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कानून के साथ सोच भी बदले

सामूहिक बलात्कार नारी अस्मिता को तोडऩे के लिए होते हैं। स्त्री को भोग और दान समझने की प्रवृत्ति इसको बढ़ावा देने का काम करती है। ऐसे मामलों में समाज औरत को ही दोषी मानता है। अहिल्या से लेकर द्रौपदी तक तमाम उदाहरण धर्मग्रंथों में मौजूद हैं। वर्तमान समाज में फूलन देवी, बिलकीस बानो और निर्भया जैसे बहुत सारे ऐसे मामले हैं। इन तमाम घटनाओं के बाद भी समाज की सोच में बदलाव नहीं आता दिख रहा है। बलात्कार जैसे अपराध को कम करने के लिए सिर्फ सख्त कानून बनाने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि समाज को अपनी सोच भी बदलनी होगी।
सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए सबसे पहले उससे जुड़ी सोच को खत्म करने की जरूरत है। सामाजिक बुराई समाज से तब तक खत्म नहीं हो सकती जब तक उससे जुड़ी मानसिकता खत्म नहीं हो जाती। इसके लिए जरूरी है कि महिलाओं को बराबरी का हक दिया जाए। धर्म के नाम पर महिलाओं को जिस तरह से पीछे ढकेला जाता है, उस सोच को खत्म किया जाए। हमारे देश में प्रगतिशील न्याय व्यवस्था तो है पर अभी भी धर्म का शिकंजा इतना मजबूती से गले में पड़ा है कि हमें इससे छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। हम खुद को प्रगतिशील कहते हैं पर हमारा समाज प्रगतिशील नहीं है। बलात्कार कई बार पुरुषवादी सत्ता को कायम रखने के लिए किया जाता है।
सामूहिक बलात्कार की घटनाएं पुरुषवादी सोच को जाहिर करती हैं। ऐसे ज्यादातर मामले सबक सिखाने जैसी प्रवृत्ति को भी दिखाते हैं। गुजरात दंगों में बिलकीस बानो का मसला ऐसा ही बड़ा मसला था। जिसमें गर्भवती बिलकीस बानो का बलात्कार होता है। उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पेट से निकाल कर पत्थर पर पटक कर मार दिया गया। उसके परिवार के साथ बलात्कार और हत्या जैसा अपराध किया गया। ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जहां पर सबक सिखाने के लिए औरतों के साथ ऐसे जघन्य अपराध होते हैं। जातीय हिंसा और भेदभाव की घटनाओं में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते रहते हैं। उत्तर प्रदेश में कई साल पहले बेहमई कांड हुआ था। जहां फूलन देवी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। उसके बाद फूलन देवी दस्यू सरगना बनीं और अपने साथ हुए अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने सामूहिक नरसंहार किया।
फूलन देवी बाद में संसद की सदस्य भी बनीं। उन पर फिल्म से लेकर तमाम तरह की किताबें भी लिखी गईं। फूलन की ही तरह निर्भया मसले ने भी पूरे देश को झकझोर दिया। 1981 के फूलन देवी बलात्कार कांड से लेकर 2012 में निर्भया कांड तक एक जैसे ही हालात देखने को मिले। जिससे यह लगता है कि तमाम तरह के कानूनी झगड़ों और फैसलों के बाद भी समाज अपना दायित्व निभाने में सफल नहीं हो सका है। गुजरात दंगों की बिलकीस बानो को भी देखें तो यही सामने आता है। इन प्रमुख तीनों घटनाओं की पृष्ठभूमि भले ही अलग-अलग हो पर हालात एक जैसे ही थे। बलात्कार केवल नारी अस्मिता से जुड़ा है। पुरुष अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए इस तरह का कृत्य करते हैं।
बलात्कार में दोषी पुरुष होता है पर सजा अधिकतर औरत को ही मिलती है। गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ धोखा देने का काम इंद्र ने किया था लेकिन गौतम ऋषि ने सजा इंद्र के बजाय पत्नी अहिल्या को दी, उसको पत्थर की शिला में बदल दिया।
बलात्कार की शिकार औरतों के लिए समाज में मानसम्मान हासिल करना बहुत मुश्किल काम होता जा रहा है। बात केवल बलात्कार की शिकार लड़कियों की ही नहीं है। अगर लड़की से छेड़छाड़ की बात शादी के समय पता चलती है तो लोग उससे भी बचना ही चाहते हैं। बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं औरतों के चरित्र से जोड़कर देखी जाती हैं। असल में ये आपराधिक घटनाएं हैं। इनको अपराध की घटनाओं के रूप में ही देखा जाए तो मसले आसानी से सुलझ सकते हैं। इसके लिए कानून के साथ समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है।
महिलाओं के निजी मामलों में धर्म की दखल
धर्म नारी के निजी मामलों में दखल करता है। जिससे सबसे अधिक परेशानी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है। महिलाओं के कपड़ों से लेकर रहन सहन और आचार-विचार को तय करने का काम धर्म के ठेकेदार करते हैं। जिससे यह लगता है कि वह औरतों को अपने जाल में उलझा कर रखना चाहता है। बात केवल एक धर्म की ही नहीं है, हर धर्म में महिलाओं को हाशिए पर रखा जाता है। जबकि, यह दिखावा बार-बार किया जाता है कि धर्म महिलाओं को इज्जत देता है। असल में वह महिलाओं को बराबर का हक नहीं देता। धर्म के ठेकेदारों को यह लगता है कि अगर महिलाओं को बराबरी का हक मिल गया तो वे धर्म के आडंबर से बाहर हो जाएंगी, जिससे धर्म की उनकी सत्ता खतरे में पड़ जाएगी। तीन तलाक को लेकर केंद्र की भाजपा सरकार ने कदम उठाकर यह दिखाने की कोशिश की है कि इससे मुस्लिम औरतों के हालात बदल जाएंगे। तीन तलाक की ही तरह से हिंदू और दूसरे समुदाय की महिलाओं के मुद्दे भी हैं जिन में तलाक लेना बहुत मुश्किल काम होता है। ऐसे में बहुत तरह के दांपत्य अपराध होते हैं।
– ज्योत्सना अनूप यादव