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सियासत का अखाड़ा बनी दादरी

सरताज का कहना है कि देश में सारे लोग बुरे नहीं हैं। अपने पिता की मौत के बाद देशभर में उपजी तनाव की स्थिति को वह खत्म करना चाहता है। सरताज ने देशवासियों से अपील की है कि शांति बनाए रखें। गौरतलब है कि 50 साल के सरताज के पिता अखलाक को गोमांस खाने के आरोप में तकरीबन 100 लोगों ने घर से निकालकर ईंट-पत्थरों और लाठियों से बुरी तरह पीट-पीट कर मार डाला था। देशभर में तनाव सी स्थिति है, इस सब के बीच मृतक के बेटे सरताज ने कहा है कि, मैं नहीं मानता हूं कि देश के सभी लोग बुरे हैं, कुछ लोगों के बुरे होने की वजह से देश के सभी नागरिक को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। सरताज ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि, मेरे पिता अखलाक की हत्या के बाद राजनीति भी हो रही है। मैं नेताओं को आने के लिए मना नहीं कर रहा हूं। लेकिन, यह चाहता हूं कि इस संवेदनशील मुद्दे पर नेता राजनीति ना करें।
इसे इस देश की सियासत की क्रूर व्यापकता कहें या हमारे सियासतदारों की संवेदनहीनता कि यहां भूखे आदमी की रोटी से लेकर मुर्दा आदमी के कफन तक कहीं भी सियासत शुरू हो जाती है। जहां कहीं भी वोटों की गुंजाइश दिखी नहीं कि हमारे सियासतदां मांस के टुकड़े पर गिद्धों के झुंड की तरह टूट पड़ते हैं। ताजा मामला दादरी का है। विगत दिनों उत्तर प्रदेश के दादरी में एक भीड़ जिसे समुदाय विशेष की कहा जा रहा है, द्वारा कथित तौर पर गोमांस खाने के लिए 50 वर्षीय व्यक्ति इखलाक की हत्या का मामला सामने आया। एक नजर में यह यूं तो एक बड़े प्रदेश के एक छोटे-से जिले का एक हत्या का मामला भर था, लेकिन कुछ दिनों में बड़े ही अप्रत्याशित ढंग से यह राष्ट्रीय पटल पर छा गया। प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से पीडि़त परिवार ने मुलाकात की जिसके बाद उन्होंने तुरंत ही न केवल दोषियों को पकड़कर कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का भरोसा दिलाया, वरन पीडि़त परिवार को दस लाख रूपये की आर्थिक सहायता का ऐलान भी कर दिए। अब यह आर्थिक सहायता किस आधार पर दी जा रही है, इसपर उन्होंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि यह न तो किसी प्राकृतिक आपदा का मामला है, न ही किसी दुर्घटना का और न ही किसी सामूहिक दंगा-फसाद का; यह तो सीधा-सीधा एक हत्या का मामला है। लिहाजा इसमें मुआवजा या आर्थिक सहायता देने का कोई प्रावधान तो नहीं बनता है। पीडि़त परिवार को सहायता देना कत्तई गलत नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किस एवज में उन्होंने इस आर्थिक सहायता का ऐलान किया है। उन्हें बताना चाहिए कि क्या प्रदेश में अब हत्या होने पर भी आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था शुरू कर दी गई है? या इस मामले को वे हत्या से इतर कुछ और मानते हैं? बहरहाल, मामला मुख्यमंत्री के संवेदनशील होने और प्रदेश के नेताओं तक ही सीमित नहीं रहा, वरन जल्दी-ही राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े नेता भी दादरी पहुंचकर पीडि़त परिवार के प्रति संवेदना जताने लगे। भाजपा नेता और केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, एआईएमआईएम अध्यक्ष असद्दुदीन ओवैसी, आप संयोजक अरविन्द केजरीवाल जैसे राष्ट्रीय पटल के नेता दादरी पहुंचकर पीडि़त  परिवार के प्रति संवेदन जताते हुए अपनी-अपनी राजनीतिक भाषा में इस मामले का विश्लेषण करने लगे। भाजपा नेता महेश शर्मा इस मामले को गलतफहमी में हुआ एक हादसा बता दिए और यह भी कि इस पर किसको राजनीति नहीं करने देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि पीडि़त परिवार की रक्षा हिन्दू परिवार ही करेंगे। इन बातों पर राजनीतिक गलियारे में उन पर काफी निशाने साधे गए; यहां तक कि सपा नेता शिवपाल यादव ने तो इस हत्या को भाजपा और आरएसएस की साजिश तक बता डाला, लेकिन महेश शर्मा अपने बयान पर कायम रहे। दरअसल, यह मामला एक अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति की हत्या का है, जिसमे कि देश के बहुसंख्यक समुदाय जो भाजपा की राजनीति का आधार रहा है, के लोगों को आरोपी माना जा रहा है।  इसलिए भाजपा नेता महेश शर्मा को ऐसा बयान देना था कि सब संतुष्ट हो जाएं। संभवत: ऐसा करने के लिए उन्हें ऊपर से अनुमति हो, सो इससे पीछे हटने का कोई प्रश्न ही नहीं है। ऐसे ही एक दूसरे धुरंधर असद्दुदीन ओवैसी साहब ने महेश शर्मा से पहले ही दादरी पहुंचकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए अपने  बयानों के जरिये आग लगाने की कवायद शुरू कर दी। उन्होंने विभिन्न प्रकार से इसे धार्मिक रंग देने की कोशिश की तथा कहा कि यह कोई हादसा नहीं, सोची-समझी रणनीति के तहत कराई गयी हत्या है। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा इस मामले पर कुछ न कहने के लिए प्रधानमंत्री पर भी निशाना साधा।
-मुंबई से ऋतेन्द्र माथुर