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भारत का मददगार कौन ट्रंप या हिलेरी?

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के मतदान के दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, ये बहस तेज होती जा रही है कि ट्रंप या हिलेरी? ट्रंप पिछड़ रहे हैं, लेकिन पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। अमेरिका के चुनाव पर पूरी दुनिया की नजर टिकी है, भारत का चिंतित होना भी स्वाभाविक है। क्योंकि भारत और अमेरिका के संबंधों का विश्वमंच पर खासा असर पडऩे वाला है। इसलिए भारत में भी इस बात को लेकर चर्चा जोरों पर है कि भारत का मददगार कौन साबित होगा ट्रंप या हिलेरी।
ट्रंप सत्ता में आते ही एच-1बी वीजा पर कार्य करने वाले कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन बढ़ाने की बात कर रहे हैं, लेकिन यह भारतीयों पेशेवरों के लिए नौकरी छिनने जैसा होगा। अभी तक कंपनियां अमेरिकी वेतन मापदंड की अवहेलना करते हुए कम पैसों पर भारतीय आईटी पेशेवर को काम पर रखती हैं। न्यूनतम वेतन के बढ़ते ही कंपनियां भारतीयों के मुकाबले अमेरिकी युवकों को रखने पर प्राथमिकता देगी, जिससे भारतीय आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री में भूचाल आ सकता है। इससे हजारों नौकरियां जाएंगी। कंपनियों की बैलेंस शीट चरमराएगी और भारत अमेरिकी संबंधों पर असर पड़ेगा। ट्रंप अपनी आव्रजन नीति का खुलासा करते हुए कह चुके हैं कि चीन और मैक्सिकन प्रोफेशनल को अमेरिकी नौकरियां लूटने से बचाने के लिए वो सीमा पर चीन से बड़ी दीवार बनवा देंगे। लेकिन ये आशंका तभी सच साबित होगी, जब ट्रंप सत्ता में आएंगे।
हिलेरी भारत के लिए एच-1 बी वीजा के महत्व को समझती हैं। हिलेरी क्लिंटन सीनेट इंडिया फोरम का नेतृत्व करते हुए टाटा कंसल्टेन्सी के साथ काम कर चुकी हैं। यानी हिलेरी के राष्ट्रपति बनने पर वीजा भी मिलेगा और नौकरी भी। अमेरिका में काम करने के इच्छुक हर भारतीयों का सपना ग्रीन कार्ड यानी स्थायी नागरिकता का पाना होता है। चीन के 3 लाख छात्रों के बाद दूसरे नंबर पर 1 लाख 32 हजार भारतीय छात्र अमेरिकी कॉलेजों में पढऩे हिन्दुस्तान से अमेरिका जाते हैं। हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों से विज्ञान, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, गणित में मास्टर्स और पीएचडी की पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को स्वत: ग्रीन कार्ड मिल जाने का वायदा किया है। इससे ढेर सारे भारतीयों छात्रों की लॉटरी खुल सकती है। लेकिन अमेरिका में नौकरियों की बाढ़ लाने का सपना दिखा रहे ट्रंप विदेशी प्रोफेशनल को नया ग्रीन कार्ड जारी करने के सख्त खिलाफ हैं। उनकी प्राथमिकता विदेशियों को रोजगार और घर देने की बजाए बेरोजगार अमेरिकी युवकों को रोजगार देने की है। हिलेरी ने वायदा किया है कि पारिवारिक वीजा के वर्षों से लंबित मामलों को वो जल्दी निपटाएंगी। 40 प्रतिशत से ज्यादा लंबित मामले एशिया से है, जिसमें अप्रवासी भारतीय परिवारों की बड़ी संख्या है। हिलेरी ने तो पर्यटन वीजा को जनवरी, 2017 से सरल बनाने का वायदा किया है। हेलरी के एजेंडे में वीजा ऑन एराइवल भी शामिल है । लेकिन ट्रंप के एजेंडे में बिछुड़े अप्रवासी परिवारों को मिलाने का कोई इरादा नहीं है।
हिलेरी ने वायदा किया है कि तकनीक के क्षेत्र में स्टार्टअप शुरू करने वाले विदेशियों को अलग कैटेगिरी में वीजा दिया जाएगा। सिलिकॉन वैली में स्टार्टअप शुरू करने वाले भारतीयों के लिए यह एक बड़े अवसर की तरह है। 1 बिलियन डॉलर की पूंजी वाले 87 स्टार्टअप कंपनियों में 44 कंपनियां अप्रवासियों के द्वारा शुरू की गई है। ट्रंप का अप्रवासियों के लिए दरवाजा तकरीबन बंद है। अमेरिकी चुनाव के नतीजों का एक बड़ा प्रभाव भारतीय दवा उद्योग पर पडऩा तय है। भारतीय दवा कंपनियों के लिए अमेरिका एक बड़ा बाजार है। दवा में इस्तेमाल होने वाली 80 प्रतिशत खुदरा सामग्री अमेरिका को भारत और चीन की दवा कंपनियां निर्यात करती हैं। अत: इस चुनाव के परिणाम भारत को प्रभावित करेंगे। ऐसे में भारत की नजर अमेरिकी चुनाव पर लगी हुई है।
मेक इन
इंडिया को लग सकता है झटका?
अमेरिकी चुनाव का एक बड़ा असर प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी योजना मेक इन इंडिया पर पड़ सकता है। दोनों ही प्रत्याशी कम से कम इस मुद्दे पर सहमत हैं कि मैन्युफैक्चरिंग में तेजी कैसे लाई जाए। ट्रंप और हिलेरी के चुनावी कैंपैन का यह एक प्रमुख मुद्दा है। 2000 से जनवरी 2014 के बीच 5 मिलियन अमेरिकियों ने उत्पादन क्षेत्र की नौकरियां खोई हैं। ‘मेक इन इंडियाÓ कार्यक्रम में निवेश करने वाली अमेरिकी कंपनी इन नीतियों के बाद अपने कदम पीछे खींच सकती है, जिससे भारत में नौकरियों के अवसर बढऩे की संभावनाओं पर विपरीत असर पड़ेगा। कहते हैं कि वैश्वीकरण के दौर में कूटनीति उसी की प्रभावी है, जिसकी आर्थिक व्यवस्था भी वजनी हो। वल्र्ड बैंक के मुताबिक, विश्व में भारतीय अर्थव्यवस्था ही उम्मीदों की पूंजी है और दो दशकों तक भारत के इस विकास दर से बढऩे की संभावना है। हिलेरी के भारतीय सत्ता तंत्र से निकटता के बाद भी अगर ट्रंप तमाम स्कैंडलों के बाद जीतकर चीन और पाकिस्तान को आर्थिक बेडिय़ों में बांध दें, तो वो भारत के लिए फायदे का कारोबार होगा या घाटे का?
-सिद्धार्थ पाण्डे