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अनिश्चितता की धुंध से निकलते मोदी

भारतीय जनता पार्टी के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अनिश्चितता की धुंध को छांटने में लगे हुए हैं। हाल ही में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद के महाधिवेशन के दौरान मोदी के अभूतपूर्व स्वागत से इस बात के स्पष्ट संकेत मिले हैं कि मोदी निर्विवाद रूप से भारतीय जनता पार्टी के सर्वाधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली नेता बन चुके हैं। मोदी की ताजपोशी भाजपा के लिए भले ही एक पहेली हो लेकिन भाजपा का आम कार्यकर्ता मोदी को ही अपना सिरमौर मान रहा है। कुछ समय पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक सर्वेक्षण करवाया था, जिसका सार यह है कि यदि नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर और प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करते हुए चुनाव लड़ा जाता है तो भारतीय जनता पार्टी के 180 सीटें मिल सकती है, लेकिन इसमें दुविधा यह है कि यदि मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनते हैं तो बाकी 100 सदस्यों का समर्थन जुटाना बहुत कठिन होगा। शिवसेना और अकाली दल को छोड़कर कोई भी राजनीतिक दल भाजपा से गठजोड़ नहीं करना चाहेगा। क्योंकि अन्य सभी राजनीतिक दलों का मुस्लिमों के बीच बचा खुचा जनाधार भी खत्म हो सकता है। हालांकि यह भी तथ्य है कि मोदी के बगैर चुनाव लडऩे पर भाजपा मात्र 150 सीटें ही ला सकती है। 150 सीटों के दम पर सरकार बनाना लगभग उतना ही कठिन होगा किंतु तब शायद सहयोगी मिल सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस आंकलन को भारतीय जनता पार्टी में पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जा रहा है। ऑफ द रिकार्ड मोदी समर्थक नेता यह कहने लगे हैं कि यदि 150 सीटें आती हैं तो सरकार बनना भी संभव नहीं रहेगा क्योंकि तब समाजवादी या बहुजन समाज पार्टी में से किसी एक का दामन थामना अवश्यंभावी हो जाएगा और ये दोनों दल उतने ही अविश्वसनीय हैं जितने कि तृणमूल तथा अन्नाद्रमुक। अन्नाद्रमुक को लेकर एक दुविधा और यह है कि तमिलनाडु में पांच-पांच वर्ष के अंतर से सत्ता परिवर्तन हो जाता है। लोकसभा में भी कई बार इस परिवर्तन की झलक देखने को मिलती है। इस बार संभव है कि जयललिता के मुकाबले करुणानिधि को अधिक पसंद किया जाए। ऐसे हालात में जयललिता के साथ गठबंधन भारतीय जनता पार्टी को महंगा भी पड़ सकता है। इसीलिए मोदी के अभूतपूर्व स्वागत के बावजूद अभी भी भारतीय जनता पार्टी में उनकी उम्मीदवारी को लेकर मंथन जारी है। हालांकि मोदी समर्थकों का कहना है कि 180 सीट लेकर विपक्ष में बैठना भी किसी बड़ी ताकत से कम नहीं होगा। इसका फायदा भविष्य में अवश्य मिलेगा। नेताप्रतिपक्ष रहते हुए भी मोदी भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता में इजाफा कर सकते हैं। लेकिन स्वयं मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में आगे आने को लालायित नहीं हैं उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट कहा कि भाजपा में व्यक्ति का नहीं संगठन का महत्व है। इसीलिए प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी कौन होगा इसका महत्व नहीं है। मोदी के इस कथन से कई अर्थ निकलते हैं कहीं न कहीं वे भी धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता की लड़ाई को केंद्र में लाने से झिझक रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एनडीए को तोडऩा मोदी शायद गवारा न करें। इसीलिए यद्यपि भारतीय जनता पार्टी में मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने पर करीब-करीब सहमति बन चुकी है तथापि भाजपा इससे पहले सहयोगियों को विश्वास में लेना चाहती है। ममता, जयललिता शायद राजी भी हो जाएं किंतु सबसे बड़ी परेशानी जनतादल यूनाइटेड की तरफ से पैदा हो सकती है। सुषमा स्वराज को जनतादल यूनाइटेड को मनाने का दायित्व सौंपा गया है पर प्रश्न यह भी है कि स्वराज स्वयं प्रधानमंत्री पद के रूप में उभरकर सामने आई हैं। लालकृष्ण आडवाणी ने भाजपा राष्ट्रीय परिषद के महाधिवेशन में समापन सत्र के दौरान जिस तरह सुषमा स्वराज का गुणगान किया वह बहुत महत्वपूर्ण है। आडवाणी ने सुषमा स्वराज की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से करके यह संकेत तो दे ही दिया है कि सुषमा स्वराज वाजपेयी की तरह भारतीय जनता पार्टी के अतिरिक्त अन्य दलों को भी स्वीकार्य रहेंगी। सुषमा स्वराज और मोदी में यही बुनियादी अंतर है। इसे देखकर अयोध्या आंदोलन के समय के लालकृष्ण आडवाणी की याद आ रही है जो पार्टी में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता होते हुए भी वक्त आने पर प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं बन सके। क्योंकि उन्हें सहयोगी दलों ने स्वीकार नहीं किया था। आडवाणी के ऊपर 1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने की साजिश में शामिल होने का आरोप था। जब कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया उसके बाद ही आडवाणी को एनडीए में बतौर प्रधानमंत्री प्रत्याशी स्वीकार किया गया। किंतु तब तक पानी बहुत बह चुका था। जिन्ना की मजार पर मत्था टेकने के बावजूद आडवाणी को भारतीय मुसलमान स्वीकार नहीं कर पाया है। नरेंद्र मोदी इस सच्चाई से वाकिफ हैं इसीलिए वे खुलकर अपने आपको बतौर प्रत्याशी प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं, बल्कि उससे पहले अपनी छवि एक विकासवादी नेता की बनाना चाहते हैं। लेकिन इस छवि निर्माण के फेर में असली समय निकला जा रहा है। देश में जो भी सर्वेक्षण हुए हैं उनके मुताबिक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में पहली पसंद उभरकर सामने आए हैं। पूर्व-पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी जगह मोदी ही मोदी छाए हुए हैं। शायद इसी कारण  अधिवेशन के दौरान मोदी का भाषण किसी मुख्यमंत्री के बजाय राष्ट्रीय नेता की तरह था। एक तरफ जहां उन्होंने सोनिया, राहुल, मनमोहन पर निशाने साधे, वहीं कांग्रेस में उपेक्षित नेताओं पर डोरे भी डाले। अधिवेशन के आखिरी दिन मोदी का भाषण करीब 1 घंटे चला। इस दौरान वे केवल राष्ट्रीय मुद्दों पर ही बोले। जबकि दूसरे मुख्यमंत्रियों- शिवराजसिंह चौहान, रमन सिंह ने अपने राज्य की उपलब्धियां गिनाईं। कांग्रेस की बजाय मोदी के निशाने पर सोनिया, राहुल और मनमोहन सिंह ही थे। मनमोहन को कमजोर प्रधानमंत्री बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रणब प्रधानमंत्री बनते तो देश ज्यादा तरक्की करता। कांग्रेस को दीमक की तरह बताते हुए मोदी ने कहा कि कांग्रेस पूरे देश को खोखला कर रही है। पार्टी के अन्य नेताओं के भाषण भी मोदी के ईर्द-गिर्द ही रहे। बहरहाल, भाजपा के बयानों, कांग्रेस की टिप्पणियों से साफ हो गया है कि 2014 के चुनाव के लिए भाजपा अपना नेता तय कर चुकी है। मोदी को राहत देते हुए दारूल ऊलूम देवबंद के पूर्व वाइस चांसलर गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने भी कहा है कि देश की जनता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनती है तो इसमें मुस्लिमों को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा भी अन्य वजहें हैं जो मोदी को बीजेपी में और अधिक ताकतवर बनाई हुई हैं।  गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बीजेपी की राज्य ईकाई अचानक मजबूत हो गई थी। पहला, मोदी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की थी और उनके पास बदलावों को अंजाम देने के लिए पर्याप्त समय भी थी।  मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी एक और जीत ने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में उनके कद को बढ़ा दिया था। इसके अलावा उनकी दबंग छवि ने ताकत को केंद्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसकी वजह से बीजेपी की गुजरात इकाई पार्टी की राष्ट्रीय इकाई और संघ परिवार के दूसरे संगठनों की तुलना में अधिक शक्तिशाली और मजबूत हो गई थी। ताकत का यह केंद्रीकरण बीजेपी के अन्य कई नेताओं, राज्यों के मंत्रियों, सांसदों और पार्टी कार्यकर्ताओं में भी घर कर गया था जो कुछ लोगों के लिए पार्टी छोडऩे का कारण भी बना। इस तरह से मोदी पार्टी के मूल सांगठनिक ढांचे को धीरे-धीरे नेस्तानाबूत कर चुके हैं और उसे अपने इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। केंद्र या किसी राज्य में उनके मुकाबले पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसके पास ऐसा जनाधार हो।  2007 में वाइब्रेंट गुजरात समिट में रतन टाटा ने उन्हें पीएम उम्मीदवार बता कर की थी। तब से वह उद्योगपतियों के पसंदीदा पीएम उम्मीदवार, कई सर्वे में दूसरे नेताओं से आगे रहकर, अमेरिका की तारीफ पाकर और हाल के विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत पाकर लगातार केंद्रीय राजनीति की चर्चा में बने हुए हैं। मोदी का बढ़ता कद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ उनके संबंधों पर सीधा असर डाल रहा है। राज्य में विकास की छवि के दम पर मोदी लगातार तीन चुनाव जीतने वाले बीजेपी के पहले सीएम हैं लेकिन राज्य में पार्टी में नंबर दो की पोजीशन पर कौन है ये कहा नहीं जा सकता है। अगर मोदी एनडीए के पीएम उम्मीदवार बनकर केंद्रीय राजनीति में आते हैं तो मोदी की जगह पर गुजरात का सीएम कौन होगा, वहां की बीजेपी का क्या होगा और गुजरात की राजनीति में मोदी की क्या भूमिका रहेगी इस पर जवाब साफ नहीं हैं। गुजरात सरकार बीजेपी संगठन के मूलभूत सिद्धातों पर नहीं मोदी के नेतृत्व और प्रभाव के दम पर खड़ी है। गुजरात विधानसभा के चुनाव प्रचार से साफ हो गया था कि केंद्रीय राजनीति और संघ परिवार का गुजरात में क्या प्रभाव है। उन्होंने गुजरात में अपनी स्टाइल में प्रचार किया और जीते। हालांकि एनडीए के पीएम उम्मीदवार के तौर पर प्रचारित मोदी के नेतृत्व में गुजरात बीजेपी को उम्मीद के मुताबिक सीटें नहीं मिली लेकिन इस जीत से मोदी की पार्टी में पोजीशन और मजबूत हो गई। बीजेपी के साथ मुश्किल यह है कि वह मोदी को छोड़ नहीं सकती है लेकिन वह मोदी को 2014 लोकसभा चुनावों का बीजेपी उम्मीदवार भी घोषित नहीं कर पा रही है। अगर बीजेपी ने ऐसा किया तो 2014 के लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा यूपीए के बुरे प्रशासन के बजाए मोदी और यूपीए उम्मीदवार की लोकप्रियता पर आधारित हो जाएगा। मोदी को बीजेपी की ओर से उम्मीदवार बनाने पर एनडीए के घटक दल जद यू ने गठबंधन छोडऩे की धमकी भी दी है लेकिन मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित करने से एनडीए में दूसरे दलों के शामिल होने की संभावना भी है। मोदी के विरोधियों का कहना है कि जो चमत्कार गुजरात में हुआ जरूरी नहीं कि वह देश के दूसरे हिस्सों में हो।
दिल्ली से अरुण दीक्षित