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अपरिपक्व राजनीति

आम आदमी पार्टी से ज्यादा गहरे मतभेद तो दूसरे राजनीतिक दलों में हैं लेकिन वे मीडिया में अपनी लड़ाई नहीं लड़ते। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता को नाटक बना रखा है। पार्टी के भीतर लोकपाल हो न हो, पार्टी में पारदर्शिता हो न हो, इससे क्या फर्क पड़ता है? क्या टिकट बांटते समय केजरीवाल ने सभी प्रत्याशियों की कुंडली देखी थी, उन्हें सभी 70 सीटों पर लडऩे वालों का इतिहास पता था? ज्यादा आदर्शवादिता और सिद्धांत भी लक्ष्य से भटका देते हैं। केजरीवाल और उनकी पार्टी एक औसत दर्जे की राजनीतिक पार्टी है, जो दिल्ली की जनता के साथ किए गए वादों को पूरा कर दिखाएगी तभी उसे दूसरों से बेहतर और अलग माना जाएगा।

  • श्रेयस कुमार, दिल्ली

लापरवाही शुरू

टाइगर संरक्षण में कुछ दिनों तक चुस्ती दिखाने के बाद हम फिर से लापरवाह हो चले हैं। राजस्थान में 5 के लगभग टाइगर लापता हैं। उधर मध्यप्रदेश में 1 टाइगर शावक की मौत हो गई है। जंगलों से लगातार टाइगरों के मरने की खबरें आ रही हैं। इसका मतलब यह है कि संरक्षण भले ही सराहनीय हुआ है लेकिन सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। टाइगर का अवैध शिकार करने वाले अभी भी सक्रिय हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि टाइगर का शिकार करने के बाद मामूली सी सजा होगी और सबूतों के अभाव में छूटने की संभावना सदैव बनी रहेगी। वन कानूनों को ज्यादा व्यवहारिक और कठोर बनाने की आवश्यकता है। वन भूमि से गरीबों, आदिवासियों और छोटे किसानों को तो आसानी से खदेड़ दिया जाता है। लेकिन अवैध शिकारी बने रहते हैं, वे छुपकर शिकार करते हैं और मौका पाते ही फरार हो जाते हैं। यह व्यवस्था दुखदायी है।

  • सुधीर पांडे, ग्वालियर

बेजोड़ कंगारू

विश्व कप क्रिकेट 2015 के दौरान कभी भी यह नहीं लगा कि भारत इस ट्रॉफी को हासिल नहीं कर सकता। खेल तो ऑस्टे्रलिया और भारत का लगभग एक ही था लेकिन मनोवैज्ञानिक बढ़त ऑस्टे्रलिया ने हासिल की। मैदान पर केवल काबिलियत ही काम नहीं आती, मानसिक दम-खम और कुशलता का मुकाबला भी होता है। कंगारू इसमें सदैव आगे रहे हैं 5-5 ट्रॉफी इसका प्रमाण है। भारत को यह सीखना होगा। कागज ही नहीं मैदान पर भी ताकत दिखाने की जरूरत है। जहां तक विश्व कप का प्रश्न है, साधारण शुरुआत के बावजूद लडख़ड़ाते हुए लीग मैच में न्यूजीलैंड से हारकर भी ऑस्टे्रलिया जीत गया। यही उसकी ताकत है। वे जीतना जानते हैं हर हाल में, हर समय।

  • चेतन चौहान, भोपाल

पूछताछ से आगे नहीं

व्यापमं में पिछले दो साल से पूछताछ ही चल रही है। अंजाम तक कब पहुंचेगा, पता ही नहीं है। अंजाम तक पहुंंचेगा या नहीं, इस पर भी प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। चारा घोटाला में दिखावे के लिए लालू यादव की गिरफ्तारी हुई लेकिन अब वे बिहार में सत्ता के सपने देख रहे हैं। तमाम घोटाले हैं लेकिन सजा शायद ही मिल पाती है, इसीलिए जो समाचार छपते हैं उन्हें पढ़कर लगता है कि एसटीएफ अनंत काल तक अपराधियों को पकड़ते ही रह जाएगी और इधर जो पकड़ाए हैं वे भी कोर्ट से छूट ही जाएंगे।

  • शोभन शर्मा, उज्जैन

जानलेवा यात्रा

पहले लोग तीरथ जाते थे तो अपना श्राद्ध कर जाते थे। जिंदा लौटे या नहीं, पता नहीं था। अब लगता है कि रेल यात्रा से पहले भी परिजनों से अंतिम विदाई ले लेनी चाहिए, क्या पता घर सलामत वापस आएंगे या नहीं। जब मंत्री और प्रभावशाली लोग सुरक्षित नहीं हैं, तो फिर आम जनता की जान की किसे फिक्र है? भारतीय रेलवे दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेलवे अवश्य है, लेकिन यह उतना ही असुरक्षित है। जब तक सुरक्षा की व्यवस्था सही नहीं होगी, रेलवे सफल नहीं हो पाएगा।

  • अरविंद राजपूत, सागर

 

 

फूहड़ता न हो

सोशल मीडिया को धारा 66-ए के भय से मुक्त करना उचित है या अनुचित, यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन हाल के दिनों में सोशल मीडिया में नफरत और कुप्रचार बहुत देखने में आ रहा है। अभिव्यक्ति की एक सीमा है। अपने अंदर की भड़ास निकालने को अभिव्यक्ति नहीं कहते, न ही अपने पूर्वाग्रहों का भोंंडा प्रदर्शन करना अभिव्यक्ति कहलाता है। असहमति को व्यक्त करने का तरीका भी शालीन होना चाहिए। सोशल मीडिया इसलिए नहीं है कि वहां अपने भीतर का सारा क्रोध, पीड़ा और चिंता उड़ेल दी जाए। यह आपसी मेल-जोल का प्लेटफार्म है, जहां हम अपने विचार भी रख सकते हैं। आम तौर पर देखने में आया है कि सोशल मीडिया पर ऊल-जलूल मजाक और फैमिली एल्बम प्रसारित किए जा रहे हैं। कुछ लोग अपनी संपन्नता का दिखावा करने के लिए भी सोशल मीडिया पर हैं।

  • शांतनु उपाध्याय, इंदौर

सिविक सेन्स जरूरी

सड़क दुर्घटनाओं में नौजवानों की मौत सिहरन पैदा करती है। लेकिन इसमें टै्रफिक पुलिस और सरकार केवल युवाओं को प्रेरित करने और हेलमेट के लिए प्रोत्साहित करने या सजा देने का काम ही कर सकती है, अपना अच्छा-बुरा तो स्वयं नौजवानों को और उनके अभिभावकों को समझना होगा। भारत में तो हर सड़क खतरनाक है क्योंकि वाहन इतने हो चुके हैं कि हर पल मौत मंडराती रहती है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को खतरनाक टै्रफिक के  प्रति आगाह करें। लेकिन असली जिम्मेदारी तो उन नौजवानों की है जो गाड़ी चलाते हैं।
द्यललित उनियाल, जबलपुर

सांत्वना से क्या होगा?

मन की बात में प्रधानमंत्री ने किसानों के मन में झांकने की कोशिश तो की, लेकिन उनके दर्द को नहीं समझ पाए। अनादि काल से किसान ही इस पृथ्वी पर मनुष्यों का पेट भरते रहे हैं लेकिन इन अन्न दाताओं ने सर्वाधिक कष्ट सहे। वे अपनी जमीन के मालिक नहीं हैं। उनकी जमीन कभी भी छीनी जा सकती है, उन्हें बेदखल किया जा सकता है। विस्थापन का दर्द सबसे ज्यादा किसानों ने ही झेला है। महानगरों की गंदी बस्तियों में रहने वाले किसान ही हैं। किसानों की यह दुरावस्था क्यों है? जहां हर उत्पादक और उपभोक्ता को पनपने का अवसर है, वहां केवल किसान ही कष्ट क्यों झेलता है? यह दर्द समझना है तो किसान के मन में झांकना होगा। वैसी नीतियां बनानी होंगी जिससे किसानों को वास्तव में फायदा हो।
द्यअखिलेश मिश्रा, होशंगाबाद