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माफिया के कब्जे में गरीबों का अनाज

उत्तर प्रदेश में गरीबों को मिलने वाला राशन माफिया डकार रहे हैं और शासन और प्रशासन मूक बना हुआ है। आलम यह है कि इस प्रदेश में राशन कार्ड तो केवल पता प्रमाणपत्र के तौर पर ही उपयोग किया जा रहा है। यहां के लोगों को मालुम ही नहीं है कि उनके लिए सरकार कोटे में क्या-क्या दे रही है। गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) का पीले रंग वाला राशन कार्ड तो केवल दिखावा मात्र बनकर रह गया है। गोरखपुर में पौने चार लाख से अधिक एपीएल कार्ड धारक सरकारी अनाज वितरण की यही विडंबना झेल रहे हैं। आलम यह है कि मार्च 2012 से तीन साल तक एपीएल गेहूं के आवंटन में जमकर धांधली हुई है। केंद्र सरकार ने गोरखपुर जिले के कुल सवा पांच लाख से अधिक एपीएल कार्ड धारकों के लिए हर महीने करीब 2400 मीट्रिक टन गेहूं का आवंटन किया। जिला पूर्ति कार्यालय ने इस गेहूं को शहरी इलाकों के 1.60 लाख कार्ड धारकों के लिए आवंटित कर दिया। गांव के सवा तीन लाख एपीएल कार्ड धारक गेहूं का मुंह ताकते रहे और उनके हिस्से के अनाज से कागजों में शहरी कार्ड धारकों का पेट भरता रहा।
गरीबों और जरूरतमंदों को सस्ती दर पर अनाज मुहैया कराने की राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को घुन लग गया है। पिछले छह महीने के दौरान प्रदेश की कई जगहों पर पीडीएस अनाज की चोरी या घोटाले के मामले सामने आए हैं। (देखें बॉक्स) इसी बीच मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सूबे में खाद्य एवं सुरक्षा अधिनियम-2013 के पहले चरण को लागू करने की अनुमति देकर अपनी ही सरकार की चुनौती बढ़ा दी है।
नेता-अफसर-माफिया गठजोड़
सीतापुर के जिला आपूर्ति अधिकारी रहे सतीश चंद्र मिश्र के लखनऊ स्थित आवास पर सीबीआइ ने 1 सितंबर को अचानक छापेमारी की। इसी साल 31 जुलाई को खाद्य एवं रसद विभाग से सेवानिवृत्त होने वाले मिश्र के घर से सीबीआइ को 70 लाख रु। नकद के साथ काले धन से खरीदी गई कई संपत्ति की जानकारी भी मिली। सीबीआइ ने यह कार्रवाई 2005 से 2009 के बीच हुए अनाज घोटाले के पड़ताल की सिलसिले में की। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही इस कार्रवाई में नेता-अफसर-माफिया के गठजोड़ से प्रदेश में अनाज घोटाला होने पर से परदा उठ चुका है। इस घोटाले में कांग्रेस के नेता दलजीत सिंह, सपा सरकार में राज्यमंत्री पंडित सिंह, सपा के पूर्व विधायक ओम प्रकाश गुप्ता समेत कई नेता आरोपी बनाए जा चुके हैं। सपा सरकार में एक बार फिर अनाज घोटाले की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है। नेताओं, अफसरों और माफिया का गठजोड़ गरीबों का अनाज हड़पने में जुट गया है। पिछले एक वर्ष के दौरान प्रदेश के करीब हर जिले की पीडीएस में गड़बड़ी की शिकायत मिली है। पीडीएस में गड़बडिय़ों के खिलाफ लड़ रहे गोरखपुर के सामाजिक कार्यकर्ता संजीव मिश्र बताते हैं, गोरखपुर में अनाज माफिया और अफसरों का गठजोड़ नियमित आवंटन वाला हजारों मीट्रिक टन एपीएल गेहूं हड़प चुका है। शिकायत करने पर ये अधिकारी बड़ी चतुराई से नियमित की बजाए केंद्र से हर महीने मिलने वाले अतिरिक्त गेहूं का वितरण दिखाकर बचने की जुगत लगा रहे हैं।
निशाने पर एपीएल गेहूं
दस साल पहले सूबे में हुए अनाज घोटाले में भी सबसे ज्यादा एपीएल गेहूं की ही चोरी हुई थी। इस बार भी कुछ ऐसा ही है। असल में एपीएल राशन कार्डों पर वितरण के आवंटित होने वाले गेहूं के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं है। अनाज माफिया इसी का फायदा उठाता है और कदम-कदम पर अनाज की लूट होती है। खाद्य व रसद विभाग से सेवानिवृत्त हुए अधिकारी एसके वर्मा बताते हैं, शहर में एपीएल कार्ड धारक सबसे कम राशन की दुकानों पर जाते हैं जबकि अंत्योदय के लाल राशन कार्ड और गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) वालों के लिए बने सफेद राशन कार्ड पर खाद्यान्न की मांग शहर और गांव में एक समान होती है। इसलिए पीडीएस के जरिए शहर में एपीएल अनाज की बिक्री कर घोटाले को अंजाम दिया जाता है।  खाद्य एवं रसद विभाग के एक मानक के अनुसार, एक एपीएल राशन कार्ड पर 10 किलो से अधिक अनाज नहीं दिया जाएगा। अब जरा गोरखपुर का वाकया देखिए। यहां अप्रैल, 2013 में 2,393 मीट्रिक टन गेहूं शहरी क्षेत्र के कुल 1,60,969 एपीएल कार्ड धारकों को बांट दिया गया। अगर यह मान लिया जाए कि गोरखपुर के शहरी इलाके में रहने वाला हर एपीएल कार्ड धारक सरकारी कोटे की दुकान पर राशन लेने आया हो तो एक कार्ड पर 14 किलो गेहूं बंटा होगा जो स्वयं में ही मानक का उल्लंघन है। संजीव मिश्र बताते हैं, गोरखपुर शहर में रहने वाले 60 फीसदी से ज्यादा एपीएल राशन कार्ड धारक गेहूं लेने सरकारी गल्ले की दुकान पर जाते ही नहीं हैं। यही नहीं अनाज की बोरियों के जरिए भी खेल हो रहा है। खाद्य एवं रसद विभाग को अनाज रखने के लिए कोलकाता से बोरों की सप्लाई होती है। इन पर कंपनी का नाम, वर्ष और यूपी सरकार लिखा होता है। बरेली में करीब ढाई हजार बोरों पर कोई मार्का नहीं था और इन्हीं के जरिए अनाज को राइस मिलों को बेचने की बात भी पिछले सामने आई थी। धांधली करने वालों के ऐसे खेल को रोकने के लिए खाद्य और रसद विभाग चरमराए तंत्र से निगरानी कर रहा है। ब्लॉक स्तर पर तैनात होने वाले मार्केटिंग इंस्पेक्टर के 1,133 पद हैं जिनमें 40 प्रतिशत से ज्यादा खाली पड़े हुए हैं। इनके उपर तहसील पर एरिया मार्केटिंग अफसरों के 468 पद हैं जिनमें केवल 300 ही भरे हुए हैं। यही हालात सप्लाई इंस्पेक्टर और जिला पूर्ति अधिकारियों के भी हैं।
-लखनऊ से मधु आलोक निगम