माण कार्य नहीं किया गया। कार्य पूर्ण होने पर व्यय की गई राशि व प्रशासकीय स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति की राशि में काफी अंतर पाया गया। कुछ स्थानों पर तो प्रशासकीय स्वीकृति की राशि से आधी राशि में ही कार्य पूर्ण हो गया हैं।
मुख्य तकनीकी परीक्षक द्वारा की गई जांच में बुंदेलखंड पैकेज में वन विभाग का भी घोटाला सामने आया है। इसके तहत जानवरों को पानी के पीने के लिए चेकडैम बनाए गए हैं, लेकिन इनके निर्माण में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई है। करीब 107 करोड़ रुपए की लागत से बनाए गए चेकडैम किसी काम के नहीं रहे हैं। वन विभाग ने वाहनों के भुगतान के लिए वाउचर में जिन ट्रैक्टरों और जेसीबी को दर्शाया है, वह फर्जी हैं। आरटीओ में इन नंबरों का रजिस्ट्रेशन बाइक, स्कूटी, ऑटो रिक्शा, स्कूटर और कार के नाम पर है। बुंदेलखंड पैकेज में हुए भ्रष्टाचार को सामने लाने वाले टीकमगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता पवन घुवारा ने बताया कि वन विभाग बुंदेलखंड पैकेज का एक और हिस्सा 107 करोड़ रुपए का बंदरबांट होने के बाद भी अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकी है। भ्रष्टाचार के इतने सारे मामले आने के बाद भी दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो सकी है। ऐसे में बुंदेलखण्ड के हालात कैसे सुधरेंगे।
स्टापडेमों के निर्माण में 90 फीसदी भ्रष्टाचार
जिस बुंदेलखंड पैकेज की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तारीफ कर चुके हैं, उसमें भ्रष्टाचार की परतें खुलती जा रही हैं। मुख्य तकनीकी परीक्षक से जांच कराई गई तो चौकाने वाले तथ्य सामने आए। निर्माण के दौरान वरिष्ठ अभियंताओं एवं राज्य स्तरीय क्वालिटी मानीटर द्वारा जारी निरीक्षण प्रतिवेदनों में निर्देशों का मैदानी अधिकारियों द्वारा पालन नहीं किया गया। अनुबंध की कंडिका 19 के अनुसार स्टाप डैम निर्माण में कार्य पूर्ण होने के बाद 2 वर्ष 45 दिन तक डिफेक्ट लायबिलिटी के तहत संबंधित ठेकेदार से निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद कार्यपालन यंत्री द्वारा सुधार कार्य कराया जाना था। जांच के दौरान पाया गया कि अधिकांश कार्यपालन यंत्री द्वारा इस अवधि में सुधार, मरम्मत कार्य के लिए कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। निर्माण के दौरान मैदानी अधिकारियों द्वारा समुचित ढंग से पर्यवेक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन का अभाव व ठेकेदार द्वारा मनमर्जी से कार्य किया जाना पाया गया। मध्यप्रदेश कार्य विभाग नियमावली की धारा 2 के पैरा 4.040 में दिए गए निर्देश के अनुरूप अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा किए गए मापों का सत्यापन नहीं किया गया। जिसके कारण भी निर्माण कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हुई है।
-धर्मेन्द्र सिंह कथूरिया