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मौत की फसल क्यों …?

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आहवान पर देश भर में किसानों की आय 2022 तक दोगुना करने की रणनीति पर कार्य हो रहा है। हर प्रदेश की सरकार खेती को लाभ का धंधा बनाने में जुटी हुई है। लेकिन आजादी के 7 दशक बाद आज भी किसानों के खेत में मौत की फसल उग रही है। आखिर ऐसा क्यों? जिस देश की 68 फीसदी आबादी खेती और उससे संबंधित कार्यों में लगी हो, जहां की आय का बड़ा स्रोत खेती-किसानी है उस देश में किसानों की इतनी बदहाली क्यों? यह सवाल लगातार उठ रहा है और इसके समाधान के लिए बड़े-बड़े दावे सरकारों द्वारा किए जा रहे हैं। इन दावों के विपरीत किसान निरंतर कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। इससे उबरने का कोई रास्ता जब नहीं सूझता है तो वह या तो मौत को गले लगाता है या फिर आंदोलन पर उतारू हो जाता है।
जून के प्रारंभिक दिनों में तपती झुलसती गर्मी के बीच किसान जब अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरा तो पूरा देश सन्न रह गया। सरकारों को किसान हितैशी वादों की हकीकत सामने आ गई। महाराष्ट्र से लेकर मध्यप्रदेश तक आग ही आग नजर आने लगी। इस आग में पार्टियां अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने लगीं। यानी किसान के आंदोलन को नया रूप दिया जाने लगा और किसान राजनीति का शिकार होकर रह गया।
अगर मध्यप्रदेश के संदर्भ में बात करें तो यहां का किसान आंदोलन आश्चर्यजनक लगा। ऐसा नहीं कि यहां के किसानों के सामने समस्याएं नहीं हैं। लेकिन जिस राज्य को लगातार पांच कृषि कमर्ण अवार्ड मिले हों, जिस राज्य का सिंचाई का रकबा 2005 के साढ़े सात लाख हेक्टेयर से बढ़कर आज 36 लाख हेक्टेयर हो गया है, जहां किसानों को जीरो प्रतिशत ब्याज पर ऋण दिया गया, एक कदम आगे बढ़ते हुए यह निर्णय लिया गया एक लाख का ऋण लेने पर किसानों को 90 हजार ही लौटाने की व्यवस्था है, और जहां के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के संकल्प को साकार करने के लिये देश में सबसे पहले रोड-मेप तैयार किया वहां के किसानों का आंदोलन आश्चर्यजनक लगा। निश्चित रूप से यह इस बात का संकेत है कि यहां के किसान भी पूरे प्रदेश के किसानों की तरह कर्ज, बदहाली से दबा हुआ है।
वाकई यह चिंता का विषय है कि आजादी के 7 दशक बाद भी हम अपनी आबादी की 68 फीसदी जनता के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा सके। यही कारण है कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद किसानों की आत्महत्या रुक नहीं रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, साल 1995 से 2015 तक 3,18,528 भूमिपुत्रों ने असमय मौत को गले लगा लिया। इसी तरह 2001 से 2011 के बीच 90 लाख किसानों ने अपनी पुश्तैनी जायदाद छोड़ शहरों की ओर पलायन किया। एक अध्ययन के मुताबिक, हर रोज 2,000 से ज्यादा किसान रोजी-रोटी की आस में शहरों की ओर भाग रहे हैं। उन पर किसी मानवाधिकार आयोग या आतंकवाद पर आंसू बहाने वालों की नजर क्यों नहीं जाती?
देश में 12,000 किसान प्रति वर्ष फसल की बार्बादी, कर्ज की अधिकता, राजस्व वसूली और बैंकों के दबाव के कारण आत्महत्या को मजबूर होते हैं। आलम यह है कि कृषि के लिए ढ़ांचागत विकास न होने से किसानों की संख्या घट रही है। किसान अब मजबूर है।
किसानों के पास चारा क्या है!
देश में आजादी के बाद से लेकर आज तक किसानों की सबसे अधिक उपेक्षा हुई और किसानों की सबसे अधिक मौतें हुईं। किसान चाहे आत्महत्या से मरा हो या पुलिस ने उसे गोली मारी हो। मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस की गोली से करीब आधा दर्जन किसानों के मारे जाने के बाद लोगों को सरकार की प्राथमिकता समझ में आई और ‘जय जवान-जय किसानÓ के शाश्वत नारे की असलियत किसानों के खून के साथ बहती दिखाई पड़ी। दरअसल किसानों को हमेशा मोहरा बनाया गया है। मध्यप्रदेश के मंदसौर में जो किसान आंदोलन हुआ उसके पीछे अफीम माफिया का हाथ था। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस बात को स्वीकार किया है। दरअसल हमारा किसान अपनी समस्या में इतना बेहाल हो गया है कि उसे हर किसी ने बेवकूफ बनाया है। किसानों को सत्ता ने बेवकूफ बनाया, किसानों को नेताओं ने बेवकूफ बनाया और किसानों को किसान-नेताओं ने बेवकूफ बनाया। उद्योपतियों ने अपने उत्पाद की कीमत अपनी मर्जी से तय करने का अधिकार ले लिया, लेकिन किसान आज तक अपने उत्पाद की कीमत खुद तय नहीं कर पाया। आज भी किसान के उत्पाद की कीमत बिचौलिए तय करते हैं और लाभ कमाते हैं।
आंदोलन का चौंकाने वाला पहलू
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के हालिया किसान आंदोलन का एक चौंकाने वाला पहलू है। बरसों आपदा झेल रहे महाराष्ट्र के विदर्भ, मराठवाड़ा या मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड से यह आंदोलन शुरू नहीं हुआ, न ही इस आंदोलन में कोई धमक वहां सुनायी दी। यह आंदोलन अपेक्षाकृत संपन्न मध्य प्रदेश के मालवा और पश्चिम महाराष्ट्र से शुरू हुआ, जहां के किसानों की सामान्यतया हालत बेहतर है। महाराष्ट्र के नासिक, अहमदनगर, पुणे, सतारा, सांगली, कोल्हापुर फलों और प्याज के लिए देशभर में जाना जाता है। यहां अंगूर, अनार, प्याज जैसी कमाऊ उपज होती है।
यहां का दुग्ध व्यवसाय भी काफी उन्नत है। पश्चिमी मध्यप्रदेश में मालवा क्षेत्र पग-पग रोटी, डग-डग नीर के लिए ख्यात है। रतलाम, मंदसौर, नीमच अफीम की खेती के लिए दुनिया भर में जाना-पहचाना नाम है। सोयाबीन, गेहूं और चने की खेती के अलावा यहां मेथी, धनिया, जीरा, लहुसन, प्याज आदि की खेती भारी मात्रा में होती है। पर इस बार बंपर उत्पादन और नगदी के संकट के कारण यहां अनेक उपजों के दामों में भारी गिरावाट आई। प्याज की व्यथा-कथा से बंपर पैदावार के संकट को आसानी से समझा जा सकता है। देश की सबसे बड़ी प्याज मंडी नासिक के लासलगांव मंडी में प्याज के भाव 450 रुपए प्रति क्विंटल तक गिर गए जो पिछले साल 800 रुपए प्रति क्विंटल थे। मध्य प्रदेश में भी पहले सरकार 600 रुपए प्रति क्विंटल में खरीद से आनाकानी करती रही है।
अब किसान आंदोलन के बाद मध्य प्रदेश सरकार 800 रुपए प्रति क्विंटल प्याज खरीद पर राजी हुई है। पर अब तक 30-40 फीसदी प्याज की उपज खरीद योग्य नहीं रह गई होगी, क्योंकि गरमी में प्याज बहुत जल्दी अपनी नमी खो देती है। सोयाबीन के दाम भी गिर कर 27-28 सौ रुपए प्रति क्विंटल रह गए जो पिछले साल 35-36 सौ रुपए प्रति क्विंटल था। यह व्यथा अंगूर पैदावार की भी है। पिछले साल अंगूर का भाव 50 रुपए प्रति किलोग्राम था जो इस बार गिरकर 15 रुपए प्रति किलोग्राम तक गिर गए। देश के अन्य हिस्सों से भी उपज के भावों में गिरावट की खबरें आ रही हैं।
फसलों की न्यूनतम कीमत नहीं
देश-प्रदेश में किसान हित के दावे तो खूब होते हैं, लेकिन आज तक सरकारों ने फसलों की न्यूनतम कीमत तय नहीं की और किसान अपने उत्पाद खेतों में ही छोड़ कर उसी खेत में फांसी लगा लेने पर विवश होते रहे। मध्य प्रदेश देश का इकलौता राज्य है जहां पिछले दस साल से कृषि विकास की दर दहाई के आंकड़े में है। इसके बावजूद किसान आंदोलित है। मध्य प्रदेश की समस्या पिछले सत्तर सालों में किसानों को लेकर होने वाली राजनीति का ज्वलंत उदाहरण है। देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता राहुल गांधी किसानों की समस्या का एक ही हल जानते हैं और वह है कर्ज माफी। इससे पता चलता है कि उन्हें किसानों और कृषि क्षेत्र की समस्या की कोई समझ नहीं है। उन्होंने कभी यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि 2008 में हुई कर्ज माफी का किसान की हालत पर क्या असर पड़ा? मध्य प्रदेश की समस्या कृषि क्षेत्र के बारे में प्रशासनिक अव्यवस्था का भी उदाहरण है। सरकार ने अरहर की दाल का समर्थन मूल्य बढ़ाकर पांच हजार पचास रुपये कर दिया। इसके साथ ही मोजांबिक से भी दाल आयात कर ली। नतीजा यह हुआ कि बाजार में भाव गिर गया। समर्थन मूल्य पर कोई खरीदने को तैयार नहीं था। किसानों ने शिकायत की तो सरकार ने घोषणा कर दी कि समर्थन मूल्य से कम पर खरीदना गैर कानूनी होगा। व्यापारियों ने खरीदना बंद कर दिया, किसान और कठिनाई में फंस गया। न सरकार खरीद रही थी और न व्यापारी।
किसानों के आंदोलन ने जब उग्र रूप धारण किया तब दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों शिवराज सिंह चौहान और देवेंद्र फडऩवीस ने किसानों की उपज की वाजिब कीमत निर्धारित करने, कर्जा माफ करने व अन्य मांगों पर काम करने का धड़ाधड़ संदेश देना शुरू किया। इसके लिए दोनों मुख्यमंत्रियों ने ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों का सहारा लिया। शिवराज ने ट्विटर पर कहा कि तीन-चार दिन के अंदर आठ रुपए किलो की दर से प्याज की खरीद शुरू हो जाएगी और महीने के अंत तक जारी रहेगी।
मर्ज नहीं लक्षण का उपचार
बीमारी पता हो और उसका इलाज भी, फिर भी बीमारी बनी रहे तो इसे क्या कहेंगे? अपने देश में किसानों और खेतीबाड़ी के साथ यही हो रहा है। पिछले सात दशक से किसान को इंतजार है ऐसी सरकार का जो उसके मर्ज का इलाज करे, लक्षण का नहीं। समस्या इतनी सी है कि किसान फसल उपजाने के लिए जितना खर्च करता है उसे बेचकर उतना भी नहीं कमा पाता। सरकारों का आलम यह है कि सिर ढ़ंकती हैं तो पैर निकल आता है। हरित क्रांति आई तो देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो गया। अब दूसरी हरित क्रांति की बात हो रही है। वह भी आ जाएगी पर किसान भूखा रहे, आत्महत्या करे या गोली खाए, यही उसका प्रारब्ध बन गया है। खेती घाटे का सौदा बन गई है। किसान खेती छोडऩा चाहता है, पर छूट नहीं रही, क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है। उसे मुनाफे में लाने के लिए फूड प्रोसेसिंग को युद्ध स्तर पर बढ़ावा देने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। अपने देश की अर्थव्यवस्था में तरह-तरह के विरोधाभास हैं। किसान अपनी उपज बढ़ाता है तो सूखे या किसी प्राकृतिक आपदा के समय से भी ज्यादा दुर्गति को प्राप्त होता है।